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दस के बजाय दो सौ रुपए देने पड़े... | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
क्रिकेट चाचा सूफ़ी अब्दुल जलील को प्यार से चाचा कहा जाता है. चाचा को पाकिस्तानी टीम का प्रामाणिक चीयर लीटर कहा जाता है. चाचा पाकिस्तानी क्रिकेट टीम का साथ कभी नहीं छोड़ते और वे हर उस जगह जाते हैं जहाँ पाकिस्तानी टीम क्रिकेट खेलने जाती है. हरे रंग का ढीला कुर्ता पहने हुए चाचा के हाथ में हमेशा एक बड़ा पाकिस्तानी झंडा रहता है. हर शॉट लगने और विपक्षी टीम का विकेट गिरने पर चाचा खड़े होकर ज़ोर-ज़ोर से झंडा लहराते हैं और 'जिए पाकिस्तान' का नारा भी. चाचा अब तक देश-विदेश में चार सौ मैच देख चुके हैं. उनकी विदेश यात्राओं को पाकिस्तानी क्रिकेट बोर्ड प्रायोजित करता है और उन्हें बोर्ड की तरफ़ से दस हज़ार रुपए हर महीने का बोनस भी मिलता है. चाचा पाकिस्तान में इतने लोकप्रिय हैं कि लोग बाक़ायदा उनसे हाथ मिलाकर फ़ख़्र महसूस करते हैं और ऑटोग्राफ़ देते हुए चाचा के हाथ भी थक जाते हैं. पोलियो निवारण भारतीय टीम के दो सदस्यों सचिन तेंदुलकर और वीवीएस लक्ष्मण ने पोलिया निवारण अभियान में अपनी सेवाएं दे दी हैं. अपने व्यस्त कार्यक्रम के बावजूद उन्होंने पाकिस्तान टेलीविज़न पर संदेश रिकॉर्ड कराए हैं. तेंदुलकर कहते हैं, "आओ मिलकर पोलिया को बोल्ड आउच करें", जबकि लक्ष्मण का नारा है, "पोलियो को एक भी रन स्कोर न करने दीजिए". तक्षशिला संग्रहालय रावलपिंडी का दिन-रात का मैच साढ़े दस बजे ख़त्म होने के बाद जब होटल पहुँचे तो रात का एक बज गया था. और जब तक लंदन रिपोर्ट फ़ाइल की, तब तक घड़ी ने ढाई बजा दिए थे.
पेशावर के लिए हमारे जहाज़ की उड़ान सुबह छह बजे थी. मैंने तय किया कि जहाज़ से जाने के बजाय कार से पेशावर जाया जाए. उसमें एक तो सोने के लिए कुछ वक़्त मिल जाएगा और फिर पाकिस्तान की सड़कों, गाँवों और क़स्बों से गुज़रने और उन्हें देखने का मौक़ा भी. इस्लामाबाद से निकलने के चालीस मिनट बाद हम विश्व प्रसिद्ध तक्षशिला संग्राहलय में रुके. पाकिस्तान में अब इसे टैक्सिला कहा जाता है. आम लोगों के लिए संग्राहलय में घुसने का प्रवेश शुल्क दस रुपए है लेकिन मुझे दो सौ रुपए देने पड़े क्योंकि मेरे पास भारतीय पासपोर्ट था. तक्षशिला ईसापूर्व काल मं एक प्रसिद्ध विश्वविद्यालय था. इस संग्रहालय में उसी ज़माने की चीज़ों, बर्तनों, खिलौनों और औज़ारों को बहुत करीने से रखा गया है.
बुद्ध की सैकड़ों मूर्तियाँ यहाँ हैं, ख़ासतौर से प्रवेश द्वार पर सिलेटी रंग की एक भव्य मूर्ति पर सबका ध्यान जाता है जिसमें गौतम बुद्ध के चेहरे पर मूँछें हैं. रास्ते में हम अटक के क़िले के पास से गुज़रते हैं. यहीं दाहिनी तरफ़ से काबुल और बाईं तरफ़ से सिंध नदीं आकर आपस में मिल रही हैं. धुँधलका होते-होते हम पेशावर में दाख़िल हो जाते हैं. क़रीब 25 लाख की आबादी की चहल-पहल वाला शहर, चौड़ी-चौड़ी सड़कें लेकिन बेइंतिहा वाहन. ढीली सलवार-क़मीज़ें पहने हुए मर्द लेकिन औरतें अपेक्षाकृत कम. क़िस्साख़ानी बाज़ार, बाड़ा बाज़ार और नमक मंडी जैसे पुराने इलाक़े जिनके साथ बहुत पुराना इतिहास जुड़ा हुआ है. इसके बारे में चर्चा अगले अंक में... |
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