सबसे ठंडे ओलंपिक में भारतीय हॉकी का जलवा

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- Author, रेहान फ़ज़ल
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
एक शख़्स को 1924 ओलंपिक खेलों में नौकायन में अमरीका की नुमाइंदगी करने के लिए चुना जाता है. और वो सिर्फ़ इस कारण टीम का हिस्सा बनने से इनकार कर देता है क्योंकि उसे अपनी गर्भवती पत्नी के साथ रहना है, जो उसके पहले बेटे को जन्म देने वाली है.
28 साल बाद उनका वही बेटा फ़्रैंक हेवेंस न सिर्फ़ हेलसिंकी ओलंपिक में अमरीका का प्रतिनिधित्व करता है बल्कि क्नूइंग की दस हज़ार मीटर केनेडियन सिंगल्स स्पर्धा में स्वर्ण पदक भी जीतता है.
हेलसिंकी में हुए ओलंपिक खेलों में 40 साल बाद सोवियत संघ की वापसी हुई थी. चीन की एकमात्र तैराक वू चुआन यू इन खेलों में भाग लेने पहुंची थीं. ओलंपिक मशाल जलाई थी फ़िनलैंड के दो महान एथलीटों पावो नूर्मी और हेंस कोलेमेनिन ने.
इन खेलों में भारत की हॉकी टीम के लिए कोई बड़ी चुनौती नहीं थी. लेकिन सबसे बड़ी चुनौती आ रही थी देश की विभिन्न हॉकी एसोसिएशनों की तरफ़ से जो अंतिम समय पर अपने-अपने पसंदीदा खिलाड़ियों को टीम में घुसवाने की कोशिश कर रही थीं.
अख़बार 'टाइम्स ऑफ़ इंडिया' के 19 जून, 1952 के अंक में छपा, ''मुंबई से हर हॉकी एसोसिएशन को टेलिग्राम भेजे गए कि उत्तर प्रदेश को ओपी मल्होत्रा को एक अतिरिक्त हाफ़ के रूप में टीम में जगह दी जाए. टेलिग्राम में यह भी कहा गया कि कप्तान केडी सिंह बाबू और कोच हबूल मुखर्जी और हरबैल सिंह ओपी मल्होत्रा को टीम में शामिल करने पर ज़ोर दे रहे हैं, ख़ासकर भारत और पाकिस्तान के बीच फ़ाइनल खेले जाने की स्थिति में. ये बात कई एसोसिएशनों को थोड़ी अजीब सी लगी. उन्हें ये बात समझ में न आई कि कैसे एक खिलाड़ी एक मैच के लिए अहम हो सकता है, दूसरे मैचों के लिए नहीं.''

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जब मुंबई टेलिग्राम भेज सकता था तो भला कोलकाता कैसे पीछे रह सकता था, वहाँ से भी एक टेलिग्राम गया, ''चूँकि टीम में पाँच हाफ़ बैक पहले से ही हैं, 18वाँ खिलाड़ी फारवर्ड होना चाहिए और बंगाल सीएस गूरंग का ख़र्चा देने के लिए तैयार है, अगर उन्हें चुना जाता है.''
आलोचना से बचने के लिए टेलिग्राम में यह भी कहा गया कि गूरंग को इसलिए टीम में न शामिल किया जाए कि वो बंगाल से थे, बल्कि इसलिए कि उन्होंने पूरे सीज़न में अच्छा प्रदर्शन किया था.
टाइम्स ऑफ़ इंडिया ने अपने 19 जून, 1952 के ही अंक में टिप्पणी की, ''सारी चीज़ें निराशावादी दिखाई दे रही हैं क्योंकि खिलाड़ियों को टीम में शामिल करने की मुहिम टीम की रवानगी से कुछ समय पहले शुरू की गई है. यहाँ ये बताना ग़लत नहीं होगा कि 1948 में भी इसी तरह आख़िरी मौके पर बंगाल के एक खिलाड़ी को टीम में शामिल किया गया था और शर्त वही थी कि बंगाल एसोसिएशन उस खिलाड़ी का ख़र्च वहन करने के लिए तैयार थी.''

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भारत ने अपने ख़िताब की रक्षा की शुरुआत ऑस्ट्रिया को 4-0 से हरा कर की. लेकिन टीम का प्रदर्शन बिखरा-बिखरा सा था और कई जगह लिखा गया कि भारतीय हॉकी टीम वो धार खो चुकी है जिसकी वजह से उसे ओलंपिक खेलों में चार स्वर्ण पदक मिले हैं. टाइम्स ऑफ़ इंडिया के 18 जुलाई, 1952 के अंक में छपा, ''चैंपियन जीते, जैसा कि उनसे उम्मीद थी लेकिन ऑस्ट्रिया उनके लिए आसान प्रतिद्वंदी नहीं था. ख़ासतौर से उस मैदान पर जो बारिश की वजह से फिसलन भरा हो गया था.''
भारतीय ख़ेमे में भी इस कदर बेचैनी थी कि पंकज गुप्त ने ब्रिटेन के साथ सेमीफ़ाइनल के ठीक पहले अपने खिलाड़ियों से कहा, ''मैं चाहता हूँ लड़कों कि तुम अपना स्वाभाविक खेल खेलो. देखते ही गेंद क्लीयर करो. छोटे-छोटे पास दो और तेज़ हमले करो. तुम अच्छी तरह जानते हो कि तुम्हारा असली खेल क्या है. दिखावे वाली हॉकी से तुम्हें परहेज़ करना होगा.''
ब्रिटेन के ख़िलाफ़ सेमीफ़ाइनल में भारत बदली हुई टीम थी. उसने बहुत आसानी से ब्रिटेन को 3-1 से हराया.
बाद में टीम के सेंटर फ़ारवर्ड बलबीर सिंह ने अपनी आत्मकथा 'द गोल्डन हैट्रिक' में लिखा, ''हम बेरोकटोक तेज़ी से आगे बढ़े और हमने उनके रक्षण को बार बार भेदा. पहला गोल मुझसे संयोगवश हुआ. लेकिन इंटरवल से पहले मैंने दो गोल और कर ओलंपिक हॉकी में मैंने अपनी दूसरी हैट्रिक पूरी की. मैंने पहली हैट्रिक लंदन ओलंपिक में की थी जब मैं भारत के लिए पहली बार खेला था. ब्रिटेन ने एक गोल कर अंतर को कम ज़रूर किया. लेकिन वो इतना भर ही कर सके. भारत ओलंपिक फ़ाइनल में पहुंच चुका था.''

बाद में कांस्य पदक विजेता ब्रिटिश हॉकी टीम के सदस्य जॉन कॉकेट ने बीबीसी से कहा, ''भारत एक बड़ी टीम थी. उसका स्टिक वर्क हमसे कहीं बेहतर था. हमारी टीम में एकाध एंग्लो इंडियन थे जो भारतीयों जैसी ही ड्रिबिल करते थे. लेकिन एक टीम के रूप में वो जादूगर थे. हमारी और भारतीय ड्रिबलिंग में ज़मीन आसमान का अंतर था. हम गेंद के नीचे बाएं से दांए ड्रिबिल करते थे जबकि भारतीय गेंद के ऊपर से ड्रिबिल करते थे.''
ब्रिटेन के ख़िलाफ़ बेहतर प्रदर्शन के बावजूद हॉलैंड के ख़िलाफ़ फ़ाइनल कहीं नज़दीकी मुक़ाबला होने वाला था.
टाइम्स ऑफ़ इंडिया ने अपने 22 जुलाई, 1952 के अंक में लिखा, ''भारतीय टीम बलबीर सिंह पर कुछ ज़्यादा ही निर्भर है. भारत को लगातार अभ्यास करते रहना चाहिए ताकि वो अपने फ़ारवर्ड्स की कमियों को दूर कर सके. पंजाब के 28 साल के फ़ारवर्ड बलबीर सिंह से ही टीम के सारे हमलों की शुरुआत करने की उम्मीद करना, इस खिलाड़ी के साथ ज़्यादती होगी.''
लेकिन ये सारी चिंताएं ग़लत साबित हुईं और भारत ने फ़ाइनल में हॉलैंड को 6-1 के टेनिस स्कोर से हराया. इस मैच का विवरण देते हुए टाइम्स ऑफ़ इंडिया ने अपने 24 जुलाई, 1952 के अंक में छापा, ''विजेताओं ने अपने कौशल और कलात्मकता से डच ख़ेमे में अफ़रातफ़री फैला दी. उनके बेहतर होने में कोई संदेह नहीं था, ख़ासकर जब सेंटर फ़ारवर्ड बलबीर सिंह अपने जीवन की सर्वश्रेष्ठ फ़ार्म में हों. आकर्षक दिखने वाले इस सिख ने 1948 के ओलंपिक फ़ाइनल में भी ब्रिटेन के ख़िलाफ़ दो गोल किए थे. बलबीर ने अपने कप्तान बाबू के साथ मैच विनिंग कॉम्बिनेशन बनाते हुए भारत के लिए छह में से पाँच गोल किए. छठा गोल बाबू के हिस्से में आया.''

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इस ओलंपिक की याद करते हुए बलबीर सिंह सीनियर ने बीबीसी को बताया, "1952 के हॉकी रिकॉर्ड ओलंपिक इतिहास में दर्ज है. सेमीफ़ाइनल और फ़ाइनल में मैंने नौ गोल किए थे. हॉकी एक टीम गेम है. इसके बावजूद मैं शायद सही वक्त पर सही जगह पर रहता था, जिस वजह से गोल हो जाते थे."
भारतीय खिलाड़ियों ने अपने खेल से सबको चमत्कृत कर दिया. उनकी सबसे ज़्यादा तारीफ़ की हॉलैंड के बुज़ुर्ग हो चले कोच टी जे व्रीसेंगा ने. उन्होंने कहा, ''आज भारतीय टीम उतना ही अच्छा खेली जितना 1928 में, जब मैंने उन्हें पहली बार ओलंपिक टाइटल जीतते हुए देखा था.''
टाइम्स ऑफ़ इंडिया ने एक अमरीकी संवाददाता का ज़िक्र करते हुए लिखा, ''मैच देख रहे एक अमरीकी संवाददाता के मुंह से बाबू के हक्का बक्का कर देने वाले स्टिकवर्क, बलबीर सिंह की गोल करने की क़ाबलियत, जिन्होंने फ़ाइनल में हॉलैंड के ख़िलाफ़ छह में से पाँच गोल किए थे, राजगोपाल की गति, केशव दत्त की हर जगह रहने की क्षमता और भारतीय बैक्स जेंटिल और धरम सिंह के शक्तिशाली हिट्स को देख कर निकला था अद्भुत.''

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भारत लौटने पर इस टीम का ज़बरदस्त स्वागत हुआ. इस टीम ने शेष भारत की हॉकी टीम के ख़िलाफ़ दिल्ली के नेशनल स्टेडियम में एक मैच खेला. मैच देखने वालों में थे राष्ट्रपति डाक्टर राजेंद्र प्रसाद और प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू. बाद में बलबीर सिंह ने अपनी आत्मकथा, द गोल्डन हैट्रिक में लिखा, ''जिस ट्रेन पर हम सफ़र कर रहे थे, उसे हॉकी प्रेमियों ने एक तरह से घेर लिया. लोग हमारे कंपार्टमेंट के दोनों ओर खड़े हो जाते और हमारे दर्शन का इंतज़ार करते. जब हम ट्रेन से उतरते तो वो हमें उतनी ज़ोर से गले लगाते कि हम करीब करीब पिस जाते. जलंधर में पंजाब के चार खिलाड़ियों धरम, ऊधम, रघबीर और मुझे खुली जीप में एक जुलूस के रूप में ले जाया गया.''
हेलसिंकी खेलों में भारतीय टीम की सबसे बड़ी परेशानी थी, वहाँ का मौसम. हेलसिंकी खेल ओलंपिक इतिहास के सबसे ठंडे और गीले ओलंपिक थे. 17 डिग्री सेल्सियस का तापमान, बर्फ़ीले हवाएं और बारिश की फुहारें रोज़मर्रा की बात थी. लेकिन फ़ाइनल के दिन सूर्य देवता के दर्शन हुए और भारतीय टीम की जीत में उनका भी योगदान रहा.
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