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लुप्त हो रहे एक धर्म ने छोड़ी पश्चिम पर छाप
- Author, जूबीन बेख़राद
- पदनाम, बीबीसी कल्चर
दुनिया आज कई धर्मों और संप्रदायों में बंटी हुई है. हर दीन ख़ुद को दूसरों से बेहतर बताता है. हर संप्रदाय का दावा होता है कि उससे अच्छा तो कुछ है ही नहीं.
बहुत से देश भी धर्म की बुनियाद पर पहचाने जाते हैं. मसलन, अमरीका और यूरोप के देश ईसाई देश माने जाते हैं. वहीं मध्य एशिया, उत्तरी अफ्रीका और दक्षिणी पूर्वी एशिया के कई देश मुस्लिम बहुल हैं.
पश्चिमी देश जब भी ईरान का ज़िक्र करते हैं, उसे पश्चिमी सभ्यता से मुख़्तलिफ़ बताते हैं. नीचा दिखाते हैं. ईरान में इस्लाम धर्म के नाम पर ही राज होता है. ये बात भी पश्चिमी देशों को नहीं सुहाती. अमरीका और यूरोप के देश में ईसाइयत का बोलबाला है. मगर ये मुल्क़ खुद को सेक्युलर बताते हैं. क्योंकि यहां सरकार का कोई दीन नहीं होता. वहीं, पाकिस्तान और ईरान जैसे तमाम देश हैं जो ख़ुद को इस्लामिक देश कहते हैं. जहां की सरकार का धर्म भी इस्लाम है.
ईरान में कभी हिंदू धर्म को मानते थे लोग
आप ये जानकर हैरान रह जाएंगे कि ईरान से इतना चिढ़ने वाले पश्चिमी देशों पर ईरान के ही एक प्राचीन धर्म का बहुत असर रहा है. आज वो धर्म बहुत सिमट गया है. फिर भी उसका पश्चिमी सभ्यता पर गहरा असर साफ़ देखा जा सकता है.
इसे भारत में पारसी धर्म के नाम से जानते हैं. वहीं पश्चिमी देश इसे ज़रथुष्ट्रवाद कहते हैं. क्योंकि इस धर्म की शुरुआत पैग़ंबर ज़रथुष्ट्र ने की थी. कभी ये धर्म ईरान का शाही धर्म होता था. मगर आज इसके मानने वालों की तादाद बेहद कम रह गई है.
ईरान के बारे में जानकारों की आम राय है कि ईसा से एक-डेढ़ हज़ार साल पहले यहां के रहने वाले लोग भारत की तरह ही हिंदू धर्म को मानते थे.
वो भारत के लोगों की तरह ही कई देवी-देवताओं को पूजा करते थे. लेकिन बाद में पारसियों के पैगम्बर ज़रथुष्ट्र ने इस चलन को बदला. उन्होंने पहली बार एकेश्वरवाद को जन्म दिया. ज़रथुष्ट्र ने कहा कि ईश्वर एक है. उन्होंने लोगों को समझाया कि कई देवी-देवताओं को पूजने के बजाय वो सिर्फ़ एक भगवान 'अहुरा माज़दा' की इबादत करें. जिन्हें बुद्धि का देवता माना जाता है. ये हिंदू धर्म के वरुण देवता से काफ़ी मिलते जुलते हैं. ज़रथुष्ट्र ने दुनिया में पहली बार एकेश्वरवाद की शुरुआत की.
बुद्धिजीवियों का तो यहां तक कहना है कि ईसाई, यहूदी और इस्लाम मज़हब में भी एकेश्वरवाद का विचार पारसी धर्म से ही आया है. इन तीनों ही मज़हबों में पारसी मज़हब की तरह ही जन्नत, दोज़ख़, शैतान और फ़रिश्तों का तसव्वुर है.
असल में पारसी मज़हब अच्छे और बुरे के दरमियान फ़र्क़ करने और इंतिख़ाब का पाठ पढ़ाता है. पारसी धर्म की शिक्षा अच्छाई के देवता अग्नि या 'स्पेनता मैन्यू' और बुराई के दानव 'आहरीमनन' के बीच लड़ाई की है. इंसान को इन दोनों में से किसी एक को चुनना है. मज़हब इंसान को सिखाता है भगवान, ईश्वर हमेशा मौजूद रहेंगे और सबको अपने अच्छे बुरे का हिसाब देना होगा. सभी को अपने गुनाहों की सज़ा भुगतने के बाद स्वर्ग का सुख मिलेगा.
एक ईश्वर की सीख देने वाला पारसी धर्म
अब सवाल ये है कि पारसी मज़हब आतिशपरस्तों का धर्म है. फिर भी इब्राहिमी मज़हबों पर इसका असर कैसे पड़ा? जानकारों के मुताबिक़ पारसी शासक 'साइरस महान' ने बेबीलोन सभ्यता के यहूदियों को पारसी धर्म से रूबरू कराया. उसके बाद ही यहूदियों ने एक ईश्वर की उपासना शुरू की थी.
जब पारसियों ने यूनान को फ़तह कर लिया तो ग्रीक दर्शन ने भी एक नया रुख अख़्तियार कर लिया. इससे पहले ग्रीस के लोगों की मान्यता थी कि इंसान की क़िस्मत ही उसे जहां-तहां लेकर जाती है और उसका भाग्य अलग अलग देवी देवताओं के रहमो करम पर ही चलता है. लेकिन पारसी मज़हब और दर्शन का यूनानी सभ्यता पर गहरा असर पड़ा. अब चूंकि पूरी पश्चिमी सभ्यता यूनानी संस्कृति को अपना मूल मानती है. तो, यूनान पर जो असर पारसी धर्म का पड़ा, वो पूरी पश्चिमी सभ्यता पर दिखता है.
पारसी मज़हब ने दुनिया के दूसरे धर्मों पर अपनी अमिट छाप छोड़ी. शुरुआत में ये सिर्फ़ ईरान का राजकीय धर्म था. लेकिन अफ़गानिस्तान, ताजिकिस्तान और मध्य एशिया में जहां जहां पारसी मज़हब के मानने वाले थे वहां के लोगों पर भी इसने अपना असर डाला.
कला और साहित्य पर पारसी मज़हब का असर
मगर एक वक़्त ऐसा आया कि इस धर्म का ईरान से ही ख़ात्मा हो गया. पारसियों ने भागकर भारत में पनाह ली थी. आज भारत में भी पारसियों की तादाद बेहद कम रह गई है. लेकिन देश की तरक़्क़ी में इनका बड़ा योगदान रहा है.
पारसी धर्म के सिमटने के बावजूद ईरानी सभ्यता के प्रतीक इस धर्म का असर दुनिया के बहुत से देशों की संस्कृति में नजर आता है. ख़स तौर से पश्चिमी यूरोप पर तो इसका असर कुछ ज़्यादा ही है.
पारसी संस्कृति का असर ना सिर्फ़ लोगों की ज़िंदगियों पर था बल्कि उस दौर की कला और साहित्य पर भी इसका भरपूर असर था. दसवीं शताब्दि में दांते ने अपनी किताब में स्वर्ग और नरक के सफ़र का ज़िक्र किया है जो पारसी मान्यताओं से हूबहू मेल खाता है.
इसी तरह सोलहवीं सदी के एथेंस स्कूल ऑफ़ आर्ट के कलाकार रफ़ैल ने ईरानी पैगम्बर ज़रथुष्ट्र की तस्वीर बनाई, जिसमें उन्हें रौशनी से भरा एक ग्लोब हाथ में थामे दिखाया है. यूरोपीय देशों में ज़रथुष्ट्र को जादूगरी का पैगंबर मानकर उन्हें पूजा जाता था.
ज़ेडिक और वॉल्टेयर फ़्रांस के फ़ैशन जगत में एक बड़ा नाम हैं. हालांकि इस ब्रैंड के कपड़ों पर पारसियों का कोई असर नहीं है लेकिन इसके नाम के साथ एक गहरा रिश्ता है. अठारहवीं सदी के फ्रेंच लेखक-दार्शनिक वॉल्टेयर ईरानी सभ्यता और पारसी धर्म से बेहद प्रभावित थे. दोस्तों के बीच उन्हें इसीलिए ईरान के मशहूर कवि शेख सादी की तर्ज पर सादी बुलाया जाता था.
इसी तरह महान जर्मन कवि गेटे, ईरान के मशहूर शायर हाफ़िज की शायरी और ख़्याल से बहुत प्रभावित थे. उन्हों ने हाफ़िज़ के कलाम को ख़ूब पढ़ा है और उसका जर्मन भाषा में तर्जुमा भी किया. अपनी किताब 'ईस्ट डिवाइन' में उन्होंने एक पूरा अध्याय पारसी थीम पर ही लिखा है.
'टॉमस मूर' ने तो 'लालारूख' में पारसी संस्कृति के ख़ात्मे पर अफ़सोस ज़ाहिर किया है.
मोज़ार्ट के संगीत से लेकर कार कंपनी माज़्दा तक
पारसी संस्कृति के असर से पश्चिमी यूरोप का संगीत भी अछूता नहीं रहा. मोज़ार्ट के संगीत की कुछ रचनाओं में भी उसका असर दिखाई देता है.
चर्चित ब्रिटिश गायक फ्रेडी मर्करी उर्फ़ फारुख़ बलसारा, भी पारसी संस्कृति से बहुत प्रभावित थे. उनकी बहन कश्मीरा कुक ने भी एक इंटरव्यू में बताया था कि उनके परिवार में पारसी धर्म का काफ़ी असर था.
जापान की ऑटो कंपनी माज़्दा ने अपना नाम पारसी देवता अहुरा माज़्दा से ही लिया है. इसी तरह मशहूर सीरीज़ गेम ऑफ थ्रोन्स में भी अज़ोर अहाय नाम का एक किरदार है, जो पारसी धर्म से लिया गया है.
इसी तरह स्टार वार्स में भी जंग रौशनी बनाम अंधेरे की है, जो पारसी धर्म से ली गई थी.
लिहाज़ा कहा जा सकता है कि यूरोपीय लोगों की ज़िंदगी पर पारसी मज़हब का इतना ज़्यादा असर है कि ज़िंदगी का कोई पहलू इससे अछूता नहीं है.
इसके बावजूद अमरीका और यूरोप के लिए ईरान आज ऐसा देश है, जो पश्चिमी सभ्यता और मूल्यों के ठीक उलट है.
वहां की सभ्यता और संस्कृति को पिछड़ा कहकर उसका मज़ाक़ बनाया जाता है. ऐसा करते वक़्त लोगों को पारसी धर्म और इसके पैग़ंबर ज़रथुष्ट्र को याद करना चाहिए.
(अंग्रेजी में मूल लेख पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें, जो बीबीसी कल्चर पर उपलब्ध है.)
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