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बस एक पदक.... | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
हर प्रतियोगिता में जीत की संभावना होती है और हार की भी. शायद शर्मनाक हार की भी. लेकिन उन खिलाड़ियों का अधिक सम्मान किया जाना चाहिए जो जीत की ज़्यादा उम्मीद न रखते हुए भी मैदान में उतरते हैं और कोशिश करते हैं. एथेंस ओंलपिक खेलों में भारतीय खिलाड़ियों ने कई बार ऐसी कोशिश की. बार-बार भारतीय धावक, तीरंदाज़, तैराक, नाविक, निशानेबाज़, भारत्तोलकों, पहलवानों ने कोशिश की और हर बार निराश ही हुए. 75 सदस्यीय भारतीय दल ने एक पदक जीता, पाँच फ़ाइनल में पहुँचे और एक कांस्य जीतते जीतते रह गए. अब शुरू होगा आरोपों और सफ़ाइयों का दौर, लेकिन खिलाड़ियों की असफलता के बावजूद उन्हें श्रेय दिया जाना चाहिए कि कम से कम उन्होंने कोशिश तो की. उम्मीद तो हारी, लेकिन क्या पाया? फिर सवाल उठता है कि ओलंपिक में लोग जीतने के लिए जाते हैं केवल वहाँ सैर करने के लिए नहीं. भारत सरकार ने खेलों की तैयारी में 94 करोड़ रूपए ख़र्च किए. इतना बड़ा दल, अधिकारी और प्रशिक्षक भेजे तो इतनी निराशा क्यों हाथ लगी? भारतीय ओलंपिक संघ के महासचिव रणधीर सिंह का कहना है कि उन्हें दुःख तो है कि मेडल नहीं मिले पर भारतीय खिलाड़ियों ने कई मुकाबलों में क्वालीफ़ाई किया, तो उससे टीम का स्तर बढ़ा है. कुछ दिन पहले जब भारत के खेल मंत्री सुनील दत्त ओलंपिक खेल देखने और अपनी टीम का उत्साह बढ़ाने एथेंस में थे. उसी दौरान बीबीसी के साथ बातचीत में उन्होंने कहा था कि उन्हें उम्मीद है कि खेल ख़त्म होने तक भारत कुछ तो मेडल लेकर आएगा ही. लेकिन खेलों की समाप्ति तक भारत एक से अधिक पदक जीत नहीं पाया और अंक तालिका में 66वें नंबर पर रहा. संघ की उम्मीद बात अब नज़रिए की है. ओलंपिक संघ मानता है कि भारत निशानेबाज़ी और तीरंदाज़ी जैसे खेलों में ऊपर आया है और यह अच्छी बात है. रणधीर सिंह कहते हैं कि जब भारत में खेल होगें तो उससे टीम का स्तर बढ़ेगा.
उन्होंने कहा, "2010 में राष्ट्रमंडल होने वाले हैं और हम चाहते हैं कि 2014 के एशियाई खेल भी दिल्ली में हों ताकि लोगों में खेलों को लेकर जागरूकता हो." रणधीर सिंहं ने कहा, “हमारे जूनियर खिलाड़ी अतंरराष्ट्रीय खेलों में अच्छा प्रदर्शन कर रहे हैं और हमें उम्मीद है कि चार साल बाद ओलंपिक में हमारा प्रदर्शन अच्छा हो जाएगा.” एक अरब से अधिक जनसंख्या वाला और तेज़ी से बढ़ती अर्थव्यवस्था वाला देश इसी उम्मीद में बरसों से रहा है कि एक दिन ओंलिपक खेलों में प्रदर्शन अच्छा होगा. एक दिन पदक तालिका में भारत का नाम खोजने में मेहनत नहीं करनी पड़ेगी और शायद एक दिन भारतीय खिलाड़ी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चैंपियन की तरह खेलेंगे, जीतने के लिए खेलेंगे और जीत कर ही आएंगे. दिल नाउम्मीद नहीं, नाकाम ही तो है. यह भी देखिए कुछ दिलचस्प कहानियाँ है इन ओलंपिक खेलों में – बहादुर शाह (शॉट पुट) और अनिल कुमार (डिस्कस थ्रो) ने अपने तीनों मौकों पर फ़ाउल किया मल्लेश्वरी जब तक वज़न उठाने से ठीक पहले तक स्वस्थ थीं, वे झुकीं और उनकी पीठ में दर्द हुआ. कॉमनवेल्थ चैंपियन निशानेबाज़ अंजली भागवत फ़ाइनल के लिए क्वालिफ़ाई नहीं कर पाईं तैराक शिखा टंडन 100मीटर और 50 मीटर फ़्रीस्टाइल में 46वें और 40वें स्थान पर आईं. नौकायन में मालव श्रौफ़ और सुमीत पटेल 19वें स्थान पर सबसे नीचे थे. |
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