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ऑस्ट्रेलिया लगातार तीसरी बार विश्वविजेता | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
क्या कोई रोक पाएगा ऑस्ट्रेलिया का विजय रथ? शनिवार को हुए विश्व कप फ़ाइनल के बाद अब यही सवाल सबके मन में मँडरा रहा है. श्रीलंका को 53 रन से हराकर लगातार तीसरी बार ऑस्ट्रेलिया की टीम बनी विश्व विजेता. हालाँकि आख़िर में कुछ नाटकीय क्षण भी आए. तीन ओवर पहले जब श्रीलंका के बल्लेबाज़ों को रोशनी की कमी के कारण मैदान छोड़कर जाने को कहा गया. ऑस्ट्रेलिया ने समझा जीत गए, श्रीलंका ने भी समझा हार गए. ऑस्ट्रेलियाई कैंप में ख़ुशी की लहर दौड़ गई. लेकिन अंपायर अलीम दार और स्टीव बकनर ने नियमावली का हवाला दिया और बताया कि अगर रोशनी की कमी के कारण मैच रुका है तो मैच रविवार को फिर जारी रहेगा. फिर बातचीत हुई. श्रीलंका के कप्तान मैदान में आए, पोंटिंग से बात हुई. अंपायर से सलाह-मशविरा हुआ. और फिर रोशनी की कमी के कारण मैदान से चले गए श्रीलंका के बल्लेबाज़ मैदान पर वापस आए और फिर 36 ओवर का मैच पूरा हुआ और ऑस्ट्रेलिया के जीत की औपचारिकता पूरी हुई. ऑस्ट्रेलिया ने बारिश से प्रभावित इस मैच में पहले बल्लेबाज़ी करते हुए 38 ओवर में 281 रन बनाए थे. गिलक्रिस्ट ने 149 रन बनाए थे. बाद में बारिश के कारण श्रीलंका को 36 ओवर में 269 का लक्ष्य मिला. लेकिन श्रीलंका की टीम 215 रन ही बना सकी. एडम गिलक्रिस्ट को मैन ऑफ़ द मैच और ग्लेन मैकग्रॉ को मैन ऑफ़ द टूर्नामेंट चुना गया. ग्लेन मैकग्रॉ का ये आख़िरी अंतरराष्ट्रीय मैच था. उन्होंने पहले ही घोषणा कर दी थी कि वे इस मैच के बाद अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट से संन्यास ले लेंगे. दमख़म पिछले दो विश्व कप से तो उसके आगे कोई टीम खड़ी दिख ही नहीं रही. श्रीलंका हो, न्यूज़ीलैंड हो या फिर हो दक्षिण अफ़्रीका. सबको ऑस्ट्रेलिया ने ना सिर्फ़ अपना दमख़म दिखाया बल्कि चारों खाने चित्त किया.
वर्ष 1999 में ऑस्ट्रेलिया की टीम जीती, फिर 2003 में और फिर 2007 में. यानी ऑस्ट्रेलिया ने वो कारनामा कर दिखाया जो वेस्टइंडीज़ की टीम अपने स्वर्णिम दौर में नहीं कर सकी. हाँ, ये बात ग़ौर करने लायक़ है कि ये ऑस्ट्रेलिया की ख़िताबी जीत की है-ट्रिक तो है ही कुल चौथी बार उनके हिस्से में अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट का सिरमौर बनने का गौरव आया है. पहली बार ऑस्ट्रेलिया की टीम 1987 में विश्व कप जीती थी. अगर बारिश के लिहाज़ से कहें, तो श्रीलंका की टीम को थोड़ा दुर्भाग्यशाली कहा जा सकता है. लेकिन कम ओवरों के मैच में किस तरह बल्लेबाज़ी की जाती है, ये भी तो अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट का ही हिस्सा है. शनिवार को ऑस्ट्रेलिया ने श्रीलंका को ये भी पाठ पढ़ाया. रिकी पोंटिंग ने टॉस जीतकर पहले बल्लेबाज़ी चुनी तो उन्हें इसका अंदाज़ा था कि इंद्र देवता मैच में अपना खेल भी दिखाएँगे. उन्होंने बल्लेबाज़ी चुनी और क्या शुरुआत दी उनकी सलामी जोड़ी ने. मैथ्यू हेडन और एडम गिलक्रिस्ट की ख़तरनाक जोड़ी मैदान में हो, मौक़ा विश्व कप के फ़ाइनल का हो और उनका बल्ला ना बोले- ऐसा कैसे हो सकता था. बेहतरीन पारी ये बात अलग है कि इस बार बारी गिलक्रिस्ट की थी. हेडन उनके सहयोगी की भूमिका में थे. गिलक्रिस्ट की धमाकेदार, आतिशी, बेहतरीन, शानदार, आक्रमक...पारी का नज़ारा दर्शकों को क्रिकेट देखने का ख़ूबसूरत एहसास दे गया.
श्रीलंका के समर्थक भी इस पारी को याद रखेंगे. रनों की बौछार हो रही थी. न मुरलीधरन चल रहे थे, न मलिंगा और न ही वास. सब गेंदबाज़ों को जमकर धुनाई हुई, सबकी गेंदे रह-रहकर सीमा रेखा के पार टप्पा खाती रहीं. और जब गिलक्रिस्ट की पारी का अंत हुआ, उन्होंने जैसे फ़ाइनल की पूरी पटकथा लिख दी थी. 104 गेंदों पर 13 चौके और आठ छक्कों की मदद से उन्होंने 149 रन बनाए. बाक़ी के खिलाड़ियों का भी स्कोर बता देते हैं- हेडन 38, पोंटिंग 37 और साइमंड्स 23. और ऑस्ट्रेलिया का स्कोर 38 ओवर में चार विकेट के नुक़सान पर पहुँचा 281 रन. भारी दबाव और फ़ाइनल मैच के दबाव के बीच श्रीलंका ने पारी शुरू की तो उन्हें भी एहसास था कि उनके सामने पहाड़ जैसा लक्ष्य है. दबाव श्रीलंका के लिए ख़तरनाक साबित हुआ और ऑस्ट्रेलिया के लिए वरदान. उपुल थरंगा ने चौका मारकर शुरुआत तो की लेकिन जल्द ही छह रन बनाकर चलते बने. जयसूर्या का साथ देने आए संगकारा ने शुरू में धीमा खेल दिखाया. जयसूर्या भी कुछ ख़ास नहीं कर पा रहे थे. आवश्यक रन गति बढ़ती जा रही थी. लेकिन मैकग्रॉ के एक ओवर में संगकारा ने 16 रन क्या ठोंके, रोमांच वापस आ गया. जयसूर्या को भी जोश आया और रन बनने शुरू हुए. लगा फ़ाइनल में रोमांच आ ही गया. लेकिन बढ़ती रन गति और आसमान में छाई घटा ने श्रीलंका पर मनोवैज्ञानिक दबाव बना रखा था. संगकारा 54 रन बनाकर आउट हुए और एक अहम साझेदारी टूट गई. उम्मीद संगकारा के बाद जयवर्धने और जयसूर्या पिच पर थे, तो उम्मीद थी. उम्मीद थी किसी चमत्कार की. लेकिन चमत्कार भी कभी-कभार ही होते हैं. रिमझिम बारिश के बीच डकवर्थ-लुईस का ख़ौफ़ जयसूर्या को निगल गया और उनके 63 रन पर आउट होते ही उम्मीद और क्षीण हो गई.
फिर बारिश आ गई. मैच रुका. ओवर घटाए गए. 36 ओवर में 269 का लक्ष्य मिला. दबाव बढ़ा और इस बार इसकी बलिवेदी पर चढ़े कप्तान जयवर्धने. फिर तो औपचारिकता ही बाक़ी थी. ऑस्ट्रेलिया ने बड़े शान से औपचारिकता पूरी की. विश्व कप पर क़ब्ज़ा किया. लगातार तीसरी बार विश्व कप जीतने का रिकॉर्ड क़ायम किया और ये भी बताया कि वे तुक्के में ही विश्व विजेता नहीं बने हैं. तथ्य सामने हैं. रिकॉर्ड बोल रहे हैं. विश्व कप में लगातार 29 मैचों में अपराजेय और पता नहीं विश्व कप में उनका ये विजय अभियान कब रुकेगा. सवाल गंभीर है और इसका जवाब पाने में समय भी ज़्यादा लगेगा. यानी चार साल. भई विश्व कप तो अब चार साल बाद यानी 2011 में भारत, पाकिस्तान, श्रीलंका और बांग्लादेश में खेला जाएगा. तब तक तो इस सवाल का जवाब ढूँढ़ना मुश्किल ही होगा. | इससे जुड़ी ख़बरें मैकग्रॉ को एक शानदार विदाई की उम्मीद28 अप्रैल, 2007 | खेल 'ऑस्ट्रेलिया को श्रीलंका से डर नहीं'26 अप्रैल, 2007 | खेल मुरली को सबसे बड़ी उपलब्धि का इंतज़ार27 अप्रैल, 2007 | खेल वूल्मर को 'साँप का ज़हर नहीं दिया गया'27 अप्रैल, 2007 | खेल कांटे या बिना कांटे का मैच26 अप्रैल, 2007 | खेल सचिन को रिटायर होना चाहिएः अमरनाथ25 अप्रैल, 2007 | खेल पाक टीम के कोच के लिए विज्ञापन25 अप्रैल, 2007 | खेल फ्लेमिंग ने छोड़ी वनडे की कप्तानी25 अप्रैल, 2007 | खेल | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
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