|
कहाँ चूक गई भारतीय टीम | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
मुल्तान टेस्ट में मिली शानदार जीत के बाद शायद ही किसी ने कल्पना की होगी कि लाहौर टेस्ट सिर्फ़ चार दिन में भारत की हार के साथ ख़त्म होगा. वो भी इस एकतरफ़ा अंदाज़ में कि पूरे टेस्ट में ऐसा कभी नहीं लगा कि भारतीय टीम मैच जीत या ड्रॉ करा सकती है. तो क्या हो गया इतने कम समय में जो भारतीय टीम के ख़िलाफ़ गया. एकाएक इतनी मज़बूत लगने वाली टीम में कमज़ोरी ही कमज़ोरी नज़र आने लगी. दरअसल भारतीय टीम ने पहले टेस्ट में पाकिस्तान की हार के बाद न सिर्फ़ उन्हें कम करके आँका बल्कि अपनी रणनीति भी अच्छी नहीं बनाई. फ़ैसला साहसिक या.... पाकिस्तान को कम करके आँकने का ही परिणाम था कि भारतीय कप्तान राहुल द्रविड़ ने टॉस जीतने के बावजूद गेंदबाज़ी न करके बल्लेबाज़ी करने का फ़ैसला किया.
क्रिकेट के कुछ शीर्ष जानकारों ने इस फ़ैसले को साहसिक और न जाने क्या-क्या कहा. लेकिन भई आप क्रिकेट खेल रहे हैं और अगर विकेट से आपको शुरू में फ़ायदा मिलता नज़र आ रहा है तो आप उसे क्यों नहीं लेना चाहेंगे. जानकारों ने यहाँ तक कहा कि 287 रन का स्कोर कुछ कम नहीं और चौथी पारी तो पाकिस्तान को खेलनी होगी और घूमती गेंदों का नतीजा उसे ही भुगतना होगा. लेकिन पाकिस्तान को चौथी पारी खेलनी तो पड़ी लेकिन औपचारिकतावश. यानी अपनी टीम के बारे में अति-विश्वास और सामने वाली टीम को कम करके आँकने का नतीजा ही था कि भारतीय कप्तान ने शुरू में ही ग़लती कर दी. और यों कहें कि पाकिस्तान की जीत की बुनियाद पहले दिन ही रख दी गई थी तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी. गुल का क़हर लेकिन अगर आपने सोच-विचार कर पहले बल्लेबाज़ी करने का फ़ैसला कर ही लिया तो आपके बल्लेबाज़ों ने कैसे पाकिस्तान के गोलंदाज़ों का सामना करने की रणनीति बनाई थी.
मैदान पर तो ऐसा बिल्कुल नहीं लगा. शीर्ष बल्लेबाज़ों ने जैसी बल्लेबाज़ी की उससे तो यही लगा कि टीम तैयारी करके हीं नहीं उतरी है. पाकिस्तान के युवा गेंदबाज़ उमर गुल ने क़हर ढाया और फिर मुल्तान की शेर भारतीय टीम 287 पर ढ़ेर हो गई. सच मानिए तो भारत पहले ही दिन टेस्ट में हार गया था. सहवाग अपनी अंदाज़ में खेले और चलते बने. भई आपका अंदाज़ निराला है, लोगों को आपका क्रिकेट देखने में मज़ा भी आता है लेकिन आप टेस्ट खेल रहे हैं और टीम की विकट स्थिति आपके सामने है.
लेकिन मुल्तान में इतिहास रचने वाले सहवाग को क्या किसी ने सलाह-मशविरा नहीं दिया. ख़ैर उन्होंने तो फिर भी रन बनाए. अंदर आती गेंदें सचिन की मुश्किल बनती जा रही हैं और दोनों पारियों में उनकी इस कमी ने उनका विकेट ले लिया. द्रविड़ और लक्ष्मण ने तो हद ही कर दी. बाहर जाती गेंदों से छेड़छाड़. कब सुधरेंगे आप वो ही ऐसी संकट वाली स्थिति में. ज़िम्मेदारी भला हो युवराज और इरफ़ान का जिनका बल्ला चल गया और 287 रन भी बन गए. अन्यथा पारी की हार कहाँ टलने वाली थी. दूसरी ओर मुल्तान की हार और उसकी आलोचना के बाद पाकिस्तानी खिलाड़ियों ने अच्छी मेहनत की. जैसा की मैच के बाद कप्तान इंज़माम-उल-हक़ ने भी कहा कि उन्होंने नेट में जम कर अभ्यास किया और भारत के ख़िलाफ़ रणनीति भी बनाई, जो चली.
कप्तान इंज़माम और इमरान फ़रहत ने शतक लगाया तो योहाना ने भी ज़िम्मेदारी वाली पारी खेली और आख़िर में आसिम कमाल ने रही-सही कसर पूरी कर दी. यानी बल्लेबाज़ों ख़ासकर कप्तान इंज़माम ने अपनी भूमिका निभाई. विकेट पर टिके रहने का माद्दा तो कोई इंज़माम से सीखे. पूरी सिरीज़ के हीरो साबित हो रहे हैं इंज़माम. भारतीय गेंदबाज़ी का क्या कहें. वैसे भी उन पर कोई दावा तो किया नहीं जा रहा था. लेकिन समझ में नहीं आया कि आशीष नेहरा जब वापस बुलाए गए थे तो उन्हें मैदान पर उतरने का मौक़ा क्यों नहीं दिया गया. जबकि आपके पास ज़हीर भी नहीं थे. एक-एक विकेट को तरसते रहे गेंदबाज़. प्रभावित किया तो बालाजी ने. जो बोलते तो कम हैं लेकिन मेहनत खूब करते हैं.
इरफ़ान को विकेट तो मिले लेकिन देर से. इतनी देर से कि भारतीय टीम का लौटना मुश्किल लग रहा था. 202 रनों की बढ़त पाकिस्तान के लिए काफ़ी साबित हुई. ख़ासकर वैसे समय जब उनका सबसे बड़ा गोलंदाज़ शोएब अख़्तर क़हर ढा रहा हो. साथ में उमर गुल और मोहम्मद समी तो थे ही. दूसरी पारी में जिस तरह भारतीय शीर्ष बल्लेबाज़ी चरमराई उस पर कुछ न कहें तो बेहतर है. सहवाग चले और चले पार्थिव पटेल तो शीर्ष बल्लेबाज़ क्यों नहीं चल सकते थे. कहा जाता है कि क्रिकेट में भी सबका दिन एक जैसा नहीं रहता. लेकिन एक साथ सबका इस पर आप हम सभी अचरज कर सकते हैं. ख़राब अंपायरिंग भारतीय खिलाड़ियों की तमाम ग़लतियों के साथ-साथ अगर ख़राब अंपायरिंग का जिक्र न करें तो कहानी पूरी नहीं होती.
ऑस्ट्रेलिया दौरे पर भी वेस्टइंडीज़ के अंपायर स्टीव बकनर से भारतीय खिलाड़ियों को शिकायत थी. लेकिन इस टेस्ट में बकनर के साथ-साथ साइमन टौफ़ल ने भी बड़ी ग़लतियाँ की. भारतीय क्रिकेट प्रबंधन अगर इससे नाराज़ था तो उनकी नाराज़गी जायज थी. लेकिन यहाँ यह भी कहना ठीक होगा कि हमें भारतीय टीम की हार का ठीकरा अंपायरिंग के सिर फोड़ने की ज़रूरत नहीं. क्योंकि ख़राब अंपायरिंग के बावजूद टीम का प्रदर्शन कैसा था इसमें भी झाँकने की ज़रूरत है. यह ज़रूर है कि कुछ फ़ैसले पाकिस्तानी टीम के पक्ष में गए और कुछ भारतीय टीम के ख़िलाफ़. भारत की दूसरी पारी में तो अनिल कुंबले की स्टंपिंग पर तीसरे अंपायर तक का फ़ैसला विवादित रहा. भारतीय गेंदबाज़ों की एलबीडब्लू की कुछ अपीलें ख़ारिज नहीं की जानी चाहिए थी और एक बार तो योहाना का साफ़-साफ़ लग रहे कैच की अपील ठुकरा दी गई. लेकिन क्रिकेट में ऐसे मौक़े कई बार आते हैं. ज़रूरत सिर्फ़ इस बात की है कि आईसीसी अंपायरों की नकेल कसने का उपाय करें और कम से कम उनके पास तो यह संदेश जाना ही चाहिए कि मैदान पर उनका फ़ैसला तो आख़िर है ही लेकिन उन्हें इसका गुमान नहीं होना चाहिए कि वे हमेशा सही ही होते हैं. मुल्तान में शानदार जीत और लाहौर में पटखनी- क्रिकेट में ऐसा कई बार हुआ है लेकिन भारतीय टीम से हर मामले में चूक हुई. जो ऐसे मौक़ों पर शानदार फ़ॉर्म में चल रही टीम से अपेक्षा नहीं की जाती. |
| ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||