अमरीका में कैसे हीरो बना ये भारतीय मूल का कॉमेडियन

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- Author, लाया महेश्वरी
- पदनाम, बीबीसी कल्चर
अमरीकी मनोरंजन उद्योग में भारत और भारतीय मूल के कलाकारों का दबदबा तेज़ी से बढ़ रहा है. बहुत से ऐसे कलाकार हैं जो अमरीकी मनोरंजन की दुनिया में नाम कमा रहे हैं.
भारतीय मूल के अमरीकी कॉमेडियन हसन मिन्हाज ने अपनी कला से ऐसी छाप छोड़ी कि हरेक अमरीकी की ज़ुबान पर उनका नाम है.
उन्हें इस साल व्हाइट हाउस में होने वाले पत्रकारों के सालाना डिनर में पेशकश का न्यौता मिला है. 2016 में ओबामा के राज में अमरीकी कॉमेडियन लैरी विलमोर ने अपनी पेशकश दी थी.
ट्रंप के राष्ट्रपति बनने के बाद जब फिर से यही मौक़ा आया तो लैरी ने अपनी जगह हसन मिन्हाज का नाम आगे कर दिया. हालांकि उस वक़्त तक हसन कॉमेडी की दुनिया का कोई बहुत बड़े नाम नहीं थे.

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हसन मिन्हाज
हसन को अपनी पेशकश तैयार करने के लिए महज़ 19 दिन का वक़्त मिला था. प्रोग्राम में जॉन स्टुअर्ट और स्टीफ़न कॉल्बर्ट जैसे लोगों ने भी अपनी प्रस्तुति दी थी. लेकिन हसन ने इन सबके बीच अपना भाषण इस जुमले के साथ ख़त्म किया कि 'सिर्फ़ अमरीका में ही एक भारतीय मुसलमान स्टेज पर आकर राष्ट्रपति का मज़ाक़ उड़ा सकता है.'
हसन की इसी लाइन ने उन्हें उस शाम का हीरो बना दिया. सोशल मीडिया पर मिन्हाज का ये प्रोग्राम अनगिनत लोगों ने देखा. इस लेख के लिखे जाने तक हसन के इस स्वागत भाषण को क़रीब छह अरब लोग यू-ट्यूब पर देख चुके हैं.
मोटे तौर पर स्टैंड-अप कॉमेडी को कला की बेअदब विधा माना जाता है. लेकिन इसमें पूरे समाज को उसका आईना दिखाने की क़ुव्वत है. लंबे वक़्त तक गोरों को ही इसमें महारत हासिल होने का गौरव हासिल था. जहां अंग्रेज़ी भाषा के जानने वालों की संख्या कम थी, वहां भी गोरे स्टैंड-अप कॉमेडियन अपना दबदबा रखते थे.
चूंकि कला की ये विधा एक ख़ास तबक़े तक ही सिमट कर रह गई थी, इसलिए नए तजुर्बों की संभावनाए सिमट कर रह गईं. पुराने टॉपिक और पुराने अंदाज़ की कॉमेडी देख देख कर लोग थक चुके थे.
इसीलिए जब एशियाई उपमहाद्वीप के लोगों ने नए अंदाज़ में कॉमेडी पेश की, तो सभी को वो एक ताज़ा झोंके की तरह लगी.

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रातों रात हीरो
यही वजह है कि हसन मिन्हाज जैसे भारतीय और पाकिस्तान के बहुत से कॉमेडियनों को अमरीका में हाथों हाथ लिया गया.
एशियाई उपमहाद्वीप से जितने कॉमेडियन ने विदेशों में नाम कमाया है, उनमें एक मशहूर नाम अज़ीज़ अंसारी का है. वो दुनिया भर में स्टैंड-अप कॉमेडी शो कर चुके हैं. उनका लिखा और डायरेक्ट किया शो 'मास्टर ऑफ़ नन' को अवॉर्ड भी मिल चुका है.
नेटफ्लिक्स पर इस शो को लेने वालों की तादाद सबसे ज़्यादा है.
भारतीयों के अलावा पाकिस्तान के कालकारों को भी विदेशों खासकर अमरीका में ख़ूब पसंद किया जा रहा है. पाकिस्तानी अमरीकी कॉमेडियन कुमैल ननजियानी की फ़िल्म 'द बिग सिक' 2017 में सबसे ज़्यादा पसंद की जाने वाली कॉमेडी फ़िल्म है.
ये एक मॉडर्न रोमेंटिक कॉमेडी है. ये कुमैल और उनकी पत्नी एमिली गॉर्डन के रिश्ते पर आधारित है.
इस फ़िल्म की लागत महज़ पचास लाख डॉलर है. लेकिन इसे इतना पसंद किया गया कि इसने क़रीब पांच करोड़ डॉलर की कमाई की. ये इस साल की सबसे कामयाब फ़िल्म बनी. इस फ़िल्म की मशहूर 'सनडान्स फ़िल्म फेस्टिवल' में ख़ास स्क्रीनिंग भी कराई गई.

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अमरीका में उर्दू!
'मास्टर ऑफ़ नन' और 'द बिग सिक' जैसी फ़िल्मों की कामयाबी की एक बड़ी वजह ये भी थी कि इन फ़िल्मों में निजी ज़िंदगी की असल कहानियों को शामिल किया था. ये वो कहानियां थीं जिन्हें दर्शक सुनना चाहते थे.
ये फ़िल्में लोगों को शायद इसलिए भी पसंद आईं कि इनमें किरदार भी असल ज़िंदगी से ही लिए गए थे.
जैसे फ़िल्म 'मास्टर ऑफ़ नन' में अंसारी के पिता ने ही फिल्म में उनके पिता का किरदार निभाया था. 'द बिग सिक' में पाकिस्तानी अमरीकी किरदार धड़ल्ले से उर्दू ज़बान में डायलॉग बोलते हैं. बिल्कुल उसी तरह जिस तरह वो अपनी रोज़मर्रा की ज़िंदगी में बोलते हैं.
इन डायलॉग का अंग्रेज़ी तर्जुमा लगातार चलता रहता है जो सभी दर्शकों को बांधे रखता है.
ऐसा कम ही देखने को मिलता है कि कोई स्टैंड-अप कॉमेडियन शो की शुरुआत तंज़ के साथ करे और अंत अपना ही दिल टूटने की कहानी पर करे. मिन्हाज अपने शो में बताते हैं कि कैसे उन्हें कमतर समझकर उनकी गर्लफ़्रैंड के पिता ने फ़ोटो खिंचवाने से मना कर दिया था.
इस कहानी के ज़रिए मिन्हाज ने वो दर्द बताने की कोशिश की थी जो बाहरी लोगों को विदेशों में झेलना पड़ता है. ये उनके लिए बहुत तकलीफ़देह था कि जिन लोगों के बीच वो रहते हैं, जिनसे हर वक़्त का वास्ता वास्ता पड़ता है, वही लोग उन्हें हैसियत में कम समझते हैं.

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भारतीय कॉमेडियन का लोहा
भारतीय कॉमेडियन की कला अब दुनिया भर में अपना लोहा मनवा रही है. मुंबई की स्टैंड-अप कॉमेडियन अदिति मित्तल ऐसी पहली भारतीय महिला कॉमेडियन हैं, जिनका नेटफ्लिक्स पर अपना स्पेशल शो है.
ये शो उनके मशहूर लाइव स्टेज शो 'दे वुड नॉट लेट मी से' पर आधारित है. अदिति ने स्कॉटलैंड में भी एडिनबरा फ़्रिंज फ़ैस्टिवल में अपनी पेशकश दी थी. ऐसा करने वाली भी वो पहली भारतीय महिला थीं.
हालांकि इससे पहले भी अदिति और वीर दास जैसे कॉमेडियन विदेशों में बुलाए जाते रहे हैं. लेकिन तब वो सिर्फ़ भारतीय मूल के लोगों का मनोरंजन करने जाते थे.
लेकिन अब इनकी मक़बूलियत इतनी बढ़ गई है, कि विदेशों में ये जहां भी अपनी पेशकश देते हैं वहां भारतीय कम और विदेशी दर्शक ज़्यादा होते हैं.
भारतीय कलाकारों की बढ़ती शोहरत का एक बड़ा फ़ायदा और भी है.

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जागरूकता के लिए पहलकदमी
इन कलाकारों की मदद से उन मुद्दों को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बुलंद किया जा सकता है, जो सियासी दबाव में सामने आ ही नहीं पाते.
मिसाल के लिए 2015 में जब अमरीका के सुप्रीम कोर्ट ने समलैंगिकों की शादी को क़ानूनी मान्यता दी, तो आधे से भी कम अमरीकी मुसलमानों ने इस फ़ैसले को क़बूल किया.
इस मौक़े पर मिन्हाज और लेखक रेज़ा असलान ने अपने समुदाय के लोगों के लिए एक खुला ख़त लिखा और उनसे फ़ैसला स्वीकार करने की अपील की.
अदिति मित्तल का भी यही कहना है कि कला के मंच से अलग-अलग आवाज़ों को इंसानियत के लिए एक जुट करने का संदेश देने में आसानी होती है.
कला का मंच लोगों को एक दूसरे के पास लाने में एक अहम रोल निभा रहा है. अच्छी बात ये है कि अब इसमें भारतीय कलाकारों की साझेदारी बढ़ रही है.
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