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कितना ख़तरनाक हो सकता है दफ़्तर में गुस्से को दबाना
- Author, केरेन लीवी
- पदनाम, बीबीसी कैपिटल
कल्पना कीजिए कि आप 35 हज़ार फुट की ऊंचाई पर उड़ रहे हैं. विमान में आप एक ट्रॉली को धक्का दे रहे हैं, तभी रास्ते में एक बच्चा आ जाता है. उसके मां-बाप का कहीं पता नहीं है.
वहीं दूसरे मुसाफ़िर बेक़रार हो रहे हैं. एक यात्री इस बात पर नाराज़ है कि वो सफ़र के दौरान अपने खाने का बिल नक़द नहीं भर सकता. वहीं दूसरे को टॉयलेट जाना है.
आपकी ज़िम्मेदारी ये है कि आपको सबकी सुननी है. उनकी मुश्किलों का हल ढूंढना है और इस दौरान आपको लगातार दोस्ताना बर्ताव करना है.
विमान में काम करने वालों के लिए ये करना बहुत जज़्बाती चुनौती होती है और मनोवैज्ञानिक इसे 'इमोशनल लेबर' यानी जज़्बाती मेहनत कहते हैं.
मशहूर अमरीकी समाजशास्त्री आर्ली होशचाइल्ड ने ये जुमला गढ़ा है.
वो इसे समझाते हुए कहती हैं कि जब हम अपने कामकाज की जगह पर सार्वजनिक रूप से अपनी नाराज़गी का इज़हार करने के बजाय अपने भावों को दबाने की जद्दोज़हद करते हैं, तो उसे जज़्बाती मेहनत कहते हैं.
सरल शब्दों में समझाएं तो इसका मतलब ये है कि जब हम वो बर्ताव करते हैं, जो असल मे हमारे दिल में नहीं होता, जिसे हम महसूस नहीं करते, तो वो हमारा 'इमोशनल लेबर' होता है.
दफ़्तर मे हम अक्सर ऐसे हालात का सामना करते हैं. हम बुरा महसूस कर रहे होते हैं, लेकिन ऊपरी तौर पर ख़ुद को ख़ुश ज़ाहिर करते हैं.
हर पेशे में लोग दबाते हैं अपना गुस्सा
आर्ली होशचाइल्ड ने इस बारे में शुरुआती रिसर्च एयरलाइंस में काम करने वालों पर की थी. लेकिन आज जानकार ये कहते हैं कि कमोबेश हर पेशे में लोग ऐसा करते हैं जब वो भीतर से कुढ़ रहे होते हैं. लेकिन ऊपरी तौर पर मुस्कान बिखेरते चलते हैं.
हक़ीक़त ये है कि आप जो भी काम करते हों, आप काम के एक बड़े वक़्त के दौरान ऐसी जज़्बाती मेहनत करते हैं.
इस मामले की शुरुआती रिसर्च में ज़ोर उन पेशों पर था, जो सर्विस सेक्टर का हिस्सा हैं क्योंकि माना ये जाता था कि आपका पाला जितने ही ग्राहकों से पड़ता है, आपको उतना ही इमोशनल लेबर करना होता है.
लेकिन, हालिया रिसर्च ये बताती हैं कि दूसरे पेशों और कारोबार में भी कर्मचारियों को इस चुनौती का सामना करना पड़ता है. इसका इस बात से ताल्लुक़ नहीं है कि आप कितने लोगों से बातचीत करते हैं.
हो सकता है कि आज सुबह दफ़्तर में आपने सहयोगी को ये जताया हो कि वो जो भी कह रहे हैं, उसे आप दिलचस्पी से सुन रहे हैं. या फिर आपको अपने बॉस की नाराज़गी से बचने के लिए कड़ी मेहनत करनी पड़ी. इस दौरान आपका मन ज़ोर से चीखने का हो रहा हो, मगर आप अपने होंठ काटकर ही रह गए हों.
जब चेहरे पर लानी पड़ती है झूठी मुस्कान
जानकार चेतावनी देते हैं कि कई मामलों में अपनी नाराज़गी वाले जज़्बात दबाना नुक़सानदेह होता है. इसकी हमारे शरीर और दिमाग़ को भारी क़ीमत चुकानी पड़ सकती है.
हाल ही में मीरा नाम की एक महिला ने मध्य-पूर्व की एक एयरलाइन में नौकरी इसलिए छोड़ दी क्योंकि वो उनकी जज़्बाती सेहत पर भारी पड़ रही थी.
मीरा कहती हैं कि उनकी आख़िरी नौकरी में ग्राहक को भगवान का दर्जा दिया जाता था.
वो बताती हैं, ''एक बार मुझे वेश्या कहा गया. वजह सिर्फ़ ये थी कि जब मैंने एक मुसाफ़िर से पूछा कि उसे कॉफ़ी चाहिए, तो दो बार पूछने पर भी उसने मुझे जवाब नहीं दिया. जब मैं आगे बढ़ गई, तो वो मुझे गालियां देने लगे. जब मैंने इस बात की जानकारी अपने सीनियर को दी तो मुझे कहा गया कि मैंने ज़रूर कुछ ऐसा किया होगा जिससे उस शख़्स ने गालियां दीं...मुझे कहा गया कि मैं जाऊं और उस गाली देने वाले आदमी से माफ़ी मांगूं.''
कई बार सुननी पड़ती हैं गालियां
मीरा कहती हैं, ''कई बार मुझे अपने चेहरे के हाव-भाव बनावटी तरीक़े से बनाने पड़ते थे, जैसेकि हवा में विमान लड़खड़ाने लगे तो, या विमान उतरते वक़्त मुश्किल हो जाए तो. ऐसे मौक़ों पर ख़ुद को शांत रखना पड़ता था ताकि मुसाफ़िर भी घबराएं नहीं. ऐसा करने से मुझे कोई परेशानी नहीं होती थी. मेरी शिकायत ये थी कि मेरे साथ बुरा बर्ताव होने पर मुझे आवाज़ उठाने की मनाही थी.''
नौकरी के दौरान मीरा को कई बार गाली-गलौच का सामना करना पड़ा और हर बार उससे उम्मीद की जाती थी कि वो मुस्कुराती रहें. यानी मीरा को लगातार अपने मन के भाव दबाने पड़ते थे.
लगातार अपने जज़्बात दबाना मीरा के लिए मुश्किल होता जा रहा था. छोटी-छोटी बातें भी बहुत मुश्किल और बड़ी लगने लगी थीं. उनका तनाव और फ़िक्र बढ़ने लगे थे. वो काम पर जाने से घबराने लगी थीं.
मीरा कहती हैं कि, ''मैं हर समय गुस्से में रहती थी. ऐसा लगता था कि किसी भी वक़्त मैं ख़ुद पर कंट्रोल खो दूंगी और किसी को पीट दूंगी, या अगर किसी मुसाफ़िर ने अगली बार मुझे गाली दी तो मैं उसके ऊपर कुछ फेंक दूंगी. ऐसे तनाव से निपटना मुश्किल होता जा रहा था, सो मैंने नौकरी छोड़ने का फ़ैसला किया'.
अब मीरा एक थेरेपिस्ट के पास जा रही हैं ताकि इस जज़्बाती तूफ़ान से निपट सकें. मीरा अपनी परेशानियों के लिए कुछ हद तक परिवार से दूरी और लगातार सफ़र पर रहने को भी ज़िम्मेदार मानती हैं. लेकिन उन्हें ये बात कहने में कोई गुरेज़ नहीं कि अगर उन्हें अपनी भावनाओं का इज़हार करने का मौक़ा मिलता तो वो शायद अभी नौकरी कर रही होतीं.
दो दो चेहरों को लेकर चलने की ज़हमत
ऐसे हालात से गुज़रने वाली मीरा इकलौती कामकाजी नहीं हैं. पूरी दुनिया में बहुत से पेशों में लोगों से उम्मीद की जाती है कि वो ऊपरी तौर पर वैसा बर्ताव करें, जैसा वो भीतर महसूस नहीं करते. उन्हें अपनी महत्वाकांक्षा, आक्रामकता और कामयाबी की भूख को दबाना पड़ता है.
कुछ साल पहले न्यूयॉर्क टाइम्स ने 'अमेज़न वे' यानी अमेज़न में काम करने के तौर-तरीक़ों पर लंबा लेख छापा था. इसमें कंपनी के कर्मचारियों से एक ख़ास तरह का बर्ताव करने के दबाव के असर के बारे में लिखा गया था. अमेज़न के कर्मचारियों पर इसके सकारात्मक और नेगेटिव पहलुओं के बारे में लेख में विस्तार से बताया गया था.
अख़बार ने लिखा था कि कुछ कर्मचारी तो ऐसे माहौल में अच्छा काम करते है. वहीं कुछ मुलाज़िमों के लिए ऐसे दबाव वाले माहौल में काम करना बेहद मुश्किल साबित हुआ.
मनोवैज्ञानिक लूसी लियोनार्ड कहती हैं, ''हम ऐसी जज़्बाती मेहनत का सामना कैसे करते हैं, ये इस बात पर निर्भर करता है कि हमारा बचपन कैसा बीता क्योंकि उसी तजुर्बे से हमारा किरदार और बर्ताव बनता है. हम दूसरों से कैसा व्यवहार करें, ये हम बचपन से ही सीखते हैं.''
लूसी कहती हैं, ''दफ़्तरों में अगर कोई ये सोचने लगे कि मेरा काम अच्छा नहीं है या फिर दूसरे लोग अच्छा काम नहीं करते तो इससे कामकाजी क्षेत्र का तनाव बहुत बढ़ जाता है.''
अक्सर कर्मचारियों से ये अपेक्षा की जाती है कि वो ग़ुस्सा या फ़िक्र जताने वाले ग्राहकों से और अच्छा बर्ताव करें, भले ही वो भीतर कुढ़ रहे हों, चिंतित हों या बदतमीज़ी के शिकार हुए हों.
जज़्बाती मेहनत से बचने का तरीका
होशचाइल्ड कहती हैं कि हम ऐसी जज़्बाती मेहनत वाले हालात से दो तरीक़ों से निपट सकते हैं. ऊपरी तौर पर एक्टिंग कर के या फिर मन ही मन में एक्टिंग कर के.
जैसे कि अगर आप किसी फ़ोन कॉल को अटेंड कर रहे हैं और सामने वाला बेहद ग़ुस्से में है, आप अपनी आवाज़ बदलकर, अपने ग़ुस्से को दबाकर अच्छी-अच्छी बातें कहते हैं.
वहीं, अंदरूनी एक्टिंग वो होती है, जब आप अपने मन के भाव को बदलकर ये समझने की कोशिश करते हैं कि सामने वाला क्या कह रहा है. आप भले ही उसके बात करने के तरीक़े से इत्तेफ़ाक़ न रखते हों, मगर उसकी बात आप को जायज़ लगने लगती है.
दोनों ही बात करने के विनम्र तरीक़े हैं. मगर दूसरे विकल्प को आज़मा कर आप सामने वाले शख़्स से जज़्बाती राब्ता क़ायम कर लेते हैं. इससे आपको उतनी जज़्बाती मेहनत नहीं करनी पड़ती.
जेनिफ़र जॉर्ज लंदन के किंग्स कॉलेज हॉस्पिटल में काम करती हैं. वो नर्स हैं जो मनोवैज्ञानिक बीमारियों के शिकार लोगों की स्पेशलिस्ट हैं. जेनिफ़र को रोज़ाना मरीज़ों की ज़रूरतों का ख़्याल करते हुए फ़ैसले लेने होते हैं. उन्हें तय करना होता है कि किस मरीज़ को भर्ती किया जा सकता है और किसे मामूली देख-भाल की ज़रूरत है. या फिर कहीं वो दवाओं के लिए तो नहीं आए हैं?
जेनिफ़र कहती हैं कि, ''रोज़ाना मेरे अपने अंदाज़े का इम्तिहान होता है. मैं कोशिश करती हूं कि ध्यान से लोगों की बातें सुनूं. इससे मेरा तनाव पूरी तरह तो नहीं, मगर काफ़ी हद तक ख़त्म हो जाता है. कई बार मुझे फ़ौरन अंदाज़ा हो जाता है कि सामने वाला झूठ बोल रहा है. कई बार सामने वाले की बातें सुन कर बोरियत होने लगती है, लेकिन वहां बैठकर मैं किसी को सिरे से झूठा नहीं कह सकती.''
कई बार जेनिफ़र को सीधे ना कहना होता है. ऐसे वक़्त में माहौल कई बार तनाव भरा और शोर-गुल वाला होता है. ऐसे में जेनिफ़र वो बिल्कुल नहीं कहतीं जो वो महसूस नहीं करतीं, जो उन्हें सही नहीं लगता. इस तरह से वो अपनी जज़्बाती मेहनत को कम करती हैं.
बातचीत से निकल सकता है रास्ता
जब मुश्किलें बढ़ जाती हैं तो जेनिफ़र अपनी सहकर्मियों से बात कर के तनाव कम करती हैं. अपना ग़ुस्सा निकाल कर अंदर की चिंता को कम करती हैं.
कैलिफ़ोर्निया में रहने वाली वक़ील रूथ हारग्रोव भी ऐसे हालात का सामना करती हैं. रूथ कहती हैं कि कई बार दूसरे वक़ील आप पर निजी हमले करते हैं. वो ये सोचते हैं कि आप कमज़ोर हैं, महिला हैं, युवा हैं. वो असल मुद्दे से ध्यान भटकाने की कोशिश करते हैं.
रूथ कहती हैं कि, ''पहले ऐसे हालात में मेरी हालत बुरी हो जाती थी. मेरा हौसला कमज़ोर पड़ जाता था. लेकिन अब मैं ऐसे निजी हमले होते ही समझ जाती हूं कि सामने वाला कमज़ोर हालत में है.''
रूथ सामने वाले के बर्ताव पर फ़ोकस करने वाले के बजाय अपने मुवक़्क़िलों के बारे में सोचती हैं. वो उन्हें निर्दोष समझते हुए उनके बचाव में अपनी ताक़त लगाकर अपनी जज़्बाती मेहनत को कम कर लेती हैं.
जिन लोगों को ऑफ़िस में अपने असली मनोभाव छुपाकर नक़ली बर्ताव करना पड़ता है, वो भावनात्मक रूप से जल्दी थक जाते हैं.
इसमें कोई दो राय नहीं कि काम की जगह पर आपका रवैया पेशेवराना होना चाहिए. काम के दौरान हमें ऐसे बहुत से लोगों का सामना करना पड़ता है जिनका रवैया ठीक नहीं होता.
लेकिन हम ख़ुद को उनकी जगह रखकर, उनकी बातें और भावनाएं समझकर अपनी चुनौतियां कम कर सकते हैं. इससे आपकी मानसिक सेहत बेहतर होगी. आप जिन बातों पर यक़ीन नहीं करते, उन्हें समझने में आसानी होगी.
लूसी लियोनार्ड कहती हैं कि ऐसे हालात कम से कम हों, इसके लिए कंपनियों को चाहिए कि वो ओवरटाइम कम कराएं. कर्मचारियो को नियमित रूप से ब्रेक लेने के लिए प्रोत्साहित करें. अपने साथियों से बात करके विवाद का हल करने के लिए उनका हौसला बढ़ाएं.
ऐसे माहौल में लोग एक-दूसरे के प्रति ज़्यादा हमदर्दी रखेंगे.
जहां भी मुमकिन हो, सामने वाले से बातचीत के दौरान हमदर्दी भरी सोच रखें. इससे आपका दिमाग़ी सुकून बना रहेगा.
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