एक शहर जो फ़ुटबॉल के लिए मचलता है...

- Author, ज़ुबैर अहमद
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, कोलकाता से
कोलकाता में क्रिकेट और फ़ुटबॉल के लिए मशहूर एक क्लब के मैदान पर नौजवान फ़ुटबॉल खिलाड़ी का मैच खेल रहे हैं.
मैच का नज़ारा देख रहे दर्शक राजीनीतिक मामलों पर बहस भी कर रहे हैं और साथ ही गोल होने पर तालियाँ भी बजा रहे हैं. इन दर्शकों में औरत और मर्द दोनों ही शामिल हैं.
कोलकाता में सियासत और फ़ुटबॉल पर एक ही सांस में बातें करना कोई अजीब बात नहीं.
असाधारण बात ये होगी कि अगर यहाँ के नागरिक शहर के दो बड़े फ़ुटबॉल क्लब यानी मोहन बगान और ईस्ट बंगाल के समर्थक न हों.
जमशेद नसीरी
मैदान पर मौजूद नौजवान खिलाड़ियों के बीच एक उम्रदराज हो चुका खिलाड़ी जमशेद नसीरी भी मौजूद है. उनकी उम्र तकरीबन 56 वर्ष के करीब होगी.
वे कोशिश कर रहे हैं कि लड़कों को छका कर बॉल गोल में दे मारे लेकिन लड़के हर बार उन पर हावी हो जाते हैं.

एक वक्त था कि जब जमशेद खेल के मैदान में फ़ुटबॉल के माहिर खिलाड़ी माने जाते थे.
पुराने दिनों में फ़ुटबॉल प्रेमियों के वे चेहते खिला़ड़ी हुआ करते थे. वे आज भी फ़ुटबॉल के दीवानों के बीच हीरो का दर्जा रखते हैं.
ईरान के नागरिक जमशेद 1970 के दशक में फ़ुटबॉल खेलने कोलकाता आये थे और यहीं के होकर रह गये.
वह कहते हैं, "कोलकाता ही अब मेरा घर है. मैंने यहीं शादी की और अब ईरान की अधिक याद भी नहीं आती."
जमशेद के यहीं बस जाने की बड़ी वजह थी "बंगाल के लोगों का फ़ुटबॉल से लगाव."
चीमा ओकरी
कोलकाता के फ़ुटबॉल का इतिहास 150 साल पुराना है और यहाँ के फ़ुटबॉल के जादू ने कई विदेशी खिलाड़ियों को अपना लिया है.
नाईजीरिया के चीमा ओकरी भी जमशेद नसीरी से दस साल बाद यहाँ फ़ुटबॉल खेलने आये थे और अब "कोलकाता उनका दूसरा घर है."
अपना किस्सा सुनाते हुए उन्होंने बताया, "मैं जब यहाँ आया केवल 15 वर्ष का था. इस शहर ने मुझे मेरी पढने का मौका दिया. मुझे पत्नी दी और मुझे एक लीजेंड का दर्जा दिया."

कोलकाता के फ़ुटबॉल ने विदेशी खिलाडियों को हमेशा लुभाया है.
होज़े रामिरेज़ बरेतो
इस सिलसिले में चीमा के बाद आये ब्राज़ील के होज़े रामिरेज़ बरेतो का उदाहरण लिया जा सकता है.
वो कहते हैं, "मैंने 1999 में मोहन बगान के लिए खेलना शुरू किया तब मैं बहुत कम उम्र का था. अब मैं 36 साल का हूँ. यहाँ मुझे बहुत प्यार मिला है. मुझे नहीं मालूम कि मैं कोलकाता छोड़ सकूंगा या नहीं. लेकिन कम से कम कुछ सालों तक तो यहाँ जरूर हूँ."
कभी अगर आप को फ़ुटबॉल में नाम और पैसा कमाना होता था तो आपको कोलकाता में अपना जलवा दिखाना ज़रूरी होता था.
लेकिन अब हालात बदल चुके हैं. अब फ़ुटबॉल में पहले से अधिक पैसा है और कोलकाता से बाहर पुणे, मुंबई और गोवा के क्लबों ने भी विदेशी खिलाडियों को लुभाना शुरू कर दिया है.
बरेतो कहते हैं, "कोलकाता क्लब के पास पहले स्पॉन्सर्स थे. पैसे थे और फैन बेस भी. साथ ही एक सक्रिय मीडिया भी. अब गोवा और मुंबई के क्लब भी देश के बेहतरीन टैलेंट और विदेशी खिलाडियों को खरीद रहे हैं."
'आई लीग' की शुरुआत

आज कोलकाता के बाहर की टीमों के लिए विदेशी खिलाड़ी जापान, ब्राज़ील, लेबनान, सूडान, नाईजीरिया और पुर्तगाल जैसे मुल्कों से आकर खेल रहे हैं.
ये विदेशी खिलाड़ी अपनी टीमों को भारी सफलता भी दिला रहे हैं. भारतीय क्लबों की प्रतियोगिता 'आई लीग' की शुरुआत 2007 में हुई.
अब तक कोलकाता के किसी क्लब ने ये प्रतियोगिता नहीं जीती है. हर साल जीतने वाली टीम गोवा से है.
वरिष्ठ फ़ुटबॉल लेखक धीमन सरकार कहते हैं, "कोलकाता के क्लबों की मिसाल पुराने अख़बारों के पाठकों की तरह है."
उनके विचार में कोलकाता फ़ुटबॉल के गिरते स्तर के लिए ज़िम्मेदार क्लबों के प्रशासक हैं.
उन्होंने कहा, "कोलकाता के जिन तीन सब से बड़े क्लबों ने यहाँ के फ़ुटबॉल को नुकसान पहुँचाया है उनके पास ऐतिहासिक रूप से बड़े फैन बेस थे और पैसा भी. उन्होंने अपने फ़ैन बेस से जुड़ने की कभी कोशिश ही नहीं की."
ट्रेवर मॉर्गन
चीमा ओकरी भारतीय क्रिकेट की प्रशंसा करते हुए कहते हैं, "फ़ुटबॉल ने खुद की मार्केटिंग की ही नहीं जिस तरह से क्रिकेट ने की."
ट्रेवर मॉर्गन तीन साल तक ईस्ट बंगाल के हेड कोच रहने के बाद पिछले हफ्ते अपने देश इंग्लैंड वापस लौट गये.
अपने क्लब में सुविधाओं की कमी से परेशान रहे ट्रेवर मॉर्गन ने जाने से पहले बीबीसी से एक मुलाक़ात में कहा, "तीन साल पहले यहाँ कुछ भी नहीं था. हमारा ट्रेनिंग मैदान भी अपना नहीं था. जिम नहीं था. चेंजिंग रूम अच्छा नहीं था. अब कुछ सुविधाएँ हैं क्यूंकि हम ने इस की हमेशा मांग की."

ऑस्ट्रेलिया के एंड्रू बरिसिक कहते हैं कि पश्चिमी देशों में फ़ुटबॉल एक आउटिंग है.
उन्होंने कहा, "यहाँ साल्ट लेक स्टेडियम में आप अपने परिवार के साथ मैच देखने नहीं जा सकते. फ़ुटबॉल को आकर्षित बनाने के लिए कोलकाता के क्लब को सुविधाएँ बढाने के लिए काफी काम करना होगा."
फ़ुटबॉल से प्यार
कोलकाता को इन सब कमियों के बावजूद फ़ुटबॉल से अब भी उतना ही प्यार है जितना डेढ़ सौ साल पहले था.
और कोलकाता वासियों का विदेशी खिलाडियों से प्यार अब भी कम नहीं हुआ है.
सचिन तेंदुलकर के मुंबई में फ़ुटबॉल का कोई नामी गिरामी खिलाड़ी नहीं.
लेकिन सौरव गांगुली के कोलकाता में एक से बढ़ कर एक फ़ुटबॉल खिलाडी हैं जिन्हें घर घर में जाना और पहचाना जाता है.
इसके इलावा दो साल पहले जब बार्सिलोना के लायनल मेसी कोलकाता आये थे तो उन्हें देखने जितनी बड़ी भीड़ जमा हुई थी उतनी बड़ी भीड़ कभी सौरव गांगुली को देखने नहीं आई.
ऐसा लगता है इस क्रिकेट प्रेमी देश में अगर फ़ुटबॉल के लिए अब भी कोई मचलता है तो वो हैं कोलकाता शहर के लोग.
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