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वह तरकीब जो आपसे ज़्यादा ख़र्च कराती है
कॉफ़ी ख़रीदते समय आपने ध्यान दिया होगा कि तीन साइज़ के कप के विकल्पों- छोटा, मध्यम और बड़ा- में से मध्यम आकार के कप की क़ीमत लगभग बड़े कप के बराबर होती है.
तीनों साइज़ देखने के बाद क्या आपने कभी सबसे बड़ा और महंगा विकल्प चुना है? यदि हां तो आप झांसे के शिकार हुए हैं.
यह "डिकॉय इफ़ेक्ट" कहलाता है. इसमें जानबूझकर एक अतिरिक्त और कम आकर्षक विकल्प पेश किया जाता है जिससे आप महंगे विकल्प को चुनकर अधिक भुगतान के लिए तैयार हो जाते हैं.
हार्वर्ड यूनिवर्सिटी की मनोवैज्ञानिक लिंडा चांग कहती हैं, "यदि आप विकल्पों को एक निश्चित तरीक़े से तैयार करें तो आप लोगों को महंगे उत्पाद ख़रीदने के लिए प्रेरित कर सकते हैं."
डिकॉय इफेक्ट की जांच सबसे पहले उपभोक्ता विकल्पों को प्रभावित करने वाली एक मार्केटिंग स्ट्रैटजी के रूप में की गई थी.
लेकिन नये रिसर्च से पता चलता है कि इसका प्रभाव भर्ती, स्वास्थ्य सेवाओं और यहां तक कि राजनीति पर भी पड़ता है.
यह दिखाता है कि हमारे निर्णय उन संदर्भों से आसानी से प्रभावित किए जा सकते हैं, जिन संदर्भों में तथ्य पेश किए जाते हैं.
संदर्भ का प्रभाव
अतिरिक्त सूचनाओं का हमारे निर्णयों से कोई सीधा ताल्लुक न होने पर भी उनके संदर्भ हम पर असर छोड़ते हैं.
डिकॉय इफेक्ट के बारे में जानने के बाद आप इसके शिकार कम होंगे. इससे आप किसी को प्रोत्साहित करने के तरीके भी ढूंढ़ सकते हैं.
हमारी सोच को प्रभावित करने वाले कई कुख्यात संज्ञानात्मक पूर्वाग्रहों की तरह डिकॉय प्रभाव के बारे में पहली बार 1980 के दशक में लिखा गया था.
इसे समझने का सबसे आसान तरीका उदाहरण से समझना है. कल्पना कीजिए कि आपको फ्लाइट के तीन विकल्पों में से एक को चुनना है.
फ्लाइट A की लागत 400 डॉलर है जिसमें 60 मिनट का ठहराव है.
फ्लाइट B की लागत 330 डॉलर है जिसमें 150 मिनट का ठहराव है.
फ्लाइट C की लागत 435 डॉलर है जिसमें 60 मिनट का ठहराव है.
इस मामले में शोधकर्ताओं ने पाया कि अधिकतर लोग फ्लाइट A का चयन करेंगे, क्योंकि यह फ्लाइट C से सस्ती है और इसमें इंतज़ार भी कम है, भले ही यह फ्लाइट B से बहुत महंगी है.
अब उड़ानों का दूसरा सेट देखते हैं.
फ्लाइट A की लागत 400 डॉलर है जिसमें 60 मिनट का ठहराव है.
फ्लाइट B की लागत 330 डॉलर है जिसमें 150 मिनट का ठहराव है.
फ्लाइट C की लागत 330 डॉलर है और 195 मिनट का ठहराव है.
यहां ज़्यादातर लोगों की पसंद फ्लाइट B होती है.
तार्किक रूप में इसका कोई मतलब नहीं है. पहले उदाहरण के मुक़ाबले फ्लाइट B का विकल्प कहीं से भी आकर्षक नहीं हुआ है, क्योंकि कीमत और इंतज़ार का समय ठीक उतना ही है.
लेकिन फ्लाइट C में हुए बदलाव- लंबा ठहराव- के कारण हमारे सोचने की दिशा बदल जाती है. हम सस्ती फ्लाइट के लिए लंबा इंतज़ार करना भी गवारा कर लेते हैं.
झांसे का विकल्प
दोनों मामलों में फ्लाइट C (डिकॉय) का विकल्प इस तरह डिजाइन किया गया कि वह अन्य दो विकल्पों में से एक (टारगेट) की तरह लगे, मगर उससे कम आकर्षक दिखे.
इससे टारगेट फ्लाइट का विकल्प ज़्यादा अच्छा लगने लगता है. प्रयोगो से पता चला है कि अच्छी तरह डिजाइन किए हुए डिकॉय अन्य दो विकल्पों के बीच राय को 40 फीसदी तक स्थानांतरित कर सकता है.
यह दिखाता है कि कैसे हमारे फ़ैसले आसानी से प्रभावित हो सकते हैं. अहम बात यह है कि तीसरे विकल्प (डिकॉय) को जोड़ देने से उपभोक्ता ज़्यादा पैसे ख़र्च करने को भी तैयार हो जाते हैं. इसलिए डिकॉय इफेक्ट में बाज़ार की गहरी दिलचस्पी हो रही है.
मनोवैज्ञानिक अभी तक डिकॉय इफेक्ट की सटीक वजह नहीं बता पाए हैं. एक विचार यह है कि डिकॉय विकल्प के साथ तुलना करने पर हमें महंगे विकल्प भी उचित लगने लगते हैं.
उदाहरण के लिए, सिर्फ़ A और B विकल्पों में तुलना करने पर यह पता लगाना मुश्किल है कि लागत और इंतज़ार को कैसे तय किया गया है और 90 मिनट का अतिरिक्त इंतज़ार वास्तव में कितने पैसे के बराबर है.
लेकिन यदि इन दो में से एक विकल्प तीसरे डिकॉय विकल्प (फ्लाइट C) से किसी भी एक पैमाने पर बेहतर दिखे तो आपको अपनी पसंद को सही बताने का कारण मिल जाता है.
व्यवहार का यह पैटर्न बीयर से लेकर टीवी और गाड़ियां ख़रीदने तक में भी देखा गया है. एक अनाकर्षक तीसरा विकल्प अन्य दो संभावनाओं के बीच वरीयता को बदल देता है.
ठगी का ऑफर
अपनी किताब "Predictably Irrational" में डैन एरीली ने बताया है कि कैसे "दि इकोनॉमिस्ट" मैग्ज़ीन ने डिकॉय इफेक्ट का इस्तेमाल करके पाठकों को महंगे सब्सक्रिप्शन लेने के लिए प्रेरित किया.
प्रकाशकों ने पत्रिका का डिजिटिल सब्सक्रिप्शन सिर्फ़ 59 डॉलर में ऑफर किया और प्रिंट सब्सक्रिप्शन के लिए 125 डॉलर रखे.
तीसरा विकल्प डिजिटल और प्रिंट दोनों सब्सक्रिप्शन के लिए रखा जिसके लिए भी 125 डॉलर देने थे.
यहां 125 डॉलर में सिर्फ़ प्रिंट सब्सक्रिप्शन का विकल्प डिकॉय था, क्योंकि इसमें तीसरे विकल्प से कम ऑफर किया जा रहा था और कीमत उतनी ही रखी गई थी.
इस विकल्प के होने भर से अन्य दो विकल्पों में से संयुक्त विकल्प (प्रिंट और डिजिटल दोनों) को चुनने वालों की तादाद बहुत बढ़ गई.
जब सिर्फ़ दो ही विकल्प थे, तब पाठकों के सिर्फ सस्ते डिजिटल सब्सक्रिप्शन लेने की संभावना 52 फीसदी ज़्यादा थी.
ऊंची कीमत वाली चीज़ों की बिक्री में भी डिकॉय इफेक्ट असर डाल सकता है. यूनिवर्सिटी ऑफ़ ब्रिटिश कोलंबिया के एक हाल के रिसर्च पेपर में हीरा बाज़ार पर डिकॉय इफेक्ट के असर को दर्ज किया गया है.
इसमें पाया गया कि थोड़ी कम गुणवत्ता, मगर समान कीमत के दूसरे उत्पाद की मौजूदगी से खुदरा विक्रेताओं के मुनाफे में 20 फ़ीसदी का इजाफा हो सकता है.
दिल की सुनेंगे तो फंसेंगे!
डिकॉय इफेक्ट आपके सोचने की शैली पर निर्भर करता है. कुछ लोग अपने मन की बात सुनना पसंद करते हैं और कुछ लोग तर्क-वितर्क के बाद फ़ैसले लेते हैं.
दिल की बात सुनकर तुरंत फ़ैसला लेने वाले आसानी से डिकॉय के शिकार बन जाते हैं.
दिलचस्प है कि हार्मोन्स भी इसमें भूमिका निभा सकते हैं. मिसाल के लिए, टेस्टोस्टेरोन का स्तर ज़्यादा हो तो व्यक्ति ज़्यादा आवेगी होता है और उसके डिकॉय में फंसने की संभावना ज़्यादा होती है.
समूह के निर्णय लेने में भी डिकॉय इफेक्ट दिखता है. हम अपनी सोच को पूर्वाग्रह रहित करने के लिए दूसरों पर निर्भर नहीं हो सकते.
डिकॉय से कौन कम या ज़्यादा असुरक्षित है, इसकी पहचान करने के अलावा वैज्ञानिकों ने खरीदारी के अतिरिक्त विभिन्न परिस्थितियों में इसके प्रभाव का भी पता लगाया है.
मिसाल के लिए, एरीली ने पाया कि डेटिंग में भी यह मौजूद हो सकता है. उनके शोध के मुताबिक, हम उसे ज़्यादा चाहने लगते हैं जो अपनी तरह दिखने वाले, मगर थोड़े कम आकर्षक डिकॉय के साथ रहता हो.
टिंडर पर लोगों की प्रोफाइल से गुजरते हुए किसी के आकर्षण के बारे में आपकी धारणा उससे पहले या बाद में आने वाले व्यक्ति पर निर्भर करेगी.
राजनीतिक इस्तेमाल
डिकॉय इफेक्ट चुनावों में हमारे मतदान और भर्ती के फ़ैसलों को भी प्रभावित कर सकता है.
इन परिस्थितियों में "डिकॉय" जानबूझकर शामिल किए जाने की बजाय आकस्मिक रूप से प्रकट हुआ लग सकता है.
अगर आपके सामने दो उम्मीदवार एक जैसे आएं और उनमें से एक थोड़ा बेहतर हो तो उसके अन्य प्रतिद्वंद्वियों के मुक़ाबले आप उसे ज़्यादा पसंद करने लगेंगे.
नौकरी पर रखने के फ़ैसलों पर डिकॉय इफेक्ट कैसे काम करता है, इस पर शोध कर चुकी चांग को लगता है कि यह विशेष मुद्दा बन सकता है क्योंकि अब एल्गोरिद्म से उम्मीदवारों की छंटाई होती है और भर्ती करने वालों के सामने विकल्प प्रस्तुत किए जाते हैं.
वह कहती हैं, "ऐसा हो सकता है कि आप डिकॉय को शामिल करते हुए विकल्प प्रस्तुत करें और इस तरह कुछ लोगों को आगे बढ़ा दें."
सकारात्मक पहलू
डिकॉय इफेक्ट के सकारात्मक पहलू भी हैं. ब्रिटेन के वैज्ञानिक इसका इस्तेमाल लोगों को स्वस्थ जीवन विकल्पों को अपनाने के लिए प्रेरित करने में करने की सोच रहे हैं.
यूनिवर्सिटी कॉलेज लंदन में व्यवहार विज्ञान एवं स्वास्थ्य के रीडर क्रिश्चियन वोन वैग्नर ने हाल ही में कोलोरेक्टल कैंसर की एक अहम- मगर अप्रिय- जांच से गुजरने के प्रति लोगों के इरादों को परखा.
उन्होंने पाया कि जांच कराने या नहीं कराने का विकल्प होने पर कई लोगों ने जांच नहीं कराने का विकल्प चुना.
जब लोगों को एक कम सुविधाजनक अस्पताल में लंबे इंतज़ार के बाद जांच कराने का तीसरा विकल्प (डिकॉय) दिया गया तो वे पहले अस्पताल में जांच के लिए तैयार होने लगे.
ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि उनको पहले अस्पताल का विकल्प अब कम बोझिल लगने लगा.
वॉन वैग्नर ने महिला प्रतिभागियों को महिला डॉक्टर (टारगेट) से जांच कराने के साथ-साथ पुरुष डॉक्टर (डिकॉय) से जांच कराने का विकल्प दिया.
इस बार भी डिकॉय की मौजूदगी ने महिलाओं को जांच प्रक्रिया से गुजरने के इरादों को बढ़ा दिया.
वॉन वैग्नर का कहना है कि यह डिकॉय इफेक्ट होने का स्पष्ट सबूत है. यह दूसरी रणनीतियों की तुलना में अधिक प्रभावी साबित हुआ है.
संभलकर चुनिए
डिकॉय इफेक्ट जान भी बचा सकता है, लेकिन इसके सिद्धांतों को हमें अपने व्यक्तिगत और पेशेवर जीवन के कौशल में शामिल करना होगा.
यदि आप अपने दोस्तों के साथ घूमने-फिरने की योजना बना रहे हैं और कहां जाना है यह तय नहीं हो पाया है तो आप अपनी पसंद के शहर के दो विकल्प रख सकते हैं, जिसमें एक विकल्प थोड़े महंगे होटल का हो.
यदि आपके दोस्तों ने किसी दूसरे शहर को चुना हो तो भी दो होटलों की तुलना होने पर वे आपके पसंदीदा शहर को चुन सकते हैं.
बस ख़ुद इसके शिकार मत बन जाइए. आप चाहें कोई हेडफोन ख़रीद रहे हों या कोई रिटायरमेंट प्लान चुन रहे हों, ख़ुद से पूछिए कि क्या आप वही विकल्प चुन रहे हैं जिसकी आपकी ज़रूरत है या जो आपको चाहिए या आप किसी अतिरिक्त विकल्प से विचलित हो गए हैं.
जिस तरह एक विशेषज्ञ स्नाइपर को झूठे टारगेट से बचने का प्रशिक्षण दिया जाता है, उसी तरह आप पाएंगे कि आपके फ़ैसले अचानक बहुत पैने हो गए हैं.
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