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कुछ तो है......... | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
पाकिस्तान के ऐतिहासिक दौरे पर गई भारतीय टीम ने 10 दिनों के अंदर दूसरी बार इतिहास रचा. एक दिवसीय सिरीज़ में जीत हासिल करने के बाद भारत ने पाकिस्तान की ज़मीन पर पहली टेस्ट जीत हासिल की. मुल्तान टेस्ट से पहले भारत ने पाकिस्तान में 20 टेस्ट खेले थे जिनमें से 15 ड्रॉ रहे थे और पाँच में उसे हार मिली थी. मुल्तान में मिली भारत की जीत सौभाग्य से मिली जीत, पिच के फ़ायदे के कारण मिली जीत या फिर एक मैच में शानदार प्रदर्शन के कारण मिली जीत नहीं है. इसके पीछे कोच जॉन राइट, फ़िजियो एंड्रयू लिपस, कप्तान सौरभ गांगुली और देश में क्रिकेट की नवोदित प्रतिभा को उभारने के कई मज़बूत कार्यक्रमों का बड़ा योगदान रहा है. यानी इस भारतीय टीम में कुछ तो है जिसने क़रीब 18-19 महीनों से अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में एक से बढ़कर एक बुलंदियाँ हासिल की है. आईसीसी चैंपियंस ट्रॉफी में जीत से शुरू हुआ सफ़र विश्व कप के फ़ाइनल में पहुँचने तक चला. फिर आई ऑस्ट्रेलिया दौरे की बारी जहाँ टेस्ट सिरीज़ में भारत ने अपने प्रदर्शन से उन आलोचकों की बोलती बंद करा दी जो कहते थे कि विदेशी धरती पर टीम चलती नहीं. बल्लेबाज़ी वर्षों से दुनिया भारतीय बल्लेबाज़ी का लोहा मानते आई है. लेकिन मौजूदा भारतीय टीम में जिस तरह के बल्लेबाज़ हैं उन्हें आँख मूँदकर क्रिकेट के जानकार 100 अंक देते हैं.
सचिन तेंदुलकर जैसा दुनिया का नंबर एक बल्लेबाज़. जिसने इतनी कम उम्र में क्रिकेट इतिहास के पन्नों को कई बार दोबारा लिखने पर मजबूर किया है. एक दिवसीय मैचों में उनकी और वीरेंदर सहवाग की जोड़ी दुनिया की सबसे ख़तरनाक जोड़ी है जो ऑस्ट्रेलिया के गोलंदाज़ों सहित किसी भी आक्रमण की बखिया उधेड़ने की काबलियत रखती है. टेस्ट मैचों में सचिन के खाते में 33 शतक हैं यानी महान सुनील गावसकर के रिकॉर्ड 34 शतकों से सिर्फ़ एक दूर. वनडे मैचों में तो 37 शतक और 13 हज़ार से ज़्यादा रन हैं सचिन के पास जो हाल-फ़िलहाल तो कोई खिलाड़ी पार पाने में सक्षम नहीं. सहवाग की छवि एक दिवसीय मैचों में तो विस्फोटक बल्लेबाज़ की है ही मुल्तान टेस्ट में रिकॉर्ड 309 रनों की पारी खेलकर सहवाग दुनिया के उन 17 खिलाड़ियों में शामिल हो गए हैं जिन्होंने 300 या उससे अधिक रनों की पारी खेली है. इसके अलावा भारत के पास वीवीएस लक्ष्मण का धैर्य है तो राहुल द्रविड़ का धैर्य के साथ संतुलन.
जो भारतीय बल्लेबाज़ी क्रम में चार चाँद लगा देता है. ऑस्ट्रेलिया में जिस तरह लक्ष्मण और द्रविड़ ने अपने बल्ले का जादू दिखाया वह किसी करिश्मे से कम नहीं था. ऑस्ट्रेलिया के ख़िलाफ़ लक्ष्मण की 281 रनों की पारी कौन भूल सकता है. सहवाग के 309 रनों से पहले भारतीय बल्लेबाज़ का सर्वाधिक स्कोर यही था. द्रविड़ के रूप में भारत को एक ऐसा खिलाड़ी मिला है जो भरोसेमंद तो है ही ज़रूरत पड़ने पर किसी भी गेंदबाज़ की लाइन-लेंथ बिगाड़ सकता है. इन सभी के बीच कप्तान सौरभ गांगुली का ज़िक्र कैसे नहीं किया जा सकता. गांगुली ने जब से भारतीय टीम की कमान संभाली है वे कप्तान से ज़्यादा एक संस्था के रूप में उभरे हैं. कैसे एक टीम में भरोसा पैदा करना है उन्हें मैदान पर आख़िरी क्षण तक कैसे संघर्ष करना है गांगुली ने कई बार ऐसा करके दिखाया है. बल्ले से उनका प्रदर्शन भारतीय टीम के लिए धरोहर से कम नहीं. एक समय ऐसा था जब वे वनडे मैचों में सचिन के साथ पारी शुरू करते थे और रनों की बारिश होती थी. टीम के लिए उन्होंने सहवाग और सचिन पर यह ज़िम्मेदारी छोड़ दी है लेकिन बल्ले से उनका कमाल किसी भी क्रम पर जारी है. गेंदबाज़ी एक समय था जब भारतीय टीम जब कभी अपने गेंदबाज़ों को याद करती थी तो उनके पास कहने को सिर्फ़ कपिल देव होते थे या फिर स्पिन चौकड़ी चंद्रशेखर, वेंकटराघवन, प्रसन्ना और बिशन सिंह बेदी.
लेकिन तेज़ गेंदबाज़ों की आज की पीढ़ी एक नया इतिहास रच रही है. मुल्तान का ही उदाहरण लें. बेजान पिच पर किसी भी गेंदबाज़ के अच्छा प्रदर्शन की बात को पहले से ही ख़ारिज की जा रही थी. शुरू में तो ऐसा हुआ भी जब पाकिस्तान के रावलपिंडी एक्सप्रेस शोएब अख़्तर और मोहम्मद समी जैसे गेंदबाज़ भी नहीं चले. लेकिन जब भारत की बारी आई तो युवा इरफ़ान ने पाकिस्तानी कैंप में उथल-पुथल मचा दी. ज़हीर ख़ान चले और बालाजी भी और फिर रहा-सहा काम पूरा किया अनुभवी स्पिन गेंदबाज़ अनिल कुंबले ने. कपिल देव के बाद भारतीय तेज़ गेंदबाज़ी की कमान श्रीनाथ और वेंकटेश प्रसाद ने संभाली. लेकिन अब जो नई पीढ़ी मैदान पर आक्रमक अंदाज़ में बागडोर संभाल रही है वह अनोखा है. ज़हीर ख़ान, आशीष नेहरा, इरफ़ान पठान और बालाजी का जोश मैदान पर देखते ही बनता है. सबसे बड़ी ख़ासियत यह कि वे अपने पर भरोसा कर रहे हैं. उपमहाद्वीप की बेजान पिच और उस माहौल से निकलने वाले इन खिलाड़ियों को भरोसा है कि वे तेज़ पिच पर भी अपना जलवा दिखा सकते हैं. मैदान के बाहर का कमाल लेकिन इसके अलावा टीम को चुस्त-दुरुस्त बनाने और उन्हें हर तरह के मुक़ाबले के लिए तैयार करने के पीछे क़रीब साढ़े तीन सालों से जुटे कोच जॉन राइट की भूमिका को कैसे नज़रअंदाज़ किया जा सकता है.
नवंबर 2000 में राइट को भारतीय टीम के कोच की भूमिका सौंपी गई थी. उसके बाद उन्होंने टीम में धीरे-धीरे ख़ामोश क्रांति लानी शुरू की. जो पहले तो नहीं दिखा लेकिन धीरे-धीरे अपना असर दिखाने लगा. फ़िजियो एंड्रयू लिपस की मेहनत भी रंग लानी शुरू की. उन्होंने टीम को चुस्त-दुरुस्त बनाने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी. मैदान पर खिलाड़ी एक-एक रन बनाने और एक-एक रोकने के लिए अपनी जी-जान लगा रहे हैं. तो इससे आप अंदाज़ा लगा सकते हैं कि यूँ ही भारतीय टीम अच्छा प्रदर्शन नहीं कर रही इसके पीछे वर्षों की मेहनत लगी है. जो अब मैदान पर दिख रही है. |
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