पाक महिला क्रिकेटः वे हारती गईं, खेलने को

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पाकिस्तान में महिला क्रिकेट की शुरुआत शाज़िया ख़ान और उनकी बहन ने अपने पिता के पैसे से की थी.
पहली सीरीज़ के सभी मैचों में उन्हें हार का सामना करना पड़ा लेकिन इस हार में भी उनकी जीत थी क्योंकि तमाम मुश्किलों के बावजूद अंतर्राष्ट्रीय क्रिकेट में उनका आगाज़ हो गया था.
और जब इस पहली टीम की दो बड़ी खिलाड़ी शाज़िया ख़ान और किरन बलोच रिटायर हुईं तो विश्वरिकॉर्ड अपने नाम करके, जो दस साल बाद भी तोड़े नहीं जा सके हैं.
पहली टीम की तैयारी
15 मार्च, 2004 को कराची के नेशनल स्टेडियम में पाकिस्तान की महिला क्रिकेट टीम अपना पहला टेस्ट मैच खेलने जा रही थी, वेस्टइंडीज़ के ख़िलाफ़.
पाकिस्तान क्रिकेट टीम की कैप्टन थीं शाज़िया ख़ान. बीबीसी स्पोर्ट्स के कार्यक्रम विटनेस में उन्होंने बताया कि उन्हें बेहद तनाव और गौरव के वे क्षण आज भी याद हैं.
वह कहती हैं, "हम जानते थे कि यह हमारा गृह नगर है, जहां हम पैदा हुए हैं. हमारे अपने दर्शक हैं. और इस बार हमें सीधा हमला करना होगा क्योंकि या तो हम डूबेंगे या तर जाएंगे. क्योंकि यह शायद हमारा आख़िरी मैच होगा."

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और ऐसा ही हुआ भी. वह मैच शाज़िया का आखिरी मैच साबित हुआ. एक जुझारू और शानदार करियर का अंत.
शाज़िया का क्रिकेट जीवन इंग्लैंड में पढ़ते हुए शुरू हुआ. 1993 में उन्होंने और उनकी बहन शामीन ने लॉर्ड्स के मैदान पर इंग्लैंड को महिला विश्वकप क्रिकेट जीतते हुए देखा था.
दोनों बहनें क्रिकेट क्लब के लिए खेलती थीं और उनमें अंतर्राष्ट्रीय क्रिकेट खेलने की क्षमता थी.
शाज़िया कहती हैं, "हम इस खेल को इतना चाहते थे कि हम यूं ही गायब नहीं हो जाना चाहते थे. हम जानते थे कि हममें इतनी प्रतिभा है कि किसी भी देश के लिए खेल सकते हैं."
"लेकिन हमें एक मंच की, मौके की ज़रूरत थी. और जब हमने विश्वकप देखा तो उसने हमारे ज्ञानचक्षु खोल दिए. हम समझ गए कि अगर हम अंतर्राष्ट्रीय क्रिकेट खेलना चाहते हैं या पाकिस्तान का प्रतिनिधित्व करना चाहते हैं तो हमें कुछ करना ही होगा."
शाज़िया और शामीन ने तय किया कि वह अगले विश्वकप के लिए पाकिस्तान की महिला क्रिकेट टीम तैयार करेंगी.
सुरक्षाकर्मी ही दर्शक थे
वह इससे पहले की अपनी असफलता से कतई निराश नहीं थीं. पांच साल पहले उन्होंने कराची में पुरुष क्रिकेट टीम से महिला टीम का एक मैच आयोजित करने की कोशिश की थी.
शाज़िया बताती हैं, "जब इस मैच का ऐलान हुआ तो कट्टरपंथी नाराज़ हो गए. उन्हें लगा कि यह ग़ैर-इस्लामिक है और इससे पाकिस्तान की संस्कृति बदल जाएगी. हमारा तर्क था कि जब बेनज़ीर भुट्टो देश की प्रधानमंत्री के रूप में किसी टेबल पर दस पुरुषों के बात कर सकती हैं तो हम पुरुष टीम के ख़िलाफ़ खेल क्यों नहीं सकते?"

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लेकिन फिर उन्हें धमकियां मिलने लगीं.. सारे अख़बारों में छप रहा था कि कट्टरपंथी शाज़िया-शामीन के घर पर हमला कर सकते हैं. इस पर उनके पिता ने इस मैच को रद्द करने और दो महिला टीमों के बीच मैच करवाने की सलाह दी.
अंततः ऐसा ही हुआ. और इससे इतना प्रचार मिला जितनी कि उन्हें उम्मीद भी नहीं थी.
ख़ास बात यह है कि इस पहले महिला क्रिकेट मैच को देखने के लिए कोई दर्शक मौजूद नहीं था. सुरक्षा के लिए जो 8,000 पुलिसकर्मी लगाए गए थे वही दर्शक भी थे.
मैच से एक दिन पहले उनके घर पर भी पुलिस ने सुरक्षा प्रदान कर दी थी और वही उन्हें स्टेडियम तक भी लेकर आई. मैच के बाद दोनों बहनें सीधे लंदन रवाना हो गईं और उनके पिता ने कहा कि 'जब यह देश तुम्हारे लिए तैयार हो जाएगा तब तुम आना.'
हार में जीत
साल 1996 में उन्हें लगा कि शायद अब पाकिस्तान महिला क्रिकेट के लिए तैयार हो गया है, इसलिए वह लौट आईं. लेकिन पाकिस्तान के अधिकारी उनकी कोई मदद करने को तैयार नहीं थे.
इस पर उन्होंने अपने पिता से कहा कि वह अपने पैसे से उनकी मदद करें. शाज़िय़ा-शामीन पिता का एक कामयाब कॉफ़ी का कारखाना था. उन्होंने टीम बनाने के लिए सारा ख़र्च किया.
उनके कारखाने में ही क्रिकेट का मैदान था, बसें थीं और कोच-अंपायर को पैसा भी वही देते थे.

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इसके बाद उन्होंने ऑस्ट्रेलिया और न्यूज़ीलैंड के दौरे पर जाने के लिए, जो विश्व कप में शामिल होने की एक शर्त थी, महिला क्रिकेटरों को टीम में शामिल होने के लिए एक अख़बारों में एक विज्ञापन दिया.
जिन खिलाड़ियों ने इसके लिए आवेदन दिया था उनमें 18 वर्षीय किरण बलोच भी थीं. तीन महीने बाद वह दुनिया के दूसरे छोर पर अपने देश का प्रतिनिधित्व कर रही थीं.
वह कहती हैं, "जब हमने पाकिस्तान का - ब्लेज़र पहना तो ऐसा लगा कि मेरा बचपन का सपना पूरा हो गया है. पाकिस्तान की ड्रेस पहनना, बैटिंग करने जाना, स्कोर बोर्ड पर पाकिस्तान के खाने में अपना नाम देखना- यह अद्भुत अनुभूति थी."
किरण ने उस दिन अपनी टीम की ओर से सबसे ज़्यादा, 19 रन, बनाए. पाकिस्तान बुरी तरह हार गया. दरअसल वह उस दौरे के सभी मैच हार गए थे.
लेकिन इसके बावजूद उन्हें वह हासिल हो गया जो वह चाहते थे. आधिकारिक रूप से तीन अंतरराष्ट्रीय मैच खेलने के बाद वह विश्व कप में खेलने के अधिकारी हो गए थे.
शाज़िया बताती हैं, "स्वागत समारोह में यह ऐलान किया गया कि यहां पहुंचकर ही पाकिस्तानी टीम ने जीत हासिल कर ली है. बाकियों को प्रतियोगिता में भाग लेना है."
पाकिस्तानी टीम विश्वकप के भी सारे मैच हार गई. लेकिन विश्व की सबसे अच्छी टीमों से खेलकर उसे सीखने को काफ़ी मिला.
विश्व रिकॉर्ड
उधर पाकिस्तानी महिला क्रिकेट देश में सत्ता संघर्ष में उलझ गया था कि टीम पर किसका अधिकार हो, पाकिस्तान क्रिकेट बोर्ड का या प्रतिद्वंदी महिला क्रिकेट एसोसिएशन का?

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यह खींचतान सालों जारी रही और 2004 तक इस राजनीतिकरण से खिलाड़ियों का मोहभंग होने लगा था.
तभी वेस्टइंडीज़ की टीम पाकिस्तान दौरे पर चार दिन का टेस्ट मैच खेलने आई तो किरण बलोच को यकीन था कि वह उनका और शाइज़ा का आखिरी मैच होगा.
"हम लोग पूरी तरह तैयार और ऊर्जा से भरे हुए थे. क्योंकि यह हमारा गृहनगर और घरेलू मैदान तो था ही हमें लोगों की इस तरह की टिप्पणियों का कि, 'क्या लड़कियां चार दिन तक खेल सकती हैं? ' भी जवाब देना था."
पाकिस्तान ने मैच में पहले बैटिंग की. किरण मैच की ओपनिंग कर रही थीं और शाइज़ा ने उन्हें सीधे शब्दों में एक ही बात कही, "तुम्हें बैटिंग करना पसंद है तो तुम जाकर बैटिंग करो. तुम्हें चार दिन तक बैटिंग करनी है. बस खेलती जाओ, मैं पारी की घोषणा नहीं करूंगी."
तो वह बैटिंग करने लगीं, आखिरी मैच समेत तमाम दबावों के बावजूद वह जमकर खेलीं और दिन का खेल ख़त्म होने तक किरण ने 138 रन बना लिए थे.
किरण बताती हैं, "जब मैं वापस लौटी तो उन्होंने मुझे कहा कि ऐसे ही खेलती रहो तुम विश्व रिकॉर्ड तोड़ सकती हो. अगले दिन भी मैंने बैटिंग की. शाइज़ा पिच पर मेरे साथ मौजूद थीं. जब मैंने 200 रन बनाए तो उन्होंने सचमुच मुझे संभाले रखा और प्रोत्साहन दिया कि मैं अगले 15 रन बनाकर विश्व रिकॉर्ड तोड़ूं."
उन्हें आज भी यकीन नहीं होता कि उन्होंने यह कर दिखाया. किरण ने उस दिन 242 रन बनाए और उनका रिकॉर्ड आज भी तोड़ा नहीं जा सका है.
अब रिकॉर्ड बनाने की शाइज़ा की बारी थी. उन्होंने वेस्टइंडीज़ के सात विकेट लिए, जिसमें एक हैट्रिक भी शामिल थी. वह टेस्ट मैच में ऐसा करने वाली दूसरी खिलाड़ी बन गई थीं.

अगली पारी में उन्होंने 6 और विकेट लिए और एक मैच में 13 विकेट लेने का रिकॉर्ड बनाया.
वह कहती हैं, "मैंने एक दिन में 55 ओवर किए और विश्व रिकॉर्ड बनाया. मेरी उंगलियों से खून टपकने लगा था लेकिन मुझे बॉलिंग करनी ही थी क्योंकि मेरी दूसरी बॉलर थक गई थीं और उतनी फ़िट भी नहीं थीं. मैं जानती थी कि बतौर कप्तान मुझे ही ज़िम्मेदारी उठानी होगी."
गौरवान्वित
किरण और शाइज़ा के शानदार खेल के बावजूद वह मैच ड्रॉ हो गया. हालांकि फिर भी वह एक यादगार और दोनों के करियर का आखिरी मैच था.
अब जब शाइज़ा मुड़कर देखती हैं तो वह पिच पर और उसके बाहर अपने प्रदर्शन पर बेहद गौरवान्वित महसूस करती हैं.
वह कहती हैं, "मैं पाकिस्तान के लिए टेस्ट मैच जीतना चाहती थी और ऐसा करने वाली पहली कप्तान बनना चाहती थी. लेकिन समय के साथ विश्व रिकॉर्ड सारी भावनाओं से बड़े हो गए. अब किसी को भी वह टेस्ट मैच याद नहीं है, सबको हमारे विश्व रिकॉर्ड याद हैं."

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किरण कहती हैं, "हमने 10 साल खेला. इस दौरान बस क्रिकेट था, हमारी प्रतिभा थी और मीडिया की बहुत सारी सकारात्मक कवरेज थी. मुझे पाकिस्तान महिला क्रिकेट की पाएनियर होने पर बहुत गर्व है."
शाइज़ा कहती हैं, "मेरे पास बहुत से अद्भुत अनुभव हैं, न सिर्फ़ पहली कप्तान होने, विश्व कप खेलने, पहला टेस्ट खेलने के बल्कि वह व्यक्ति होने का जिसने पाकिस्तान में महिला क्रिकेट को शुरू किया- यह मुझे बेहद गौरव की अनुभूति करवाता है. जब सड़क किनारे कोई लड़की खेल रही होती है तो लोग कहते हैं कि यह आपकी वजह से है."
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