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शनिवार, 16 जून, 2007 को 15:41 GMT तक के समाचार
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मीडिया की भूमिका पर उठे सवाल

आंदोलन
आंदोलन मीडिया में जिस तरह से दिखाया गया उसपर सवाल उठ रहे हैं
भारत में घटनाओं को पेश करने के बारे में मीडिया के रुख़ पर एक बार फिर से सवाल उठाया गया है और इसबार इसके लिए राजस्थान के पिछले दिनों के गूजर आंदोलन को उदाहरण बनाया गया है.

सुप्रीम कोर्ट में गूजर आंदोलन के दौरान हिंसा पर चल रहे मामले में एक शपथ पत्र दायर करते हुए राजस्थान पुलिस ने कहा है कि अगर मीडिया ने लगातार दोहराते हुए आंदोलन के उग्र दृश्यों को लोगों के सामने न रखा होता तो शायद आंदोलन इतना हिंसक नहीं होता.

शपथ पत्र में कहा गया है कि चैनलों के निरंतर हिंसा के दृश्य दिखाने से लोग भड़के और हिंसा में वृद्धि हुई.

ग़ौरतलब है कि पिछले दिनों राजस्थान में गूजर समाज के लोगों ने उन्हें अनुसूचित जनजाति का दर्जा दिए जाने की माँग के साथ एक बड़ा आंदोलन छेड़ा था.

इस आंदोलन में बाद में दिल्ली, हरियाणा और उत्तर प्रदेश के गूजर भी शामिल हो गए थे.

आंदोलन के दौरान हिंसा की भी कई घटनाएँ हुईं. कुछ पुलिसकर्मियों समेत लगभग दो दर्जन लोगों की मौत हो गई थी और कई लोग गंभीर रूप से घायल हुए और कई जगहों पर बड़ी तादाद में संपत्ति को भी नुकसान हुआ.

इस आंदोलन के दौरान क़रीब एक सप्ताह तक राजमार्गों पर हिंसक घटनाएँ हुईं और प्रभावित क्षेत्रों में सेना को तैनात करना पड़ा.

मीडिया पर सवाल

हिंसा की इन घटनाओं को टेलीविज़न चैनलों के माध्यम से देश दुनिया के लोगों ने देखा जिसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने भी आंदोलन के दौरान लोगों को हुई परेशानी और जान-माल के नुकसान पर संबंधित राज्यों से जवाब माँगा.

 आंदोलनकारियों का कार्यक्रम पूर्व घोषित था. सरकार के पास बातचीत और समाधान निकालने का पूरा समय था. पहले से जानकारी होते हुए भी बड़ी तादाद में लोग इकट्ठा हुए. कोई सार्थक प्रयास नहीं किए गए
हरीश धवन, सामाजिक कार्यकर्ता

इसी के जवाब देते हुए राजस्थान पुलिस ने मीडिया की भूमिका पर सवाल उठाया है.

पुलिस ने इस संदर्भ में अमरीका में 11 सितंबर के चरमपंथी हमले का भी उदाहरण दिया है. इसमें कहा गया है कि उस दौरान चैनलों पर दिखाए गए दृश्यों में लोगों के शवों को नहीं दिखाया गया था.

पुलिस ने हिंसा रोकने के अपने उपायों को भी गिनाया है. पुलिस ने कहा कि उनकी ओर से लगभग 2000 लोगों को गिरफ़्तार किया गया और साढ़े तीन सौ से ज़्यादा मुक़दमे दर्ज किए गए.

राज्य सरकार की समीक्षा बैठकों में भी हिंसा के कारणों की खोज करते हुए लगातार टीवी मीडिया की भूमिका पर सवाल उठाए जाते रहे हैं.

हालांकि कुछ पत्रकारों से जब इस बारे में बात की गई तो वो इससे सहमत नहीं थे. टीवी पत्रकारों का कहना है कि मीडिया के कारण ही अफ़वाहों को फैलने से रोका जा सका.

सरकार पर सवाल

आंदोलन
जन संगठनों की रिपोर्ट के मुताबिक ऐसा प्रशासनिक और राजनीतिक लापरवाही के चलते हुआ

वहीं हिंसा के बाद प्रभावित क्षेत्रों का दौरा करके लौटे नागरिक अधिकार संगठनों के एक दल ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि ये घटनाएँ राज्य सरकार की राजनीतिक और प्रशासनिक चूक का परिणाम थीं.

पीपुल्स यूनियन फ़ॉर डेमोक्रेटिक राइट्स के हरीश धवन कहते हैं, "आंदोलनकारियों का कार्यक्रम पूर्व घोषित था. सरकार के पास बातचीत और समाधान निकालने का पूरा समय था. पहले से जानकारी होते हुए भी बड़ी तादाद में लोग इकट्ठा हुए. कोई सार्थक प्रयास नहीं किए गए."

संगठनों का यह भी कहना है कि सरकार आंदोलन के बाद की स्थितियों को संभालने के लिए भी कुछ पहल नहीं करती नज़र आ रही है.

कार्यकर्ताओं का कहना है कि हाल की हिंसा दो जातियों के बीच शत्रुता का भाव पैदा कर गई है. विडंबना यह है कि इन जातियों के बीच फिर से सौहार्द क़ायम करने के कोई प्रयास नज़र नहीं आ रहे हैं.

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