कैसे काम करती थी जेम्स बॉन्ड की 'तीसरी आंख'

इमेज स्रोत, Alamy
- Author, मार्टिन पार्कर
- पदनाम, बीबीसी कैपिटल
माय नेम इज़ बॉन्ड, जेम्स बॉन्ड...ये जुमला, ये डायलॉग पिछली आधी सदी से फ़िल्मों और जासूसी उपन्यास के शौक़ीन लोगों के बीच मशहूर है.
ये वो मशहूर ब्रिटिश जासूसी किरदार है, जो इंसानियत और ब्रिटेन के दुश्मनों से लड़ता और जीतता आया है. जो हर लड़की पर फ़िदा हो जाता है. जिसे नियम-क़ायदे तोड़ने में यक़ीन है.
पर क्या आप को पता है कि जेम्स बॉन्ड अपने दौर के दफ़्तर का, काम-काज के तौर-तरीक़ों का नुमाइंदा भी रहा है.
बॉन्ड के काम के तरीक़ों की तुलना आज के दौर से करने से पहले बात कार्पोरेट कल्चर की.
अगर आप पॉप गीतों को देखें, तो कमोबेश हर गाना मैनेजमेंट को विलेन के तौर पर पेश करता है. दफ्तरों की ऐसी तस्वीर बनाता है जो आप की रूह को कुचलने पर आमादा है.
ये गाने बताते हैं कि काम करना कोई अच्छी बात नहीं. बहुत से टीवी शो या विज्ञापन भी दफ्तरों को साज़िशों के अड्डे के तौर पर पेश करते हैं. बॉस की खड़ूस वाली तस्वीर बनाते हैं. जिसका न तो सम्मान करना चाहिए और न ही बात मानी जानी चाहिए. बॉस पर यक़ीन करना तो गुनाह जैसा है.
ऐसे में जब हम जेम्स बॉन्ड के उपन्यासों की बात करें, तो उसे भी ऐसी ही तस्वीर पेश करनी चाहिए. मगर ऐसा है नहीं.

इमेज स्रोत, Alamy
आप बॉन्ड सिरीज़ के शुरुआती उपन्यासों पर ग़ौर करें, तो जेम्स बॉन्ड अपनी सरकार का फ़रमाबरदार मुलाज़िम है. उसे पंद्रह सौ पाउंड सालाना तनख्वाह मिलती थी.
इसके अलावा उसे साल में एक हजार पाउंड और मिलते थे, जिस पर उसे टैक्स नहीं देना पड़ता था. वो दफ्तर के नियम-क़ायदों से बंधा हुआ था.
जेम्स बॉन्ड साल में दो या तीन मिशन पर जाता था. इसके अलावा वो दस से छह के बीच दफ़्तर में रहते हुए दिखाया गया था.
लेकिन जेम्स बॉन्ड, दूसरे जासूसी और ख़ुफ़िया किरदारों से एकदम अलग था. साठ के दशक का वो नायक कभी भी अपनी कंपनी या सरकार की शिकायत करता नहीं दिखता था.
वो जिन ख़तरों का सामना करता दिखाया गया था, वो उसके देश या सरकार के ख़िलाफ़ रहे थे. फिर चाहे वो सोवियत संघ की ख़ुफ़िया एजेंसी स्मर्श हो या अपराधी संगठन स्पेक्चर.
बदलता बॉन्ड
हालांकि दौर के हिसाब से फ़िल्म दर फ़िल्म हम बॉन्ड को बदलता हुआ देखते आए हैं. लेकिन, जेम्स बॉन्ड से जुड़े जो उपन्यास और कहानियां 1953 से 1966 के बीच लिखे गए थे, वो उसे आदर्श कर्मचारी के तौर पर पेश करते हैं.

इमेज स्रोत, Alamy
जेम्स बॉन्ड अपने बॉस एम को बहुत पसंद करता है. उसकी हमेशा तारीफ़ करता है. बॉन्ड अपने बॉस को अपने पिता के तौर पर देखता है.
बॉन्ड का बॉस पहले नौसेना से जुड़ा हुआ दिखाया गया है. वो हमेशा अपने सिगार से खेलता हुआ दिखाया गया था. एम एक ऐसा बॉस है, जिसे ख़ुश करना आसान नहीं.
लेकिन, जेम्स बॉन्ड हमेशा अपने बॉस के बुलावे का इंतज़ार करता दिखाया गया है. वो हमेशा अपनी दफ़्तर की आसान ज़िंदगी से भागकर किसी मिशन पर जाने को बेताब रहता है. कई बार वो अपने बॉस को बुरा-भला करता है. लेकिन हमेशा वो उसके हर आदेश को मानता है.
उपन्यास डायमन्ड आर फॉरएवर में जेम्स बॉन्ड ये कहते हुए दिखाया गया है कि वो किसी महिला से शादी नहीं कर सकता. क्योंकि उसकी शादी पहले ही बॉस एम से हो गई है. अगर उसे किसी महिला से शादी करनी है, तो पहले उसे अपने बॉस एम को तलाक़ देना होगा.
यानी जेम्स बॉन्ड और उसका बॉस दोनों ही अपनी सरकार के प्रति ईमानदार और वफ़ादार हैं. वो हर आदेश का सिर झुकाकर पालन करते हैं. वो अपने काम को पूजा समझते हैं.

इमेज स्रोत, Alamy
बदलते दौर के साथ बदलता जेम्स बॉन्ड-
हालांकि, दौर के साथ साथ बॉन्ड का किरदार भी बदला है. बाद की फ़िल्मों में जेम्स बॉन्ड अपने संगठन के तौर-तरीक़ों पर खुलकर सवाल उठाता दिखाया गया है.
कई बार वो अपने संगठन के ख़िलाफ़ जाकर अपना मिशन पूरा करता है. यानी पचास और साठ के दशक के काम-काज का तरीक़ा आगे जब बदला, तो उसके निशान बॉन्ड की फ़िल्मो में भी देखने को मिलते हैं.
जेम्स बॉन्ड के उपन्यासों को जब लिखा गया था, तो अलग दौर था. उस वक़्त कारोबार को लेकर इतनी चालाकियां बरतने का दौर नहीं था. उस वक़्त कंपनियां और संगठन क़ाबिलियत और पैसे हासिल करने का ज़रिया थे. काम भले उबाऊ होता रहा हो.
बॉस भले बेवक़ूफ़ रहते हो. साथी मुलाज़िम भले ही लोगों को खिझाते रहे हों. मगर किसी संगठन की नीयत पर सवाल नहीं उठाए जाते थे. पूरी व्यवस्था ठीक से काम करती दिखाई देती थी. यही वो सिस्टम था, जिसके कारखानों और जिसकी फौज से हिटलर की सेनाओं को मात दी थी.
आज के बॉन्ड
आज के दौर को देखें तो बॉन्ड की बॉस भक्ति अजीब मालूम होगी. आज के मैनेजर न तो वैसा रुतबा रखते हैं और न ही वैसे वफ़ादार मुलाज़िम देखने को मिलते हैं. आज के दफ़्तर तो साज़िशों का अड्डा मालूम होते हैं.
इसीलिए आज की बॉन्ड फ़िल्में भी बदलते दौर की झलक दिखाती हैं.
हां, उपन्यासों वाला जेम्स बॉन्ड, हमेशा से ही एक फ़रमाबरदार मुलाज़िम रहा था. उसने अपराधियों और दुश्मन देश के जासूसों से देश की हिफ़ाज़त की.
यानी बॉन्ड के उपन्यासों में हम अंग्रेज़ों के जीवन मूल्यों को देखते हैं दफ़्तर में काम के तौर-तरीक़ों की झलक पाते हैं. काम करके ही वो लोग ख़ुशी हासिल करते थे.
बॉन्ड और उसके बॉस एम के बीच दोस्ताना ताल्लुक़ात थे. आज के दौर पर ऐसे रिश्ते पर यक़ीन करना मुश्किल है.
(बीबीसी कैपिटल पर इस लेख को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें.)
(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए यहां क्लिक करें. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर भी फ़ॉलो कर सकते हैं.)












