महिला टेनिसः सानिया मिर्ज़ा के बाद कौन?

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- Author, वंदना
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
“उम्मीद है कि मेरी इस जीत से क्रिकेट क्रेज़ी भारत में पॉज़िटिव असर होगा, बहुत सी लड़कियों को प्रेरणा मिलेगी और वो ये सोच सकती हैं कि वो भी ग्रैंड स्लैम चैंपियन बन सकती हैं.”
विंबलडन का महिला डबल्स ख़िताब जीतकर इतिहास रचने के बाद भारत की सानिया मिर्ज़ा के यही अल्फाज़ थे.
सानिया अलग-अलग वर्गों में टेनिस के चारों ग्रैंड स्लैम जीतने वाली अकेली भारतीय महिला खिलाड़ी हैं. वर्ल्ड नंबर वन की रैंकिंग के साथ आज वो डबल्स में पूरी दुनिया में अव्वल हैं.
ज़ाहिर है भारत में सानिया की जीत का जश्न मनाया जा रहा है. सोशल मीडिया पर आई प्रतिक्रियाओं की बाढ़ ने साबित किया कि सानिया की ये जीत महिला टेनिस के लिए कितनी अहम रही.
लेकिन शुरुआती जश्न के माहौल से अगर बाहर निकलें और व्यापक फ़लक पर ध्यान दें तो तस्वीर उतनी चमकदार नहीं दिखाई देगी.
मामला ठन-ठन गोपाल न भी हो लेकिन हालात बहुत अच्छे भी नहीं है.
दारोमदार केवल सानिया पर

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ये भारत की खुशक़िस्मती है कि भारतीय महिला टेनिस का परचम सानिया ने बुलंद कर रखा है लेकिन बदक़िस्मती ये है कि भारत का परचम लहराने वाली सानिया फ़िलहाल एकमात्र महिला खिलाड़ी नज़र आती हैं.
डबल्स विश्व रैंकिंग पर ही नज़र डालें तो सानिया के बाद दूर-दूर तक किसी भारतीय महिला खिलाड़ी का नामोनिशान नहीं है.
सानिया के बाद डबल्स रैंकिंग में आने वाली अगली भारतीय हैं प्रार्थना थोंबारे, जिनकी रैंकिंग है 299. हालांकि वे अभी 21 साल की हैं लेकिन सफलता से कोसों दूर.
पूरी लिस्ट पर नज़र डालें तो डबल्स में 1000 के नीचे की रैंकिंग में 22 भारतीय महिला खिलाड़ी हैं.
सिंगल्स में कम खिलाड़ी

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डबल्स में तो सानिया ने मोर्चा संभाल रखा है लेकिन सिंगल्स वर्ग में तो शीर्ष खिलाड़ियों में भारतीय महिलाओं की मौजूदगी न के बराबर है.
एकल मुकाबले में सबसे ऊँची पायदान पर पहुँचने वाली भारतीय महिला खिलाड़ी सानिया ही रही हैं.
अगस्त 2007 में वो दुनिया की 27वें नंबर की खिलाड़ी थी लेकिन बाद में चोटिल होने की वजह से वे डबल्स में ज़्यादा खेलने लगीं.
मौजूदा सिंगल्स रैंकिंग में सबसे ऊँची रैंकिंग वाली भारतीय खिलाड़ी हैं अंकिता रैना जो 228वीं पायदान पर हैं और उनके बाद हैं नताशा पल्हा जो 546वें नंबर पर हैं.
इन आँकडों का लबोलुआब ये है कि सानिया को छोड़कर भारतीय महिला टेनिस को आगे ले जाने वालों की फ़ेहरिस्त बहुत सीमित है.
सानिया के लगातार अच्छे प्रदर्शन के बाद सालों से उम्मीद जताई जाती रही है कि महिला खिलाड़ियों की नई खेप निकलकर आएगी लेकिन उम्मीद कभी हक़ीक़त में नहीं बदली.
कुछ युवा खिलाड़ी हैं जिन पर नज़रे हैं जिनमें अंकिता रैना, 18 साल की स्नेहादेवी रेड्डी और (सिंगल्स रैंकिंग 677) और 18 साल की ही ध्रुति (645) शामिल हैं.
अंकिता इस साल अहमदाबाद में आईटीएफ़ सर्किट की प्रतियोगिता में रनर अप रही थीं तो पिछले साल पुणे में हुई आईटीएफ़ प्रतियोगिता में विजेता थीं.
उम्मीदें इन चंद खिलाड़ियों पर ही टिकी हैं.
महंगा खेल है टेनिस

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टेनिस कमोबेश महंगा खेल है लेकिन आज भी टेनिस खिलाड़ियों को कंपनियों की स्पॉन्सरशिप मिलना उतना आसान नहीं.
दूसरे देशों में जाकर खेलना का ख़र्च खिलाड़ियों के लिए ज़्यादा दिन उठाना मुमकिन नहीं हो पाता.
कोचिंग और ट्रेनिंग के लिए सुविधाएँ पहले से बेहतर हुई हैं लेकिन क़स्बों और छोटे शहरों में स्थिति बहुत अच्छी नहीं है.
भारत में ज़्यादा वुमेन टेनिस एसोसिएशन (डब्ल्यूटीए) प्रतियोगिताएँ होने से भी भारतीय महिला खिलाड़ियों को फायदा होगा.
मुद्दे पर लौटें तो फ़िलहाल 28 साल की सानिया अभी रिटायरमेंट से दूर हैं और उम्मीद है कि भारत के लिए और ख़िताब जीतेंगी.
लेकिन खेल की दुनिया में उत्तराधिकारियों की तलाश बहुत पहले से शुरू कर देनी पड़ती है ताकि नई प्रतिभाएँ कुछ साल बाद वर्तमान चैंपियन की जगह ले सकें.
सानिया की सफलता की चमक अभी तो आँखें चौंधिया रही हैं लेकिन उनके बाद की भारतीय महिला टेनिस की तस्वीर धुँधली सी है.
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