बिना नगदी के सौदा कितना नफ़ा कितना नुकसान?

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- Author, रॉब यंग और विकी ब्रॉडबेंट
- पदनाम, बीबीसी कैपिटल
नरेंद्र मोदी की सरकार भारत की अर्थव्यवस्था को कैशलेस इकोनॉमी बनाना चाहती है.
सरकार चाहती है कि आप सारा लेन-देन डिजिटल माध्यम से करें. ताकि हर पेमेंट का हिसाब दर्ज रहे.
मोदी सरकार का कहना है कि डिजिटल लेन-देन से ग़रीबों को ज़्यादा फ़ायदा होगा.
देश को भी इसका फ़ायदा होगा क्योंकि कैशलेस इकोनॉमी से काले धन वाली ब्लैक इकोनॉमी पर लगाम लगेगी. टैक्स चोरी रुकेगी. लोगों के लिए लेन-देन आसान हो जाएगा.
सिर्फ़ भारत ही नहीं, दुनिया के और भी देश प्लास्टिक मनी को बढ़ावा दे रहे हैं.
यूरोपीय देशों में भी कैशलैस समाज
यूरोपीय देश स्वीडन में तो बाक़ायदा क़ानून बनाकर डिजिटल लेन-देन को बढ़ावा दिया जा रहा है.

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आज की तारीख़ में स्वीडन में अस्सी फ़ीसद लेन-देन कैशलेस हो गया है. हर दुकान में आप को बोर्ड लगा मिलेगा कि वो नकद नहीं लेते हैं.
स्वीडन का क़ानून कहता है कि दुकानदार आप से अपने सामान का नकद मोल लेने से मना कर सकते हैं.
वहां पर बसों और कई टूरिस्ट ठिकानों पर नकदी पर पूरी तरह से पाबंदी लगा दी गई है.
अब जो लोग डिजिटल लेन-देन नहीं कर पाते, उनके लिए मुसीबत खड़ी हो गई है.
डिजिटल पेमेंट करने में असक्षम लोगों के लिए दिक्कत
ऐसी ही एक बुज़ुर्ग महिला हैं स्वीडन की राजधानी स्टॉकहोम में रहनी वाली मैजलिस जॉनसन. मैजलिस बेहद ज़िंदादिली वाली ज़िंदगी जीती हैं.

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वो अक्सर अपने दोस्तों के साथ सफ़र करती हैं, कॉफ़ी शॉप पर मिलती हैं. मगर हर क़दम पर उन्हें कैशलेस इकोनॉमी की चुनौतियों का सामना करना पड़ता है.
मैजलिस कहती हैं कि वो डिजिटल लेन-देन नहीं कर पाती हैं. वो दोस्तों के साथ सफ़र करती हैं, तो कई बार उनके दोस्त टिकट ख़रीदते हैं.
फिर दोस्तों को पैसे वापस करने के लिए उन्हें बैंक जाना पड़ता है. इसमें भी काफ़ी पैसे ख़र्च होते हैं.
वो कहती हैं कि इंटरनेट बैंकिंग तो मुफ़्त है, मगर वो उन्हें आती नहीं. इसलिए हर लेन-देन के लिए बैंक को क़रीब 9 डॉलर यानी सात सौ रुपए अलग से देने पड़ते हैं.
दोस्तों को जो उधार चुकाना होता है, वो अलग है.
मैजलिस कहती हैं कि स्वीडन में नकदी का संकट इतना गहरा है कि एटीएम तक बमुश्किल मिलते हैं. कॉफ़ी ख़रीदने के लिए भी कार्ड चाहिए.

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स्वीडन में पेमेंट सिस्टम के जानकार प्रोफ़ेसर निकलास एर्विडसन कहते हैं कि समाज का एक बड़ा तबक़ा इस डिजिटल इकोनॉमी की रेस में पिछड़ रहा है.
वो कहते हैं कि ग्रामीण इलाक़ों में टेलीफ़ोन और इंटरनेट काम नही करते. इसलिए भी लोग मुश्किलें झेल रहे हैं.
नकदी की मौत और सत्ता परिवर्तन
तो, नकद से मुक्त हो रहे स्वीडन को इससे कितना फ़ायदा हो रहा है? एर्विडसन मानते हैं कि कैशलेस इकोनॉमी होने से स्वीडन को काफ़ी फ़ायदे हो रहे हैं.
इससे लेन-देन आसान और कम ख़र्चीला हो गया है. पेमेंट का सिस्टम बेहतर हुआ है. लोगों के लिए टैक्स चोरी करना मुश्किल हो गया है. और चोरियां करना भी अब मुश्किल हुआ है.
लेकिन, जैसा कि हर अंधी छलांग के साथ होता है, डिजिटल लेन-देन को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं.
लोग पूछ रहे हैं कि कहीं इससे कुछ निजी पेमेंट सिस्टम बहुत ताक़तवर तो नहीं बन रहे?

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निकलास एर्विडसन कहते हैं कि तकनीकी कंपनियों की तरक़्क़ी से बैंकों को चुनौती देने वाली संस्थाएं विकसित हो रही हैं. इससे बाज़ार में मुक़ाबला बढ़ रहा है, जो आम लोगों के लिए मुनाफ़े वाली बात है.
लेकिन एर्विडसन ये भी मानते हैं कि इससे कुछ कंपनियों के ताक़तवर होने का अंदेशा है.
भारत का क्रूर कैशलेस क़दम
भारत भी स्वीडन जैसा ही कैशलेस देश होने के ख़्वाब देख रहा है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अक्सर डिजिटल लेन-देन की वक़ालत करते हैं. इसके फ़ायदे गिनाते हैं.
जब नवंबर 2016 को पीएम नरेंद्र मोदी ने नोटबंदी का एलान किया, तो इसका मक़सद काले धन के ख़िलाफ़ क्रांति को बताया था. हालांकि बाद में सरकार ने ये भी कहा कि नोटबंदी का एक मक़सद देश में कैशलेस लेन-देन को बढ़ावा देना भी था.
एक झटके में लाखों करोड़ की करेंसी को नोटबंदी से अमान्य घोषित कर दिया गया. जिससे लोगों को भारी परेशानी उठानी पड़ी थी.
अर्थव्यवस्था को काफ़ी नुक़सान हुआ और ग़रीबों को भी नकदी संकट से बहुत परेशानी हुई.

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कैश न होने की वजह से नोटबंदी के बाद डिजिटल लेन-देन बढ़ा था. लेकिन जैसे-जैसे कैश उपलब्ध होने लगा, लोग वापस नकद में कारोबार और ख़रीद-फ़रोख़्त करने लगे.
डिजिटल पेमेंट को बढ़ावा देने की सरकार की कोशिशें कुछ शहरी इलाक़ों तक ही सीमित रह गईं. इसके लिए सरकार ने कई ट्रांजैक्शन पर रियायत भी दी. लेकिन भारत में नकद के प्रति मोह कम नहीं हुआ.
भारत बहुत बड़ा देश है. यहां क़रीब 27 करोड़ लोग ग़रीबी रेखा के नीचे रहते हैं.
ऐसे में पूरी तरह से कैशलेस अर्थव्यवस्था बनाना तो क़रीब-क़रीब नामुमकिन है.
कारोबार जगत की ख़बरें देने वाले अख़बार मिंट की संपादक मोनिका हालन कहती हैं कि भारत सरकार के कैशलेस अर्थव्यवस्था को बढ़ावा देने की कई वजहें हैं.
वो काले धन के आमदो-रफ़्त को कम करना चाहती है. इसके अलावा मोदी सरकार डिजिटल लेन-देन को बढ़ावा देकर आतंकवाद की फंडिंग पर भी रोक लगाना चाहती है.

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इसके ज़रिए सरकार देश के ग़रीबों और दबे-कुचले लोगों को अर्थव्यवस्था की मुख्यधारा में भी लाना चाहती है.
बैंकों में घुसने से हिचकते हैं गरीब लोग
मोनिका हालन कहती हैं कि ग़रीब लोग बैंकों में घुसने से हिचकते हैं. वो सोचते हैं कि कहीं उनके गंदे नोट देखकर बैंक के कर्मचारी मज़ाक़ न उड़ाएं. उन्हें ये भरोसा नहीं है कि बैंक के कर्मचारी उनसे ठीक ढंग से पेश आएंगे. बड़ी मुश्किल से कमाई इस रक़म को हर ग़रीब सुरक्षित रखने के लिए बैंक में डालना चाहता है. लेकिन बैंक उसे आसानी से ये सुविधा देने को तैयार नहीं हैं.
हालन के मुताबिक़ सरकार के डिजिटल और मोबाइल पेमेंट पर ज़ोर देने की वजह से आज सड़कों पर दुकानदारी करने वालों से लेकर बढ़ई और जमादार तक मोबाइल से पेमेंट ले लेते हैं. फ़ोन सस्ते होने से ये ग़रीबों की पहुंच में आया.
और मोबाइल पेमेंट पर सरकार के ज़ोर देने से आज समाज के दबे-कुचले वर्ग के लोग भी उस तरह लेन-देन कर पा रहे हैं, जिस तरह उच्च तकनीक तक पहुंच रखने वाले ऊंचे दर्जे के लोग.

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इससे छोटे दुकानदारों के लिए भी अपना कारोबार बढ़ाना आसान हुआ.
जैसा कि हर तकनीक और नए क़दम के साथ होता है, तो डिजिटल पेमेंट के अपने ख़तरे हैं. आपके पैसे में हेरा-फेरी का डर होता है. फिर आपकी निजी जानकारियां लीक होने का ख़तरा भी होता है.
डिजिटल पेमेंट के ख़तरे
मोनिका हालन कहती हैं कि ये तो पूरी दुनिया के लिए चुनौती है. फ़ेसबुक डेटा लीक ने बता दिया है कि आज हर इंसान की निजता ख़तरे में है. ऐसे में सरकारी और नियामक संस्थाओं को तेज़ी से क़दम उठाने होंगे ताकि आपकी डिजिटल जानकारी पर डाका न पड़े.
हालांकि मोनिका हालन ये मानती हैं कि वर्चुअल करेंसी और वर्चुअल पेमेंट से लोगों की ज़िंदगी आसान हुई है.

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हालन कहती हैं कि जिस तरह हाइवे बनने से कारोबार बढ़ा. लोगों की तरक़्क़ी को रफ़्तार मिली. उसी तरह वर्चुअल लेन-देन के हाइवे से भी ग़रीबों को फ़ायदा हो रहा है. आम जनता के लिए ज़िंदगी आसान हुई है.
मोनिका हालन पूछती हैं कि तकनीक का जिन्न बोतल से बाहर आ चुका है, अब आप उसे दोबारा बोतल में कैसे डालेंगे?
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