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क्या संयुक्त अरब अमीरात अब भी है मोटी तनख्वाह पाने वाली जगह
- Author, लुइस रेडवर्स
- पदनाम, बीबीसी कैपिटल
संयुक्त अरब अमीरात यानी यूएई में दो साल रहने के बाद एलिसन सिमंड्स इस साल मार्च में ब्रिटेन लौट आईं.
कम्युनिकेशन कंसल्टेंट के रूप में उन्होंने कई बार खाड़ी देशों के दौरे किए थे. 2016 में वह स्थायी रूप से दुबई शिफ्ट हो गई थीं कि अब वह वहीं रहेंगी और वहीं काम करेंगी.
व्यक्तिगत और व्यावसायिक नेटवर्क होने के बावजूद सिमंड्स को अच्छी नौकरी पाने में 12 महीने से ज़्यादा लग गए. वह नौकरी भी सिर्फ़ एक साल के कॉन्ट्रैक्ट वाली थी.
उनकी तनख़्वाह ब्रिटेन से ज़्यादा थी क्योंकि दुबई में टैक्स नहीं देना पड़ रहा था. लेकिन कम अवधि के कॉन्ट्रैक्ट की वजह से नौकरी सुरक्षित नहीं थी.
वह कार और घर के लिए महंगा किराया दे रही थीं. अगर वह सालाना लीज़ करतीं तो ख़र्च कम होता.
45 साल की सिमंड्स ने कॉन्ट्रैक्ट खत्म होने के 8 हफ्ते पहले से नई नौकरी ढूंढ़नी शुरू कर दी. वह कहती हैं, "अच्छी तनख़्वाह नहीं मिल रही थी, इसलिए मैं घर लौट आई."
वह कहती हैं, "मैं भविष्य में फिर वहां जा सकती हूं लेकिन अभी वहां जाने का सही समय नहीं है. बहुत सारे लोग वहां से जा रहे हैं. अनुभवी और काबिल लोग भी नई नौकरी के लिए जूझ रहे हैं."
नियोक्ताओं का बाज़ार
तेल से अमीर हुए संयुक्त अरब अमीरात में सभी स्तरों पर अलग-अलग देशों के लाखों लोग काम करते हैं. उन्हें टैक्स-फ्री तनख़्वाह का लालच रहता है.
विदेशी मुख्य रूप से अबूधाबी और दुबई के मुख्य व्यावसायिक केंद्रों में रहते हैं. दुबई सैलानियों की भी पसंदीदा जगह है. लोग समंदर किनारे बने लग्जरी रिजॉर्ट, गगनचुंबी इमारतें और शॉपिंग मॉल्स देखने यहां आते हैं.
विदेशियों ने अमीरात को बसाने और यहां की आबादी बढ़ाने में मदद की है. 1980 में यहां सिर्फ़ 10 लाख लोग रहते थे. आज इसकी आबादी 95 लाख है.
यूएई को वर्षों तक ऐसे देश के रूप में जाना जाता रहा जहां पेशेवर कामगार ज्यादा पैसे कमा सकते हैं. सैलरी के पैकेज में घर, बच्चों की पढ़ाई, इलाज खर्च, कार और आने-जाने का खर्च शामिल होता था.
बचत करने वालों की बचत होती थी और मौज़ की ज़िंदगी बिताने वालों को उनकी पसंदीदा जीवन-शैली मिलती थी.
तेल की कीमत घटने से खाड़ी के दूसरे देशों की तरह संयुक्त अरब अमीरात की अर्थव्यवस्था भी दबाव में आ गई. रियल एस्टेट में मंदी आ गई और तनख़्वाह घटने लगी.
लंदन में इकोनॉमिस्ट इंटेलीजेंस यूनिट की विश्लेषक केरेन उज़ियेल कहती हैं, "2018 में तेल की कीमतें बढ़ने के बाद भी आर्थिक विकास दर कम ही रही."
वह इसके पीछे ओपेक (OPEC) देशों के तेल उत्पादन में कटौती, क़तर के साथ राजनयिक संबंध बिगड़ने और ईरान पर अमरीकी पाबंदियों का हाथ मानती हैं. इन सबसे खाड़ी देशों में व्यापार पर असर पड़ा, खासकर दुबई पर.
तेल की कीमत घटने से राजस्व को हुए नुकसान की भरपाई के लिए सरकार ने जनवरी में 5 फीसदी वैट (VAT) लगा दिया.
उज़ियेल के मुताबिक इससे यह धारणा बनी कि यूएई एक महंगा व्यापारिक केंद्र बन रहा है. टैक्स लगाने से खाना, छुट्टियां और घर के सामान महंगे हो गए, जिससे उनकी मांग घट गई.
अंतररराष्ट्रीय मुद्रा कोष के मुताबिक 2019 में यूएई की जीडीपी विकास दर 3.7 फीसदी रहेगी जिसे एक अच्छी विकास दर कहा जा सकता है.
लेकिन, स्थानीय बैंक एमिरेट्स एनबीडी ने नवंबर में दुबई इकोनॉमिक ट्रैकर इंडेक्स निकाला तो पता चला कि निजी क्षेत्र की विकास दर ढाई साल से सबसे कम रह गई है. रोजगार इंडेक्स भी लगातार दूसरे महीने नीचे गया है.
वॉल स्ट्रीट जर्नल में हाल ही में छपे एक लेख के मुताबिक दुबई में "व्हाइट कॉलर मंदी" आ गई है.
एक स्थानीय अर्थशास्त्री कहते हैं कि मंदी के बारे में बढ़ा-चढ़ाकर बातें की जा रही हैं. वह विकास दर के बारे में "सतर्क आशावादी" हैं, फिर भी वह मानते हैं कि अर्थव्यवस्था परिपक्व होने के कारण सुधार के दौर से गुजर रही है.
मध्यपूर्व में रिक्रूटमेंट फर्म हेय्ज़ के मैनेजिंग डायरेक्टर क्रिस ग्रीव्स कहते हैं कि इस समय कंपनियां खर्च बचाने पर ध्यान दे रही हैं.
हेय्ज़ की 2018 सैलरी एंड एम्प्लॉयमेंट रिपोर्ट के मुताबिक उनके सर्वे में शामिल एक तिहाई कंपनियां छंटनी कर रही हैं. आधे से ज़्यादा कंपनियों ने कहा कि वे तनख़्वाह नहीं बढ़ा रही हैं.
ग्रीव्स कहते हैं, "कुछ कंपनियां तनख़्वाह घटा रही हैं ताकि उन्हें छंटनी न करनी पड़े. कंपनियां नये आवेदकों को उनकी मौजूदा तनख़्वाह से कम सैलरी ऑफ़र कर रही हैं और वे मंजूर कर रहे हैं. अभी यह निश्चित तौर पर नियोक्ता बाज़ार है."
घटती तनख़्वाह
दुबई स्थित एचआर मैनेजमेंट फर्म जीजीसी कंसल्टेंसी की पार्टनर रोहिणी गिल कहती हैं कि यूएई का जॉब मार्केट पिछले कुछ साल में बहुत बदल गया है.
वह कहती हैं, "यूएई को अब कठिनाइयों से भरी जगह नहीं माना जाता जैसा पहले माना जाता था. इसलिए अब बड़े पैकेज, जिसमें स्कूल फीस, स्वास्थ्य बीमा, घर किराया शामिल होता था, अब नहीं मिलते. यहां रहना महंगा भी है. इसे देखते बहुत से लोगों के लिए अब यहां काम करना आर्थिक रूप से फ़ायदेमंद नहीं है."
यहां जबरदस्त प्रतियोगिता भी है. गिल के मुताबिक एक नौकरी के लिए 5,000 आवेदन आ सकते हैं. दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों के आवेदक कम तनख़्वाह पर भी काम करने को तैयार हैं.
ब्रिटेन के हार्टलपूल की मीडिया कंटेंट विशेषज्ञ स्टेफनी ह्यूग्स चार साल पहले दुबई आई थीं. उनके पति कंस्ट्रक्शन में काम करते हैं.
स्टेफनी दो बच्चों की मां हैं. वह बताती हैं, "फिलहाल बाज़ार बहुत मंदा है. मैं जानती हूं कि लोग यहां से इसलिए जा रहे हैं क्योंकि उन्हें काम नहीं मिल रहा या अच्छे पैसे नहीं मिल रहे."
"मैं जो भी नौकरी देख रही हूं उसमें 25 से 30 फीसदी कम सैलरी ऑफ़र की जा रही है. अगर बच्चों की स्कूल फीस और स्वास्थ्य बीमा का प्रीमियम खुद ही भरना हो तो इतने में गुजारा नहीं होगा."
कुछ साल पहले तक यूएई की पहचान जल्दी अमीर बनाने वाली जगह के रूप में थी.
डिजिटल मार्केटिंग के एक एक्जीक्यूटिव (जिन्होंने अपना नाम बताने से मना कर दिया) कहते हैं कि पहले जो अनाप-शनाप सैलरी मिलती थी, उसमें सुधार होना लाजिमी था क्योंकि यह बाज़ार परिपक्व हो चुका है.
लेकिन, उनको लगता है कि चीजें दूसरी दिशा में कुछ ज्यादा चली गई हैं. वह कहते हैं, "कंपनियां क्या चाहती हैं और वह कितना देने के लिए तैयार हैं, ये दो अलग चीजें हैं."
10 साल पहले दुबई आए 45 साल के इस एक्जीक्यूटिव ने अब तक छह नौकरियां बदली हैं.
वह अब भी उससे ज्यादा कमा रहे हैं जितना वह ब्रिटेन में कमाते थे. लेकिन, उनकी सैलरी 10 साल पहले की उनकी पहली नौकरी से कम है. अभी की नौकरी पाने से पहले उनको 14 महीने बेरोजगार भी रहना पड़ा था.
वह कहते हैं, "वो बहुत मुश्किल दिन थे और हमारी बचत का बड़ा हिस्सा चला गया." मैटर्निटी लीव के बाद उनकी पत्नी का काम भी छूट गया जिससे दबाव और बढ़ गया था.
जिन लोगों ने दुबई में घर बसा लिया है, उनके लिए वापस अपने देश जाना आसान नहीं होता. हो सकता है कि अपने देश में उनके पास घर न हो. उनके पास घर वापसी के पैसे न हों या बच्चों के लिए सही स्कूल नहीं मिल रहा हो.
सस्ते श्रमिक?
फ़िलिपिना हन्नाह ज़राह भट्टी तीन साल पहले दुबई आई थीं. उनकी मां ने तीन दशक तक अमीरात में काम किया था.
भट्टी को एक रिटेल फ़ैशन ब्रांड के लिए सोशल मीडिया का काम मिला. अब वह 28 साल की हो चुकी हैं और एक होटल ब्रांड के लिए मार्केटिंग करती हैं.
उन्हें हर महीने 10 हजार दिरहम (2,720 डॉलर या 2,130 पाउंड) की तनख़्वाह मिलती है. फ़िलीपींस में उनको जो सैलरी मिलती यह उसकी तीन गुना है.
पश्चिमी देशों के लोग भट्टी जैसे कामगारों को ख़तरा मानते हैं क्योंकि वे कम सैलरी पर भी काम करने को तैयार रहते हैं.
भट्टी को भी लगता है कि दूसरे देशों के उनके सहकर्मियों को जितनी तनख़्वाह मिलती है, उतनी उनको नहीं मिलती.
गिल बताती हैं कि एमबीए की डिग्री वाले कुछ भारतीय 7,000 दिरहम (1,900 डॉलर या 1,480 पाउंड) में भी वित्तीय सहायक की नौकरी के लिए तैयार रहते हैं.
यह काम पहले यूरोपीय करते थे, जिनमें से कुछ के पास डिग्री भी नहीं होती थी, लेकिन वे इससे दोगुनी सैलरी लेते थे.
भट्टी को लगता है कि उनकी राष्ट्रीयता और सस्ता होने की वजह से उनकी मांग ज्यादा है, लेकिन उनको लगता है कि पासपोर्ट के रंग के आधार पर किसी को कम पैसे देना सही नहीं है.
वह कहती हैं, "मैं खुश हूं कि मेरे पास एक नौकरी है लेकिन यहां रहना महंगा है और मैं अपने परिवार के लिए ज़्यादा पैसे नहीं भेज पाती हूं."
भट्टी के पास वापस फिलीपींस जाने का भी विकल्प नहीं है क्योंकि वहां सैलरी और कम है और सामाजिक चुनौतियां भी बहुत हैं.
क्रिस ग्रीव्स के मुताबिक अमीरात में सैलरी घट रही है, लेकिन ब्रिटेन, यूरोप, ऑस्ट्रेलिया और अमरीका के मुक़ाबले यहां सैलरी अब भी ज़्यादा है और सबसे अहम यह कि यहां की सैलरी टैक्स-फ्री है.
वह कहते हैं, "काम करने के लिए यह अब भी आकर्षक जगह है, भले ही कंपनियां अब मोटे पैकेज नहीं दे रही हैं. हमें अब भी हजारों सीवी मिलते हैं, मतलब लोगों की चाहत बरकरार है."
यूएई की अर्थव्यवस्था पहली बार डांवाडोल नहीं हुई है. 2009 में वैश्विक वित्तीय संकट के दौरान भी यहां संकट आया था.
फलते-फूलते बाज़ार का गुब्बारा रातों-रात फूट गया था. नये और कड़े कानून बनाकर पहले की गलतियों को सुधारा गया.
नई मंदी के बाद सरकार ने 13 अरब डॉलर के प्रोत्साहन पैकेज का ऐलान किया है.
कुछ व्यापारिक क्षेत्रों में 100 फीसदी विदेशी स्वामित्व की मंजूरी दी गई है. वीज़ा कानूनों को आसान बनाया गया है. बिजनेस रजिस्ट्रेशन फीस और दूसरे प्रशासनिक खर्चों को कम किया गया है.
इन उपायों से अमीरात कारोबारियों के लिए आकर्षक जगह बन सकता है. उम्मीद है कि कंपनियां नई भर्तियां भी करेंगी और यहां का जॉब मार्केट पहले की तरह प्रतियोगी बना रहेगा.
गिल कहती हैं, "यहां नौकरी करने से पहले आपको अपना होमवर्क करने की जरूरत है. यह एक महंगी जगह है. हम जानते हैं कि लोग यहां बचत की योजना बनाकर आते हैं लेकिन अपने खर्चों को पूरा करने के लिए अपनी बचत भी गंवाते रहते हैं."
उधर ब्रिटेन में सिमंड्स को लगता है कि अमीरात में उनका समय बहुत अच्छा था, लेकिन वह तुरंत ही दूसरों को सावधान करती हैं कि वे वहां नौकरी करने के ख़तरे ना उठाएं.
सिमंड्स कहती हैं, "मैं किसी को यह सलाह नहीं दूंगी कि वह अच्छी सैलरी के बिना वहां नौकरी खोजे, क्योंकि आप तुरंत ही कर्ज के चक्कर में फंस जाएंगे. दुबई की सड़कों पर सोने के पत्तर लगे होने की बातें 2016 में ही पुरानी हो चुकी थीं. अब तो मैं कहूंगी कि सोना नज़रों से भी ओझल हो चुका है."
(यह लेख बीबीसी कैपिटल की कहानी का अक्षरश: अनुवाद नहीं है. हिंदी पाठकों के लिए इसमें कुछ संदर्भ और प्रसंग जोड़े गए हैं. मूल लेख आप यहांपढ़ सकते हैं. बीबीसी कैपिटलके दूसरे लेख आप यहां पढ़ सकते हैं.)
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