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आख़िर रंग आया सानिया का जुनून | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
क़रीब दो साल पहले की बात है. जब मैं अपने सहयोगी आकाश सोनी के साथ ग्रैंड स्लैम प्रतियोगिता का मक्का माने जाने वाले विंबलडन में मौजूद था. उस दिन महेश भूपति डबल्स मुक़ाबले में खेलने वाले थे. लेकिन बारिश ने ख़ूब लुकाछिपी की और मैच बार-बार रोकना पड़ा. आख़िरकार जब महेश भूपति का मैच दूसरे दिन के लिए टाल दिया गया तो हमलोग भी वहाँ से निकलने की सोचने लगे. स्टेडियम के अंदर कई कोर्ट पर एक साथ मुक़ाबले होते हैं. हम जब एक छोर से दूसरे छोर पर पहुँचे तो बारिश रुक गई थी. भीड़-भाड़ से दूर एक कोर्ट पर लड़कियों के मुक़ाबले चल रहे थे. हम दोनों उत्सुकतावश वहाँ पहुँच गए. कोर्ट पर थीं भारतीय मूल की अमरीकी खिलाड़ी सुनीता राव और उनका उत्साह बढ़ाने के लिए उनके परिवार वालों के साथ-साथ इक्का-दुक्का लोग भी जमा थे. अपना आकलन कोर्ट के कम ऊँचाई वाले घेरे के किनारे खड़ी एक लड़की चुपचाप यह मुक़ाबला देख रही थी. मैं झूठ नहीं बोलूँगा ट्रैक शूट और गले में खिलाड़ी का परिचय पत्र लटकाए इस खिलाड़ी को पहचानने में हमें भी मुश्किल आई थी. जी हाँ, वो थी सानिया मिर्ज़ा, जो उसी दिन लड़कियों के एकल मुक़ाबले से बाहर हो गई थी. उन्हें हारने का ग़म तो था लेकिन कोर्ट के एक छोर पर चुपचाप खड़ी वे सुनीता राव के खेल से सीखने की कोशिश में थी. सानिया को पहचान लेने के बाद हम उन तक पहुँचे और आकाश से उनसे बात शुरू की. ढ़ेरों सवाल- कैसी तैयारी है, क्या योजना है, क्या लक्ष्य है, सुविधाओं के बारे में सवाल और भारत में महिला टेनिस के भविष्य के बारे में भी सवाल. सभी सवालों का जिस अंदाज़ में सानिया ने जवाब दिया- वो क़ाबिले तारीफ़ था. लेकिन उन्हें इस बात का दुख ज़रूर था कि खिलाड़ियों को इस स्तर पर उतनी सुविधाएँ नहीं मिलती और इससे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मुक़ाबले में उतरने में मुश्किलें भी आती हैं.
उसी बातचीत में सानिया ने साफ़गोई से हमें ये भी बताया कि वे अपनी हार का आकलन करने कोर्ट के इस छोर पर खड़ी हैं और साथ में कुछ सीख भी रहीं हैं. हमेशा की तरह उनके साथ उनकी माँ भी मौजूद थीं- अपनी बिटिया को अपनी ओर से हरसंभव सहायता और समर्थन देने की भावना के साथ. हम वहाँ से लौट आए. उसके बाद उस साल के विंबलडन में जाने का मौक़ा मुझे नहीं मिल पाया. लेकिन कुछ ही दिन बाद ये ख़बर ज़रूर मिली कि सानिया ने लड़कियों के डबल्स का ख़िताब जीत लिया है. शायद अपने को साबित करने का उनका जुनून ही था कि वे उस साल विंबलडन में कुछ तो हासिल कर पाने में सफल रहीं. और उनका यही जुनून उन्हें इस स्थिति में ले आया कि वे एक के बाद एक सफलता हासिल करती जा रही हैं. पहले ऑस्ट्रेलियन ओपन के तीसरे दौर में पहुँचना और फिर हैदराबाद ओपन जीतना- सानिया ने दिखा दिया है कि उनका ऑस्ट्रेलियन ओपन के तीसरे दौर में पहुँचना तुक्का नहीं था. |
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