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आरक्षण पर गूजरों का 'अल्टीमेटम' | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
राजस्थान के धौलपुर में गुरूवार को गूजर महापंचायत की बैठक में राज्य सरकार को आरक्षण मसले का हल निकालने के लिए दो अक्तूबर तक का समय देने का फ़ैसला किया गया है. गूजर नेताओं ने सरकार को चेतावनी भी दी कि अगर उनकी आरक्षण मांगें नहीं मानी गईं तो वह दो अक्तूबर के बाद राज्यभर में आंदोलन करेंगें और ग़िरफ़्तारियाँ देंगे. इस बैठक में गूजरों के नेता किरोड़ी सिंह बैंसला के साथ अवतार सिंह भडाना और पूर्व सांसद रमा पायलट और दौसा से सांसद सचिन पायलट भी उपस्थित थे. धौलपुर में गूजरों के अराध्य स्थल बाबू महाराज के मंदिर के क़रीब हुई इस महापंचायत की बैठक में राजस्थान के अलावा मध्यप्रदेश, उत्तरप्रदेश, दिल्ली और हरियाणा से आए गूजर शामिल हुए थे. इस दौरान सुरक्षा के बेहद कड़े इंतज़ाम किए गए थे. अर्धसैनिक बलों के साथ राज्य सशस्त्र पुलिसबल के जवान तैनात किए गए थे. जगह-जगह सुरक्षा नाके भी बनाए गए थे. इससे पहले सरकार ने भी ऐहतियात के तौर पर गूजर बहुल इलाक़ों, धौलपुर, भरतपुर, सवाई माधोपुर, दौसा और करौली में सुरक्षा व्यवस्था की निगरानी के लिए चार मंत्रियों को तैनात किया था. राजस्थान सरकार ने गूजर समुदाय को अनुसूचित जनजाति में शामिल करने के मामले पर गठित जस्टिस जसराज चोपड़ा समिति के कार्यकाल में कल रात तीन महीने की वृद्धि करते हुए इसे 15 दिसंबर तक कर दिया है. चोपड़ा समिति का कार्यकाल बुधवार को समाप्त हो रहा था. गूजरों की माँग ग़ौरतलब है कि राजस्थान में गूजरों को अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) में रखा गया है लेकिन वे अनुसूचित जनजाति के तहत मिलने वाली आरक्षण सुविधा की मांग कर रहे हैं.
इसको लेकर गूजर समुदाय सड़कों पर उतर आया था और उनके आंदोलन ने उग्र रूप धारण कर लिया था. इस आंदोलन के दौरान कुछ पुलिसकर्मियों समेत 23 लोगों की जानें गई थीं. राजस्थान के अलावा उत्तर प्रदेश, हरियाणा और दिल्ली में भी गूजर समाज के लोग इस आंदोलन से जुड़ गए थे. इस दौरान हुए धरने-प्रदर्शनों के कारण सामान्य जनजीवन भी ख़ासा प्रभावित हुआ था. लगभग दो सप्ताह तक चले उग्र आंदोलन के बाद चार जून को गूजरों नेताओं और राजस्थान सरकार के बीच एक समझौता हो गया था. इसी के तहत चोपड़ा समिति का गठन किया गया था. |
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