'लड़की फ़ुटबॉल फ़ैन क्यों नहीं हो सकती?'

- Author, अनुभा रोहतगी
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
दुनियाभर के फ़ुटबॉल फ़ैंस विश्व कप फ़ाइनल के इंतज़ार में हैं. भारत में बहुत सी महिलाएं इस खेल को उतने ही जुनून और दीवानगी से देखती हैं जितने पुरुष फ़ैन. मगर इनकी शिक़ायत है कि उनकी समझ पर अक्सर सवालिया निशान लगते हैं.
कोलकाता की प्रोमा सान्याल भारतीय फ़ुटबॉल क्लब ईस्ट बंगाल की फ़ैन हैं.
प्रोमा बताती हैं, “मैं जब छोटी थी तो अपने बड़े भाई के साथ फ़ुटबॉल के मैच देखती थी. ईस्ट बंगाल, विश्व कप, कोपा अमरीका, सब कुछ देखती थी उनके साथ. वहीं से खेल में दिलचस्पी शुरू हुई. फिर मैंने इसके नियम समझने और सीखने शुरू किए. अब मैं पूरी जानकारी के साथ फ़ुटबॉल को फॉलो करती हूं.”
कोलकाता की ही नयनतारा दासगुप्ता, तृप्ति दास और बंगलौर की अमरीन भुजवाला भी फ़ुटबॉल को दीवानगी की हद तक पसंद करती हैं. सबकी अपनी पंसदीदा टीमें हैं और खिलाड़ी.
शिकायत

मगर इनकी शिकायत है कि भारत में किसी लड़की या महिला का फ़ुटबॉल फ़ैन होना पुरुषों को हजम नहीं होता.
कोलकाता में पोस्टग्रेजुएशन कर रहीं इंग्लिश क्लब मैनचेस्टर यूनाइटेड की फ़ैन तृप्ति दास ने कहा, “बहुत से लड़के इसे हजम नहीं कर पाते कि मैं उनकी तरह या फिर उनसे ज़्यादा खेल के बारे में जानती हूं.”
एक खेल वेबसाइट में स्पोर्ट एडिटर रहीं 24 साल की अमरीन भुजवाला कई साल से फुटबॉल के बारे में ब्लॉग कर रही हैं और कई विदेशी वेबसाइटों के लिए उन्होंने लिखा है.
अमरीन बताती हैं, “मेरे परिवार को शुरू में मेरे फ़ुटबॉल पसंद करने पर आपत्ति थी क्योंकि मैं लड़की हूं. जब उन्होंने देखा कि मैं इस पर लिखती भी हूं, तो उन्होंने धीरे-धीरे मेरा समर्थन करना शुरू कर दिया.”
समझ पर सवाल
अक्सर महिला फ़ैंस को ऐसी बातें सुनने को मिलती हैं कि “तुम तो लड़की हो, तुम फ़ुटबॉल के बारे में क्या जानती हो” या फिर “अगर फ़ैन हो तो चलो ऑफ़साइड रूल के बारे में बताओ” या “तुम तो क्रिस्टियानो रोनाल्डो की वजह से फ़ुटबॉल देखती हो.”
इंग्लिश क्लब आर्सेनल की फ़ैन अमरीन कहती हैं, “एक बार मैं अपने दोस्तों के साथ टीवी पर फ़ुटबॉल मैच देख रही थी. एक लड़के ने कोई नियम ग़लत बताया. जब मैंने उसे ठीक किया, तो वह इतना नाराज़ हुआ कि आज तक मुझसे बात नहीं करता.”
कोलकाता में एक कॉलेज में पढ़ रहीं नयनतारा दासगुप्ता को यह रवैया खलता है.

वे कहती हैं, “कहीं ऐसा लिखा तो नहीं है कि यह सिर्फ़ लड़कों के लिए ही है.”
सोशल मीडिया
मगर सोशल मीडिया पर भी महिला फ़ैंस पर छींटाकशी होती है.
प्रोमा सान्याल बताती हैं, “मैं पहले फ़ेसबुक पर ईस्ट बंगाल के फ़ुटबॉल फ़ैंस के ग्रुप में थी. लेकिन हमारी पोस्ट पर बहुत बुरे-बुरे कमेंट आते थे. इसलिए मैंने और बाकी महिला फ़ैंस ने फ़ैसला किया कि हम अपना अलग ग्रुप बनाएंगे. इसका नाम है लेडीज़ फ़ोरम ईस्ट बंगाल फ़ुटबॉल क्लब.”
छींटाकशी हो, कमेंटबाज़ी हो या फिर भेदभाव, फ़ैंस को सिर्फ़ खेल से मतलब है. प्रोमा, तृप्ति, नयनतारा, अमरीन और इनकी तरह कई महिला फ़ैंस देर रात तक जगकर सभी मैच देख रहीं हैं.
यहां तक कि अमरीन भुजवाला तो फिलहाल नई नौकरी भी नहीं ढूंढ रहीं.
अमरीन के मुताबिक़, “मैंने अपनी नौकरी विश्व कप शुरू होने के दो-तीन दिन बाद ही छोड़ी थी और मैंने फ़ैसला किया कि टूर्नामेंट ख़त्म होने तक मैं नई नौकरी नहीं ढूंढूगी क्योंकि नई नौकरी में समय देना पड़ेगा और मैं फ़ुटबॉल से कॉम्प्रोमाइज़ नहीं करना चाहती थी.”
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