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350 साल में कितना बदला है 'पैराडाइज़ लॉस्ट' का इतिहास
- Author, बेंजामिन राम
- पदनाम, बीबीसी कल्चर
हिंदुस्तान में अंग्रेज़ी के बहुत से मुरीद हैं. ऐसे मुरीदों ने अगर मशहूर अंग्रेज़ी महाकाव्य 'पैराडाइज़ लॉस्ट' (Paradise Lost) को पढ़ा नहीं, तो कम से कम उसके बारे में सुना ज़रूर होगा.
ये महाकाव्य अंग्रेज़ी के मध्य युग के महाकवि जॉन मिल्टन ने लिखा था. इस साल पैराडाइज़ लॉस्ट ने 350 साल पूरे कर लिए. भले ही आज इस महाकाव्य को कम ही पढ़ा जाता है, लेकिन अंग्रेज़ी साहित्य के लिए ये एक बड़ी देन है.
'पैराडाइज़ लॉस्ट' (Paradise Lost) का मतलब होता है, गुम हुई जन्नत. इस महाकाव्य में स्वर्ग से शैतान और एक इंसान के निकाले जाने का ज़िक्र है. ये महाकाव्य उस दौर में लिखा गया जब एक शासक का आदेश पूरे समाज को मानना पड़ता था.
जहां धर्म का बोल बाला था. लेकिन आज के लोकतांत्रिक समाज में भी इसका महत्व कम नहीं है. इस महाकाव्य में बग़ावत, अपनी ज़िंदगी अपनी शर्तों पर आज़ादी से जीने का तस्सवुर बड़े ख़ूबसूरत तरीक़े से बयां किया गया है.
लोकतंत्र पर था यक़ीन
जॉन मिल्टन एक रईस ख़ानदान में पैदा हुए थे. लेकिन दुनिया देखने का उनका नज़रिया सियासी और निजी कश्मकश को देखते हुए बना था. वो सामंतवादी परिवार से आते थे. मगर मिल्टन को जम्हूरियत में ज़बरदस्त यक़ीन था.
इंग्लैंड में 17वीं सदी के गृह युद्ध के दौरान वो राजा के ख़िलाफ़ खड़े हुए. जनता के साथ आवाज़ बुलंद की. वो ओलिवर क्रॉमवेल के राज के दौरान ब्रिटेन में नौकरशाही का हिस्सा भी रहे थे. वो विदेशी भाषाओं के मंत्री बनाए गए थे.
मिल्टन इंग्लिश, ग्रीक, लैटिन और इटैलियन ज़बान में कविताएं लिखते थे. वो डच, जर्मन, फ़्रेंच और स्पेनिश भाषा में गद्य लिखते थे. वो हिब्रू, अरामाइक और सिरियाक ज़बानें पढ़ सकते थे.
इंग्लैंड की राजशाही के ख़िलाफ़ जिस तरह मिल्टन ने अपनी आवाज़ बुलंद की, उससे यूरोप की आम जनता के बीच उनकी एक अलग ही पहचान बन गई. लेकिन मिल्टन की कमज़ोर होती आंखों की रोशनी ने उनके कूटनीतिक सफ़र पर ब्रेक लगा दिया. सन 1654 तक उनकी आंखों की रोशनी पूरी तरह जा चुकी थी.
लेकिन इस हालत में भी उनका साहित्य का काम नहीं रूका. अपनी ज़िंदगी के अगले 20 सालों तक उन्होंने बोल कर अपनी कविताएं और ख़त लिखवाए. इस काम में उनके दोस्त, दूसरे कवि और उनकी बेटियां उनकी मदद करते थे.
'पैराडाइज़ लॉस्ट' को जॉन मिल्टन ने ग्रीस के रिवाज को आगे बढ़ाते हुए लिखा. जिसमें अंधे पैग़ंबरों का ज़िक्र है, जो मन की आंखों से बहुत सी चीज़ों को देख लेते हैं. ऐसी चीज़ें जिन्हें आम इंसान की आंख नहीं देख पाती थी. मिल्टन के साहित्य की गहरी समझ रखने वाले वाले लेखक विलियम ब्लैक लिखते हैं मिल्टन की नज़र तसव्वुर की नज़र थी.
सदमे के दौर में रचना
1658 में जब मिल्टन ने 'पैराडाइज़ लॉस्ट'लिखना शुरू किया, तो वो सदमे के दौर से गुज़र रहे थे. उनकी दूसरी पत्नी का देहांत हो गया था, जिसकी याद में उन्होंने कविता सोनेट-23 लिखी. कमोबेश उसी वक्त इंग्लैंड में गणतंत्र की स्थापना करने वाले ओलिवर क्रॉमवेल भी गुज़र गए. क्रॉमवेल के जाने के बाद उनकी बनाई गणतांत्रिक व्यवस्था तहस-नहस हो गई. इससे भी जॉन मिल्टन को बहुत तकलीफ़ हुई.
इसी लिए 'पैराडाइज़ लॉस्ट' में मिल्टन ने एक ख़याल के ढहने, चीज़ों की बर्बादी को ईश्वर का इंसाफ़ बताकर जायज़ ठहराया है.
'पैराडाइज़ लॉस्ट' महाकाव्य में मिल्टन ने अर्श से फ़र्श पर आने के एहसास और ईश्वर के इंसान को स्वर्ग से निकालने को सही ठहराने की कोशिश की है. मिल्टन ने ये दिखाने की कोशिश की है कि अगर इंसान ग़लती करता है तो उसे उसका ख़ामियाज़ा भुगतना पड़ता है. गलती करने पर ही इंसान को स्वर्ग से निकाला गया था.
साथ ही इस महाकाव्य में ये भी दिखाने कि कोशिश की गई है कि जब इंसान को लगता है कि उसके साथ ज़्यादती हो रही है तो वो कैसे बाग़ी हो जाता है. इस महाकाव्य में ईश्वर के इंसाफ देने और इंसान के बाग़ी होने की कहानी बयान की गई है, जो आज के दौर के इंसान के लिए भी प्रेरणा का ज़रिया है.
'पैराडाइज़ लॉस्ट' साहित्य का मास्टरपीस है. लेकिन आलोचक क्रिस्टोफ़र रिक्स का कहना है कि आज इस महाकाव्य को नहीं पढ़े जाने की बड़ी वजह इसमें धर्म का पुट ज़रूरत से ज़्यादा होना है. कला का मक़सद सिर्फ़ कला को उजागर करना होना चाहिए. लेकिन मिल्टन ने 'पैराडाइज़ लॉस्ट' को एक धर्मग्रंथ की तरह लिखा.
ईश्वर के किरदार का तानाबाना
उसमें ईश्वर के किरदार को बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया. इंसान की तमाम हरकतों को ग़लत बताया. और फिर ईश्वर के इंसाफ़ को जायज़ ठहराया. मिल्टन बहुत नैतिकतावादी थे. उनकी ज़िंदगी का एक बड़ा हिस्सा धार्मिक-सामाजिक मुद्दों पर तर्क करते हुए गुज़रा. इसका असर उनके महाकाव्य 'पैराडाइज़ लॉस्ट' में भी दिखता है.
रिक्स का ये भी कहना है कि मिल्टन ने अपने महाकाव्य में जिस ईश्वर को दिखाया है उसकी इमेज एक ज़ालिम की बनती है. जबकि जिस शैतान को बाग़ी दिखाया है, उसमें एक आज़ाद ख़्याली की झलक है. वो अपने फैसले खुद आज़ादी से लेने की मांग करता नज़र आता है.
वो ईश्वर की मातहती में स्वर्ग में ऐश की ज़िंदगी जीने से बेहतर नरक में अपनी मर्ज़ी से मुश्किल भरा जीवन जीने को बेहतर समझता है. उसकी बातों में आज़ादी और लोकतांत्रिक विचारधारा की झलक नज़र आती है.
'पैराडाइज़ लॉस्ट' को लेकर जितनी भी चर्चाएं होती रही हैं उनमें इस महाकाव्य के सियासी और धार्मिल पहलुओं पर ही बात हुई है. लेकिन इस महाकाव्य में इश्क़ का अपना अलग हिस्सा है.
इसमें ये बताने कि कोशिश की गई है कि आदमी और औरत दोनों एक दूसरे के पूरक हैं. दोनों की ज़िंदगी एक दूसरे के बग़ैर अधूरी है. मिल्टन के मुताबिक़ ईव ने एक फल के लिए जो लालसा दिखाई थी वो आदम के ज़्यादा क़रीब जाकर उनका प्यार पाने के लिए थे.
1667 में जिस वक़्त 'पैराडाइज़ लॉस्ट' प्रकाशित हई उसी वक़्त लंदन में स्टुअर्ट राजशाही की वापसी हुई थी. और इसके ख़िलाफ़ मिल्टन ने कुछ पर्चे लिखे थे. नतीजा ये हुआ कि मिल्टन को ना सिर्फ अपमानित किया गया, बल्कि उन्हें टावर ऑफ़ लंदन में क़ैद कर दिया गया और उनके लिखे काम को जला दिया.
लेकिन इसके बावजूद 'पैराडाइज़ लॉस्ट' को लोगों ने काफ़ी पसंद किया. बाद में शाही कवि जॉन ड्राइडेन ने इस महाकाव्य में शैतान के रूप में ओलिवर क्रॉमवेल को बताकर इसे नए सिरे से पेश किया.
असल में जॉन मिल्टन ब्रिटेन में राजशाही के ख़िलाफ़ थे. वो लोकतंत्र के हामी थे. लेकिन वो ख़ुदा को मानने वाले थे. वो ये भी यक़ीन करते थे कि कई बार ख़ुदा, अलग-अलग तरीक़ों से राज करने वालों को धरती पर भेजता है. उनके राजशाही विरोधी ख़यालों की वजह से ही उन्हें मुसीबतों का सामना करना पड़ा.
आलोचना भी कम नहीं हुई
रुमानी कविताएं लिखने वाले कवि मिल्टन के साहस की खूब तारीफ़ करते हैं कि कैसे मिल्टन ने सेंसरशिप के खिलाफ़ आवाज़ बुलंद की. मिल्टन ने जिस तरह से कविताएं लिखने का एक नया अंदाज़ अंग्रेज़ी साहित्य को दिया, इसकी भी ख़ूब तारीफ़ होती है. मिल्टन ने कविता को बंधे बंधाए पैमानों से आज़ाद कर दिया था.
ऐसा नहीं है कि मिल्टन के काम की हमेशा क़द्र ही की गई. बीसवीं सदी में कई आलोचकों ने मिल्टन को सबसे खराब किस्म का ज़हर तक बता डाला था. टी.एस. इलियट और इज़रा पाउंड के नाम प्रमुख हैं.
नास्तिकों को ये महाकाव्य इसलिए पसंद आया कि इस में ईश्वर की ख़राब तस्वीर पेश की गई. जो आज़ादी पसंद थे, उन्हें इसलिए पसंद आया कि इसमें शैतान को अपनी मर्ज़ी से अपनी शर्तों पर आज़ादी से जीने की सीख देने वाला बताया गया.
हाल के सालों में मिल्टन और 'पैराडाइज़ लॉस्ट' को कुछ नए क़द्रदान मिल गए हैं. अंग्रेज़ लेखक फ़िलिप पुलमेन का कहना है कि अंग्रेज़ी भाषा में शब्दों से संगीत पैदा करने का जो हुनर मिल्टन में दिखा वो शायद शेक्सपियर की रचनाओं में भी नहीं दिखता.
मिल्टन के विरोधी उनके अंधेपन को भी उनके गुनाहों की सज़ा के तौर पर देखते हैं. लेकिन कुछ लोगों का ये भी ये कहना है कि आंखों की रोशनी जाने के बाद मिल्टन की तसव्वुर की ताक़त और बढ़ गई थी.
कहा जाता है कि मिल्टन को 'पैराडाइज़ लॉस्ट' का तसव्वुर उन्हें ख़्वाब में आया था. उन्होंने इस पूरे ख़्वाब को अपने ज़ेहन में उतार लिया था. आज भी इस महाकाव्य को पढ़ने वालों को उसकी शिद्द्त का एहसास होता है. आंखें बंद करने पर स्वर्ग और नरक दोनों की तस्वीर सामने आ जाती है.
शायद यही जॉन मिल्टन की सबसे बड़ी कामयाबी है. वो यही तो चाहते थे कि इंसान अपने भीतर झांके. अपने दिल के आईने में देखे. उसमें वो पूरी तरह कामयाब रहे.
(अंग्रेजी में मूल लेख पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें, जो बीबीसी कल्चर पर उपलब्ध है.)
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