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भारत-पाकिस्तान मैच में 'मित्रतापूर्ण तनाव' | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
यह मेरे लिए पहला मौक़ा था. भारत और पाकिस्तान का क्रिकेट मैच सीधे स्टेडियम में जाकर देखने का और वह भी आईसीसी चैंपियंस ट्राफ़ी का ऐसा मैच जहाँ से दोनों देशों के सेमीफ़ाइनल में जाने का रास्ता खुलता था. रोज़ बोल में कीनिया और भारत के ख़िलाफ़ मैच में मैंने भारतीय समर्थकों का जुनून देखा था. मन के किसी कोने में ऐसी भावना था कि पता नहीं भारत और पाकिस्तान के दर्शक मैदान में किस तरह का व्यवहार करेंगे. सालों से टेलिविज़न पर भारत-पाकिस्तान का मैच देखता आया था. कई कड़वी यादें मन में थीं. शारजाह से लेकर कोलकाता के ईडन गार्डन का माहौल भूला नहीं था. तो क्या बर्मिंघम के एजबेस्टन मैदान पर ऐसा ही कुछ होने वाला है. इसी सोच में डूबता-उतराता मैं पहुँचा एजबेस्टन के क्रिकेट मैदान पर. मैच के दौरान स्टेडियम के कई स्टैंड में जाने का मौक़ा मिला और मिला अवसर भारत और पाकिस्तान समर्थकों से बात करने और उनके जोशो-ख़रोश को महसूस करने को. ऐसा लगा जैसे भारत और पाकिस्तान के रिश्तों में आई नरमी, भारत के पाकिस्तान दौरे पर हुए ज़बरदस्त स्वागत की भावना यहाँ भी दोनों देशों के समर्थकों के मन में बनी हुई है. यहाँ न शारजाह की तरह भारत और पाकिस्तान समर्थकों के लिए अलग-अलग स्टैंड थे और न ऐसी टिप्पणियाँ जिससे एक-दूसरे को ग़ुस्सा आ जाए. ख़ूब था हंगामा लेकिन ऐसा भी नहीं था कि शोर-ग़ुल नहीं था, हंगामा नहीं था. मायूसी नहीं थी. सब कुछ था लेकिन दायरे में रहते हुए.
न भारतीय दर्शक सीमा तोड़ रहे थे और न पाकिस्तान दर्शक बेक़ाबू हो रहे थे. भारतीय दर्शकों की संख्या ज़्यादा थी लेकिन वे पाकिस्तानी दर्शकों के साथ ऐसे घुले-मिले थे कि लग ही नहीं रहा था कि कौन किसके आउट होने पर ख़ुश हो रहा है और कौन दुखी. इन्हीं में एक पाकिस्तान समर्थक ख़ादिम अपनी लगातार नारेबाज़ी से सबका ध्यान आकर्षित कर रहे थे. जब मैंने उनसे बात की तो उनका कहना था कि भारतीय समर्थकों के साथ वे मैच का आनंद ले रहे हैं. ख़ादिम ने कहा, "कभी हम उन्हें स्कोर बोर्ड दिखा रहे हैं तो कभी वे तालियाँ पीट-पीट कर हमारी आवाज़ दबाने की कोशिश कर रहे हैं. लेकिन आप देख सकते हैं हम मिल-जुल कर मैच का आनंद ले रहे हैं. कोई तनाव नहीं. मौक़ा है सिर्फ़ एक अच्छे मैच का मज़ा लेने का." ऐसी थी भावना ख़ादिम की तरह की भावना दूसरे दर्शकों की भी थी. विनती अपनी दो बेटियों के साथ मैच देखने आईं थी वो भी क़रीब आठ हज़ार रुपए में ब्लैक टिकट लेकर.
हम जब उनसे और एक पाकिस्तान समर्थक रज़ा से बात कर रहे थे तो विनती रज़ा की विशुद्ध ऊर्दू की दाद देती थक नहीं रहीं थी. भारत जब हार के कग़ार पर पहुँच गया तो वे पाकिस्तानी समर्थक दर्शकों से जाकर हाथ मिला रहीं थीं और कह रहीं थी कि उनके पैसे तो वसूल हो ही गए. नज़ाकत भी एक ऐसे ही पाकिस्तान समर्थक दर्शक थे, जो मैच के हर पल का आनंद अपने अंदाज़ में ले रहे थे. लेकिन उनका भी यही कहना था, "हम यहाँ एक-दूसरे को परेशान करने नहीं बल्कि मैच के एक-एक पल को जीने आए हैं. यहाँ स्टेडियम में खेल भावना पूरी तरह हावी है." स्टेडियम में ऐसे भी दर्शकों की संख्या थी जिनका पहनावा था तिरंगे के रंग का लेकिन वे पाकिस्तान का झंडा लेकर घूम रहे थे तो दूसरा दर्शक इसके उलट वेश-भूषा में था. मेरा ऐसे दर्शकों से भी पाला पड़ा जो एक अलग तरह के तनाव की व्याख्या कर रहे थे. मयूर ने हमें बताया, "मैं यह नहीं कहता कि तनाव नहीं है. तनाव मैदान में भी है और स्टेडियम में भी लेकिन यह 'तनाव मित्रतापूर्ण' है." मैच के दौरान का यह मित्रतापूर्ण तनाव भी मैच ख़त्म होने के थोड़ी देर बाद नहीं रहा था. ख़ादिम ने कहा, "मैं ये नहीं कह सकता कि भारत के हारने पर हमें कोई ख़ास ख़ुशी है. खेल खेल होता है और हमने खेल का भरपूर मज़ा लिया." भारत और पाकिस्तान समर्थकों के बीच कोई झड़प न हो जाए- इसके लिए बड़ी संख्या में पुलिसकर्मी वहाँ मौजूद थे. लेकिन सभी आशंकाएँ ग़लत साबित हुई. सचमुच खेल का मज़ा को सिर्फ़ खेल भावना से ही लिया जा सकता है फिर चाहे वो भारत पाकिस्तान का ही मैच क्यों न हो. |
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