क्या रोज़ाना सिर्फ़ एक घंटे पढ़कर भी कामयाब हुआ जा सकता है?

    • Author, ज़ारिया गॉर्वेट
    • पदनाम, बीबीसी कैपिटल

बराक ओबामा से लेकर इलोन मस्क तक दुनिया के कई ताक़तवर लोग कहते हैं कि उन्हें पढ़ने से प्यार है. क्या रोज़ाना एक घंटे की पढ़ाई में ही सफलता का राज़ छिपा है?

फरवरी 2018 में इलोन मस्क का फाल्कन हेवी रॉकेट अंतरिक्ष में गया तो अपने साथ अंतरिक्ष यात्रियों के काम आने वाली मशीनें ले जाने की जगह टेस्ला की रोडस्टार कार का मॉडल भी ले गया.

लाल रंग की इस कार की ड्राइवर सीट पर अंतरिक्ष यात्रियों के कपड़े पहने एक पुतला बैठा था.

असली अचंभा ग्लोवबॉक्स में था. उसमें आईसैक ऐसिमोव की फाउंडेशन सिरीज़ की एक किताब रखी थी.

सालों पहले 50 हज़ार साल बाद अंतरिक्ष के एक साम्राज्य से जुड़े इस विज्ञान की कहानी ने ही इलोन मस्क के अंदर अंतरिक्ष यात्रा के प्रति दिलचस्पी जगाई थी.

और अब ये किताब अगले एक करोड़ साल तक सौर-मण्डल में ही तैरती रहेगी, और इस तरह ये अमर हो गई है.

यह क़िताबों की ताक़त है. "स्नो क्रैश" उपन्यास में कल्पना किए गए "अर्थ" सॉफ्टवेयर में गूगल अर्थ की एक झलक थी. ख़ुद सवाल का उत्तर देने वाले टेलीफ़ोन की एक छोटी कहानी ने संभवतः इंटरनेट के आविष्कार को प्रोत्साहित किया था. किताबों ने अनगिनत आविष्कारकों के दिमाग़ में नई खोजों के बीज डाले हैं.

अमरीका के पूर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा का कहना है कि पढ़ाई ने ही उन्हें सिखाया कि वह कौन हैं और किसमें विश्वास करते हैं.

अगर आपकी इतनी बड़ी महत्वाकांक्षाएं न भी हों तो किताबें पढ़ने से आपके करियर को बढ़ावा तो ज़रूर मिलता है.

पढ़ने की आदत तनाव कम करती है, दिमाग़ को सक्रिय रखती है और आपके संवेदना के स्तर को भी सुधारती है. साथ ही किताबों में दर्ज सूचनाएं तो आपको मिलती ही हैं.

किताबें आपको विशिष्ट लोगों के क्लब में शामिल करा सकती हैं.

संवेदना के लिए पढ़ें

व्यापार जगत पारंपरिक रूप से भावनात्मक मेधा को हाशिए पर रखकर आत्मविश्वास और महत्वपूर्ण निर्णय लेने की क्षमता को तरज़ीह देता है.

लेकिन हाल के वर्षों में भावनात्मक मेधा को एक महत्वपूर्ण कौशल के रूप में देखा जाने लगा है.

मानव संसाधन सलाहकार कंपनी डेवलपमेंट डाइमेंशन्स इंटरनेशनल के 2016 के एक अध्ययन के मुताबिक़ जो लीडर संवेदनाओं को समझते हैं वे अन्य के मुक़ाबले 40 फीसदी आगे निकल जाते हैं.

सामाजिक मनोवैज्ञानिक डेविड किड का कहना है कि काल्पनिक कहानियां पढ़ने से हम नियमित रूप से दूसरे लोगों के अनूठे अनुभवों से गुज़रते हैं.

न्यूयॉर्क के दि न्यू स्कूल फ़ॉर सोशल रिसर्च ने अपने एक सहकर्मी के साथ मिलकर डेविड किड ने यह जांचा कि क्या किताबें पढ़ने से तथाकथित मन में चलने वाले सिद्धांतों में सुधार हो सकता है.

यह मोटे तौर पर समझने की क्षमता है कि दूसरे लोगों में विचार और इच्छाएं हैं और वे आपके विचारों और इच्छाओं से अलग हो सकते हैं. यह संवदेना नहीं है, लेकिन ये दोनों कौशल एक-दूसरे से निकटता से जुड़े हुए हैं.

किड ने प्रतिभागियों को चार्ल्स डिकेंस की "ग्रेट एक्सपेक्टेशन्स" जैसी पुरस्कृत साहित्यिक कथाएं या लोकप्रिय कहानियां (जैसे अपराध कथाएं या रोमांटिक उपन्यास) पढ़ने को कहा.

दूसरे प्रतिभागियों को कोई एक नॉन-फिक्शन किताब पढ़ने को कहा गया. उन्हें कुछ भी न पढ़ने का भी विकल्प दिया गया.

फिर यह जांचने के लिए उनका परीक्षण किया गया कि क्या उनके मन के सिद्धांत में सुधार हुआ है.

इस अध्ययन के पीछे विचार यह था कि क्या वास्तव में अच्छा लेखन, जिसे पुरस्कारों के लिए चुना जाता है, ज़्यादा यथार्थवादी पात्रों को सामने लाते हैं, जिनके मन से पाठक जुड़ सकते हैं और जो दूसरों के बारे में हमारी समझ विकसित करने में मददगार होते हैं.

सामान्य काल्पनिक कथाओं में यह बात नहीं होती. इन्हें आलोचकों का समर्थन नहीं मिलता.

शोधकर्ताओं को लगता है कि शायद ऐसे लेखन की गुणवत्ता कम होती है और इनके चरित्र एक-आयामी होते हैं जो पूर्वानुमानित तरीक़े से काम करते हैं.

किड के अध्ययन के परिणाम हैरान करने वाले थे. आलोचकों द्वारा सुझाए गए साहित्य के पाठकों ने हर परीक्षण में उच्चतम स्कोर बनाए.

जो सामान्य कहानियां पढ़ रहे थे या जिन्होंने कुछ नहीं पढ़ा था, वे पिछड़ गए.

शोधकर्ताओं ने सीधे तौर पर यह नहीं मापा कि वास्तविक दुनिया में मन का यह सिद्धांत कैसे काम करता है, लेकिन किड का कहना है कि नियमित पढ़ना, पाठकों की संवेदना का स्तर बढ़ता है.

"ज़्यादातर लोग, अगर वे यह जानते हैं कि लोग कैसा महसूस कर रहे हैं तो वे इन सूचनाओं का उपयोग समाज की बेहतरी के लिए करते हैं."

सहकर्मियों और कर्मचारियों से रिश्ते सुधारने की क्षमता बढ़ाने के साथ-साथ समानुभूति अधिक सफल बैठकों और सहयोगों में सहायक हो सकती है.

किड का कहना है कि जिन समूहों में असहमति प्रकट करने की आज़ादी होती है, वहां लोग ज़्यादा उत्पादक होते हैं- ख़ासकर रचनात्मक कार्यों में. यह बात शोध प्रमाणित है.

"मुझे लगता है कि यह एक उदाहरण है जहां अन्य लोगों के अनुभवों के प्रति आपकी संवेदनशीलता और उसमें रुचि कार्यस्थलों पर सहायक हो सकती है."

उत्साही पाठकों के टिप्स

ब्रिटिश मीडिया नियामक ऑफ़कॉम ने 2017 में 1875 लोगों के बीच एक सर्वे कराया था. इसके मुताबिक़ ब्रिटिश वयस्क हर दिन औसत रूप से दो घंटे 49 मिनट फ़ोन पर बिताते हैं.

एक घंटे किताब पढ़ने के लिए उनको अपना स्क्रीनटाइम बस एक तिहाई घटाना होगा.

अगर आपने यह सोचकर ढेरों किताबें इकट्ठा की हैं कि एक दिन उनका ज्ञान ख़ुद ब ख़ुद आपके दिमाग़ में घुस जाएगा या फिर किसी किताब के बारे में बहुत प्रचार करके भी आपने सिर्फ़ पहला पन्ना पढ़ा है तो आपके लिए कुछ टिप्स हैं.

ये टिप्स उत्साही पाठकों ने तैयार किए हैं-

1. पढ़िए क्योंकि आप पढ़ना चाहते हैं

क्रिस्टिना चिपरिकी ने चार साल की उम्र में पढ़ना सीखा था. जैसे-जैसे उनके नये जुनून ने ज़ोर पकड़ा, उन्होंने घर में रखी सभी किताबें पढ़ डालीं.

वे कहती हैं, "जब मैं प्राइमरी स्कूल में पहुंची और पढ़ना अनिवार्य हो गया तो अपनी भाषा शिक्षक के कारण किताबें पढ़ने से एक विकर्षण शुरू हो गया. उसके बाद मैं किताबें पढ़ने से बचने लगी."

किताबों से यह विरोध करीब 20 साल तक रहा. फिर धीरे-धीरे उनको अहसास हुआ कि वह क्या खो रही हैं. पढ़ने वाले लोग कहां तक आगे निकल गए और किताबों की शिक्षा उनके करियर को बदल सकती थी.

उन्होंने किताबों से फिर से प्यार करना सीखा और सीईओ लाइब्रेरी की स्थापना की.

यह एक वेबसाइट है जो उन किताबों के बारे में बताती है जिन्होंने दुनिया के सबसे क़ामयाब लोगों के करियर को बनाया है. ऐसे लोगों में लेखक से लेकर नेता और निवेश प्रबंधक तक शामिल हैं.

चिपरिकी में आए इस बदलाव के पीछे कई कारण थे. कुछ शुभेच्छुओं ने उनको इसकी सलाह दी थी. उन्होंने एक ऑनलाइन कोर्स में निवेश करने का फ़ैसला किया था, जहां उनको एक अलग शिक्षण प्रणाली का पता चला.

मार्केटिंग कल्चर पर कई किताबों के लेखक रेयान होलीडे का ब्लॉग पढ़ने से भी उनको प्रेरणा मिली.

इस कहानी का मर्म यह है कि पढ़िए क्यों आप पढ़ना चाहते हैं. इस आदत को छूटने न दें.

2. वैसे पढ़ें जो आपके काम आए

पुस्तक प्रेमी कहलाने के लिए हर वक़्त बगल में किताबें दबाकर घूमने की ज़रूरत नहीं है. इसके लिए किताबों के पहले संस्करण के पीछे भागने की भी ज़रूरत नहीं है.

किड कहते हैं, "मुझे घर से दफ़्तर आने-जाने में दो-दो घंटे लगते है. यह पढ़ने का आदर्श समय नहीं है, लेकिन मेरे पास ढेर सारा समय रहता है."

जब वह सफ़र कर रहे होते हैं (ड्राइविंग नहीं) तो उनके लिए किताबों की जगह फोन स्क्रीन पर पढ़ना सुविधाजनक होता है.

नॉन फिक्शन साहित्य पढ़ते समय आसपास के लोगों की ताक-झांक से बचने के लिए वह किताबों के ऑडियो वर्जन पर चले जाते हैं.

3. अपने लिए डरावने लक्ष्य न बनाएं

सीईओ की आदतों पर चलना ख़तरनाक हो सकता है. सीईओ लाइब्रेरी के लिए इंटरव्यू देने वाले दो बेहद ही सफल सीईओ में से एक हैं फैब्रिस ग्रिंडा.

टेक उद्यमी ग्रिंडा ने क्रेडिट कार्ड पर एक लाख डॉलर (77 हजार पाउंड) के कर्ज़ से शुरुआत की थी. हाल में उन्होंने अपने सफल निवेशों में अपना हिस्सा बेचकर 30 करोड़ डॉलर जुटाए हैं. उद्यमी और समाजसेवी नवीन जैन ने मून एक्सप्रेस का गठन किया था. सिलिकॉन वैली का यह स्टार्ट-अप चंद्रमा पर प्राकृतिक संसाधनों की खुदाई करने की उम्मीद रखता है.

ग्रिंडा हर साल 100 किताबें पढ़ते हैं. नवीन जैन हर सुबह 3 घंटे पढ़ने के लिए सुबह 4 बजे जगते हैं. लेकिन सबके लिए ऐसा करना जरूरी नहीं.

आंद्रा ज़हारिया एक फ्रीलांस कंटेंट मार्केटर, पॉडकास्ट होस्ट और जुनूनी पाठक हैं. उनकी सलाह है कि अवास्तविक उम्मीदों और डरावने लक्ष्यों से बचना चाहिए.

वह कहती हैं, "रोज़ाना पढ़ने की शुरुआत छोटे से हो."

ज़हारिया का सुझाव है कि दोस्तों से अच्छी किताबों के बारे में पूछें और एक या दो पन्ने पढ़ने से ही शुरुआत करें.

"आपको गुडरीड्स पर जाकर साल में 60 किताबें पढ़ने का लक्ष्य तय करने की जरूरत नहीं है. किंडल पर किताबें पढ़ना आसान हो सकता है क्योंकि आप बचे हुए पन्नों की संख्या आसानी से नहीं देख सकते."

4. यदि वास्तव में पढ़ना मुश्किल है तो "50 का नियम" लागू करके देखें

यदि आप किसी किताब के 4 पन्ने पढ़ने के बाद ही उसे छोड़ देने के लिए तैयार हैं या मोटी किताब के पन्ने जल्दी-जल्दी पलटकर उसे ख़त्म कर देना चाहते हैं तो विचार यह है कि उसके 50 पन्ने पढ़ें.

50 पन्ने पढ़ने के बाद मैरी कोंडो के शब्दों में यदि वह किताब खुशी बिखेरती है तो उसे पढ़ें. अगर ऐसा नहीं होता है तो उसे छोड़ दें.

इस रणनीति की खोज लेखक, लाइब्रेरियन और साहित्यिक समीक्षक नैंसी पर्ल ने की थी. उन्होंने अपनी किताब "बुक लस्ट" में इसकी व्याख्या की है.

इसमें 50 साल से ज़्यादा उम्र के लोगों के लिए एक पूर्व-शर्त भी शामिल है. नैंसी का सुझाव है कि ऐसे लोगों को 100 में से अपनी उम्र के साल की संख्या घटानी चाहिए. जो संख्या आती है उतने पन्ने पढ़कर ही वे किसी किताब के बारे में फ़ैसला कर सकते हैं कि किताब आगे पढ़ी जाए या नहीं.

क्योंकि बूढ़े होने पर ज़िंदगी के दिन इतने कम बचे रहते हैं कि उसे बुरी किताबों पर ख़र्च नहीं किया जा सकता.

तो रणनीति तैयार है. मोबाइल फोन को एक घंटे के लिए अपने हाथ से दूर करें और हथेलियों में कोई किताब थाम लें.

यह आपकी संवेदना के स्तर को बढ़ा सकती है, आपको ज़्यादा उत्पादक बना सकती है. यदि दुनिया के सबसे ज़्यादा व्यस्त और क़ामयाब लोग इसे कर सकते हैं तो आप भी कर सकते हैं.

कौन जानता है कि अतिरिक्ति ज्ञान और प्रेरणा का आप क्या करें. हो सकता है कि आप भी अंतरिक्ष तक पहुंचने का अपना उद्यम शुरू कर दें.

(ये बीबीसी कैपिटल की स्टोरी का शब्दश: अनुवाद नहीं है. भारतीय पाठकों के लिए इसमें कुछ संदर्भ और प्रसंग जोड़े गए हैं. मूल कहानी पढ़ने के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. बीबीसी फ़्यूचर की बाकी कहानियां आप यहां क्लिककरके पढ़ सकते हैं.)

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