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सोमवार, 23 जून, 2008 को 11:39 GMT तक के समाचार
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देखो मैने देखा था ये इक सपना...

कपिल
विश्व कप अपने नाम करने के लिए वेस्टइंडीज़ को केवल 183 रन चाहिए थे. क्या भारत के लिए इस परी कथा का, फ़ेयरी टेल का अंत होने वाला है?

उम्र मेरी उस समय थी सात साल पर वो दिन आज भी याद है.

1983 में मैच पर नज़र रखने वाले मेरे जैसे लोगों के मन में यही सवाल घूम रहा था कि मैच में होगा क्या. आख़िरकर दो बार की विश्व चैंपियन टीम वेस्टइंडीज़ के दमखम के सामने कोई भी इतने कम स्कोर को डिफ़ेंड नहीं कर सकता था.

भारत तो बिल्कुल नहीं जिसे अब तक विश्व की सबसे कमज़ोर टीम माना जा रहा था. इतिहास हमारे ख़िलाफ़ था और सूझबूझ भी इस बात से इत्तेफ़ाक नहीं रखती थी कि भारत जीत सकता है.

लेकिन सात साल के एक बच्चे की शक्ति इसी बात में छिपी होती है कि उसे इतिहास का कम ही इल्म होता है और सूझबूझ से तो और भी लेना-देना नहीं होता.

जून महीने में कंपकंपी

घायल क्लाइव लॉएड्स को कपिल देव ने चलता किया. मैं उठकर कमरे में दौड़ने लगा- बचपन के उस आशावादी उत्साह में डूबा जिसपर कोई सवाल नहीं उठाता. मैं चिल्लाने लगा- हम जीत गए, जीत गए. बाबा ने कहा शांत रहो अभी आधी टीम को आउट करना बाक़ी है.

जून के महीने में उत्साह से मैं कपकपा रहा था. मैने अपने ब्लैक और व्हाइट टीवी पर मैच देखना शुरु किया.

बलविंदर सिंह संधू ने गेंद डाली लेकिन ग्रीनिज ने शॉट नहीं लिया. लेकिन ग्रीनिज को इस बात का अंदाज़ा नहीं था कि लाखों भारतीयों की दुआओं ने इस गेंद को ख़ास बना दिया था...आख़िरी पल में गेंद ने स्विंग किया और ग्रीनइज का विकेट गिर गया. भारत ने सफलता का पहला स्वाद चखा.

लेकिन फिर चिउइंग गम चबाता मैदान पर उतरा क्रिकेट का राजा. उसने भारतीय गेंदबाज़ों की धुनाई शुरु कर दी. मेरे बाबा सर हिलाते हुए बोले- रिचर्डस को जाना होगा वरना सब ख़त्म.

पर ऐसा होने के कोई संकेत नहीं मिल रहे थे. इसके बाद राष्ट्रीय टीवी प्रसारक के पास मैच की फ़ीड आनी बंद हो गई. फ़र्राटे से हम लोग रेडियो की ओर भागे. पर रिचर्डस लगातार गेंदबाज़ों की पिटाई कर रहे थे. मदन लाल को हटाया जा रहा था.

पर रुको ......कमेंटेटर ने क्या कहा? “ही इज़ आउट, गॉन”

यकीन करना मुश्किल करना था कि रिचर्डस आउट हो गए थे. मन से यही दुआ निकली- हे भगवान प्लीज़ प्लीज़ एक विकेट और. भगवान ने भी जैसे बात मान ली. गोम्स का विकेट गिर गया.

घायल क्लाइव लॉएड्स को कपिल देव ने चलता किया. मैं बस उठकर कमरे में दौड़ने लगे- बचपन के उस आशावादी उत्साह में डूबा जिसपर कोई सवाल नहीं उठाता. मैं चिल्लाने लगा- हम जीत गए, जीत गए.

बाबा ने कहा शांत रहो अभी आधी टीम को आउट करना बाक़ी है पर हाँ अब जीते की संभावना है.

मैने देखा था एक करिश्मा

 बड़ा होने के बाद अब ये बात समझ में नहीं आती कि किस पर भरोसा करूँ और किस पर न करूँ.लेकिन एक बात है जिस पर मुझे आज भी यकीन है और वो है कि ज़िंदगी में करिश्मे भी होते हैं.क्योंकि मैने एक करिश्मा ख़ुद देखा था....25 जून 1983 को

उसी समय टेलवीज़न पर मैच की फ़ीड वापस आ गई. मार्शल और डूजोन अपनी टीम के ओर से वापसी करने की कोशिश कर रहे था और मैं गुपचुप प्रार्थना करने लगा.

ऊपरवाले ने मेरी सुन ली...एक बार फिर.

सीधी सरल सी गेंद थी लेकिन डूजोन चूक गए और आउट हो गए. ग़ुस्से में डूजोन ने ज़मीन पर बल्ला पटका लेकिन मैं तो खुशी से हवा में उछल रहा था.

अजीब सी बात है कि इसके आगे के मैच की यादें धुँधली हैं. उत्साह से भरी भारतीय टीम के आगे वेस्टइंडीज़ की टीम धराशाई हो गई.

एक बात जो मुझे याद है कि वो ये कि खुशी से दमकते मोहिंदर अमरनाथ पवेलियिन की ओर भाग रहे थे. टीवी स्क्रीन पर बड़ा-बड़ा लिखा आ रहा था- भारत जीत गया है.

उसके बाद वर्षों बीत गए हैं. इस बीच मैं सात साल के बच्चे से नौजवान हो गया हूँ और शायद थोड़ी अकल भी आ गई है.

बड़ा होने के बाद अब ये बात समझ में नहीं आती कि किस पर भरोसा करूँ और किस पर न करूँ.

लेकिन एक बात है जिस पर मुझे आज भी यकीन है और वो है कि ज़िंदगी में करिश्मे भी होते हैं..

क्योंकि मैने एक करिश्मा ख़ुद देखा था....25 जून 1983 को.

कपिल- अमरनाथअमरनाथ की यादें..
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