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भारत-पाक क्रिकेट पर सट्टा बाज़ार गर्म | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
भारत की व्यापारिक राजधानी मुंबई को देश की 'सट्टा राजधानी' भी कहा जाता है. और मौक़ा अगर सालों बाद भारत और पाकिस्तान के बीच क्रिकेट मैच का हो, तो इस सट्टा बाज़ार की गतिविधियों का अंदाज़ा लगाया जा सकता है. माना जाता है कि कुल ग़ैर क़ानूनी सट्टे का क़रीब तीन चौथाई मुंबई में लगता है. मीडिया रिपोर्टों के अनुसार पिछले साल भारत और ऑस्ट्रेलिया के बीच हुए विश्व कप के फ़ाइनल के दौरान अकेले मुंबई में 50 करोड़ डॉलर का सट्टा लगा था. और अब मौक़ा है सालों बाद भारत और पाकिस्तान के बीच हो रही पूर्ण क्रिकेट सिरीज़ का. मुंबई के एक सट्टेबाज़ का कहना है कि 13 मार्च को कराची में भारत और पाकिस्तान के बीच हुए पहले एक दिवसीय मैच के दौरान पूरे देश में एक अरब डॉलर का सट्टा लगा था. लेकिन ग़ैर क़ानूनी सट्टे को लेकर बदनाम मुंबई, पुलिस अधिकारियों की नज़र में भी चढ़ा हुआ है. बाहर से धंधा अभी तक आठ दलाल गिरफ़्तार किए जा चुके हैं. पुलिस की कड़ी कार्रवाई के कारण ज़्यादातर सट्टेबाज़ अब मुंबई शहर के बाहर से अपना धंधा चला रहे हैं.
मुंबई पुलिस की अपराध शाखा के संयुक्त आयुक्त सत्यपाल सिंह का कहना है, "सट्टेबाज़ी पर एकाएक रोक लगाना संभव नहीं. हमें सूचना मिली है कि ज़्यादातर सट्टेबाज़ या तो गुजरात या फिर नवी मुंबई चले गए हैं." मुंबई के एक सट्टेबाज़ का कहना है कि शहर में तीन हज़ार सट्टेबाज़ काम करते हैं लेकिन इनमें से पाँच का धंधा सबसे बड़ा है. क्रिकेट पर भारत में बड़े पैमाने पर सट्टा भारत के 1983 में विश्व कप जीतने और फिर मैचों का सीधा प्रसारण ज़ोर-शोर से दिखाए जाने के बाद शुरू हुआ. इंटरनेट पर मौजूद सीबीआई की एक रिपोर्ट में कहा गया है कि आजकल क्रिकेट में सट्टेबाज़ी शायद देश का सबसे बड़ा संगठित धंधा है.
आकलन के अनुसार अगर किसी भी एक दिवसीय मैच का भारत में सीधा प्रसारण किया जा रहा है तो उसमें लाखों डॉलर का सट्टा लगता है. मीडिया में इसकी भी हमेशा से चर्चा होती है कि सट्टेबाज़ी का बाज़ार अंडरवर्ल्ड की देखरेख में चलता है और इसका नियंत्रण दुबई से होता है. कमज़ोर क़ानून सट्टेबाज़ी भारत में ग़ैर क़ानूनी है लेकिन इस मामले पर क़ानून बहुत कड़ा नहीं है.
इस धंधे के फलने-फूलने के पीछे पब्लिक गैम्बलिंग एक्ट के कई कमज़ोर पहलू हैं. इस क़ानून के प्रावधान राज्यों में अलग-अलग हैं. वकील मजीद मेमन का कहना है, "यह क़ानून सट्टेबाज़ी को गंभीरता से नहीं लेता है और इसे रोकने में नाकाम रहा है. महाराष्ट्र में इस क़ानून के तहत सज़ा तो है लेकिन बहुत कम." मुंबई पुलिस के संयुक्त आयुक्त सत्यपाल सिंह बताते हैं, "अगर किसी व्यक्ति के ख़िलाफ़ मामला तगड़ा है तो तीन साल तक की सज़ा हो सकती है." कुछ रिपोर्टों के अनुसार पुलिस सट्टेबाज़ी को संगठित अपराध की श्रेणी में लाना चाहती है ताकि इसमें सज़ा कड़ी हो सके. लेकिन सट्टेबाज़ी का पता लगाना काफ़ी मुश्किल होता है. वैसे एक सट्टेबाज़ को अपना धंधा शुरू करने के लिए एक टेलीविज़न सेट, एक मोबाइल फ़ोन, एक नोट बुक और एक ऐसे ग्राहक की ज़रूरत होती है जिसे वह अपने संपर्कों के माध्यम से जानता है. भारत में सौदा सिर्फ़ बोली से लगता है और इसमें भरोसे की बात होती है. जिनके माध्यम से सट्टा लगाया जाता है उन्हें दलाल कहते हैं. उदाहरण के लिए सट्टेबाज़ी के लिए दलाल सट्टेबाज़ को फ़ोन करके रेट मालूम करेगा और फिर एक ख़ास रकम के लिए सट्टा लगाएगा. सट्टेबाज़ एक नोटबुक में इस सट्टे की जानकारी दर्ज कर लेता है. मैच के बाद पैसों का आदान-प्रदान होता है और नोट बुक नष्ट कर दी जाती है. कई बार इन सट्टेबाज़ों का नाम उनके शहर से जुड़ जाता है जैसे अगर राजू नाम का सट्टेबाज़ दिल्ली से धंधा करता है तो उसका नाम होता है राजू दिल्ली या फिर प्रीतम इंदौर. मैच फ़िक्सिंग एक बड़े संगठित बाज़ार के रूप में स्थापित हो चुकी सट्टेबाज़ी का कुछ और भी प्रभाव पड़ता है.
सट्टेबाज़ों का कहना है कि अगर बहुत ज़्यादा पैसा लगता है तो मैच फ़िक्सिंग का डर भी क़ायम हो जाता है. एक शेयर दलाल के अनुसार, "भारत और पाकिस्तान जैसे रोमांचक मुक़ाबले में हरेक गेंद पर भी सट्टा लगता है." कई भारतीय देशभक्ति के कारण भारत पर ज़्यादा पैसा लगाते हैं ख़ासकर उस समय जब वह पाकिस्तान के ख़िलाफ़ खेल रहा होता है. लेकिन फ़ायदे का बाज़ार सबसे ज़्यादा गर्म होता है. इसलिए क्योंकि इन मैचों पर सबसे ज़्यादा सट्टा लगता है. एक सट्टेबाज़ के अनुसार, "बड़े सट्टेबाज़ जीतना चाहते हैं इसलिए वे हमेशा अच्छी टीम पर ही सट्टा लगाते हैं भले ही वह पाकिस्तान ही क्यों न हो." इस सट्टेबाज़ के अनुसार उसने पिछले साल के विश्व कप फ़ाइनल के दौरान 50 लाख डॉलर का बड़ा सट्टा लगते देखा है. कई लोगों का यह भी मानना है कि सट्टा बाज़ार को क़ानूनी रूप दे दिया जाना चाहिए क्योंकि इससे सरकार की कमाई बढ़ेगी. केंद्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड के एक सलाहकार का कहना है, "सट्टेबाज़ार के स्वरूप को देखते हुए इसे अगर क़ानूनी बना दिया जाए तो सरकार मनोरंजन या दूसरे कर के माध्यम से काफ़ी कमाई कर सकती है." लेकिन कई लोगों का मानना है कि अगर इसे क़ानूनी जामा पहनाया जाएगा तो समाज में जूआ खेलने की प्रवृति बढ़ सकती है. |
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