|
क्या भारत दोहरा पाएगा अपना प्रदर्शन? | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
दुनिया के कोने-कोने में क्रिकेट के खेल को पहुंचाने और उसे लोकप्रिय बनाने के उद्देश्य से 1998 में शुरू की गई थी चैंपियंस ट्रॉफ़ी प्रतियोगिता! हर दो वर्ष बाद आयोजित की जाने वाली इस प्रतियोगिता को "मिनी " विश्व कप के रूप में देखा जाने लगा. पहले बांग्लादेश, उसके बाद कीनिया और फिर श्रीलंका में जमा होती रहीं दुनिया भर की टीमें और अनिश्चितताओं के इस खेल में लगातार दो बार विश्व कप जीतने वाली ऑस्ट्रेलिया की टीम आज तक विजय के द्वार को पार नहीं कर पाई है. शानदार रिकॉर्ड वहीं दूसरी ओर भारत और दक्षिण अफ्रीका की टीमें हर बार चैंपियंस ट्रॉफी के सेमी फ़ाइनल तक पहुंचने में कामयाब रही हैं. 1998 में जीत दक्षिण अफ्रीका की झोली में आयी तो 2000 में न्यूज़ीलैंड चैंपियन बना.
2002 में वर्षा ने जब भारत और श्रीलंका के बीच फाइनल मैच का फ़ैसला नहीं होने दिया तब मेज़बान श्रीलंका और भारत संयुक्त विजेता बने. अगर अतीत की ओर मुड़कर देखें, तो आईसीसी चैंपियनशिप में कुल मिलाकर भारत का प्रदर्शन बुरा नहीं रहा है. 1998 में ढाका में भारत ने जब ऑस्ट्रेलिया को हराकर सेमी फ़ाइनल में जगह बनायी थी तब सचिन तेंदुलकर ने बल्ले और गेंद दोनों के साथ कमाल दिखाया था. उन्होंने 141 रन बनाए और 38 रन देकर 3 विकेट भी लिए. 2000 में सौरभ गाँगुली ने सेमी फ़ाइनल और फ़ाइनल दोनों में शतक जड़ा लेकिन क्रिस केन्स के धुआंधार शतक ने फाइनल में भारत की उम्मीदों पर पानी फेर दिया. इंग्लैंड में ज़ोर-आज़माइश और अब बारी है एक बार फिर बारिश और ठंड के बीच इंग्लैंड में आज़माइश की.
लेकिन इस वर्ष ऑस्ट्रेलिया और पाकिस्तान से अच्छा प्रदर्शन करने के बाद स्वदेश लौटी भारतीय टीम, जब एक लंबे अंतराल के बाद एशिया कप के लिए कोलंबो पहुंची तब उसका प्रदर्शन निराशाजनक रहा. कोलंबो के बाद ऑस्ट्रेलिया और पाकिस्तान के साथ हॉलैंड में त्रिकोणीय एक दिवसीय श्रृंखला के दौरान भी भारतीय टीम ने अपने देश के क्रिकेट प्रेमियों को निराश किया. सचिन तेंदुलकर घायल होने के कारण मैदान से बाहर रहे. और फिर आयी इसी महीने के शुरू में इंग्लैंड में आयोजित नैटवेस्ट श्रृंखला जिसके पहले दो मैचों में भारत को बुरी तरह हार का मुँह देखना पड़ा. ख़ैर, श्रृंखला हारने के बाद तीसरे मैच में जीत भारत की झोली में आयी और मनोवैज्ञानिक दबाव झेल रही भारत की टीम के लिए कुछ नयी आशा जगी. अब जबकि चैंपियंस ट्रॉफी के पूल-सी में पाकिस्तान और कीनिया के साथ जगह पाने वाली भारतीय टीम मैदान पर उतरेगी तब एक बार फिर उसे अब तक फिट नहीं हो पाए सचिन तेंदुलकर की कमी खलेगी तो ज़रूर. लेकिन पूर्व टेस्ट खिलाड़ी और राष्ट्रीय क्रिकेट टीम के मुख्य चयनकर्ता सैयद किरमानी का मानना है कि नैटवेस्ट सिरीज़ के आखिरी मैच में मिली जीत से टीम का मनोबल बढ़ेगा और जीत के आसार बेहतर होंगे. लगातार प्रदर्शन सैयद किरमानी कहते हैं कि टीम लगातार अच्छा प्रदर्शन नहीं कर पाती जो अच्छी बात नहीं है. पूर्व टेस्ट क्रिकेटर मनिंदर सिंह मानते हैं कि टीम में अनुभवी और युवा खिलाड़ियों का अच्छा मिश्रण है. मोहम्मद कैफ़, सौरभ गाँगुली और राहुल द्रविड़ भी अच्छे फ़ॉर्म में हैं, गेंदबाजी भी नपी-तुली है और दिनेश कार्तिक के रूप में एक युवा विशेषज्ञ विकेटकीपर के शामिल किए जाने से राहुल द्रविड़ के सर से विकेटकीपिंग का बोझ उतर गया है, जो ज़रूरी भी था. लेकिन मनिंदर सिंह यह भी कहते हैं कि एक दिवसीय मैचों में अच्छे क्षेत्ररक्षण और रनों के लिए तेज़ी से भागने की आवश्यकताओँ को देखते हुए घुटने की चोट से परेशान वीवीएस लक्ष्मण और फील्ड पर ढीले-ढाले दिखने वाले अनिल कुंबले की जगह नए युवा खिलाड़ियों को मैदान पर उतारना बेहतर होता. उधर, अपने पहले टेस्ट मैच में ही शतक जड़ने वाले पूर्व टेस्ट खिलाड़ी हनुमंत सिंह का मानना है कि भारतीय टीम का अच्छा प्रदर्शन सुनिश्चित करने के लिए टीम के साथ एक खेल मनोवैज्ञानिक (स्पोर्ट्स साइकोलॉजिस्ट) का होना ज़रूरी है. बहरहाल, कप्तान सौरभ गाँगुली की विजय की रणनीति तैयार करने की क्षमता से क्रिकेट के दिग्गज अच्छी तरह वाकिफ हैं. विशेषज्ञों का मानना है कि अगर वीरेंदर सहवाग खुलकर खेलें, सौरभ, द्रविड़, कैफ़ और युवराज दबाव में नहीं आएँ और नेहरा, पठान, बालाजी और हरभजन अपनी गेंदों की दिशा और दूरी नियंत्रित रखें तो भारत के लिए ट्रॉफ़ी को अपने पास बचाए रखना शायद मुश्किल नहीं हो. |
| ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||