बीसीसीआई: न क्रिकेट की परवाह न फ़ैन्स की

- Author, नॉरिस प्रीतम
- पदनाम, खेल पत्रकार
आईपीएल में सट्टेबाज़ी और स्पॉट <link type="page"><caption> फ़िक्सिंग</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/sport/2013/05/130520_matchfixing_spotfixing_cricket_ipl_ns.shtml" platform="highweb"/></link> के नए मामले ने <link type="page"><caption> बीसीसीआई</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/sport/2013/05/130521_ipl_cricket_sc_ban_vr.shtml" platform="highweb"/></link> यानी कि भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड को एक बार फिर कठघरे में खड़ा कर दिया है.
टीम में खिलाड़ियों के चयन को लेकर तो बोर्ड हमेशा <link type="page"><caption> विवादों</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/sport/2013/05/130520_bcci_ipl_spotfixing_ns.shtml" platform="highweb"/></link> में रहा लेकिन एक दिवसीय से 20-20 और फिर <link type="page"><caption> आईपीएल</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/india/2013/05/130517_ipl_vk.shtml" platform="highweb"/></link> के सफ़र तक न जाने क्या से क्या हो गया.
कभी भद्रजनों का खेल कहा जाने वाला यह खेल कम से कम भारत में तो किसी सर्कस से कम नहीं रह गया है.
एक ऐसा सर्कस जिसमें कागज़ी शेर, खिलाड़ी, कोच सभी बोर्ड के हंटर के लिए तैयार हैं- शर्त सिर्फ़ इतनी सी है कि उन्हें उसकी पूरी कीमत मिले.
ख़राब हालात
खिलाड़ियों को पैसे का प्रलोभन देकर खेल को इतना नीचे गिराने में सबसे बड़ा हाथ बोर्ड का ही है.
ऐसे-ऐसे साधारण खिलाड़ी जो 1,000 या 2,000 रुपये के लिए टेनिस बॉल से दिन में दो या तीन मैच खेलते थे, उन्हें आईपीएल ने सचिन तेंदुलकर, द्रविड़ और धोनी के साथ ला खड़ा किया.
यह वह खिलाड़ी हैं जो मुश्किल से रणजी ट्रॉफ़ी खेल पाते हैं और दिल्ली के पहाड़गंज या करोलबाग के किसी छोटे से होटल से आगे नहीं बढ़ते थे.
लेकिन आईपीएल में खेलने के बाद रात को भी गॉगल्स लगाकर पांच सितारा होटल से तेंदुलकर जैसे खिलाड़ी के साथ मीडिया से रूबरू हो कर बस में बैठकर जाते हैं.
ऐसे में उनका दिमाग ख़राब होना लाज़मी है और इसका ज़िम्मेदार कौन है? सिर्फ़ बोर्ड.

आईपीएल खेलने के लिए किसी भी खिलाड़ी के लिए नेशनल प्लेयर होना ज़रूरी है.
लेकिन किसी 41 साल के खिलाड़ी को एक बार टीम में रख कर आईपीएल के लिए क्लालिफ़ाई करवाना कहां तक उचित है.
जैसे प्रवीण तांबे, जो इस साल राजस्थान रॉयल्स के लिए खेले.
क्या यही है बोर्ड की क्रिकेट के विकास की नीति?
अगले साल से घरेलू खिलाड़ियों को आईपीएल में खिलाना शुरू हो गया तो हालात और भी ख़राब हो जाएंगे.
ताज़ा घटनाओं के बाद बोर्ड के अधिकारी कहते फिर रहे हैं कि बोर्ड स्पॉट और मैच फिक्सिंग को नहीं रोक सकता.
यह बात किसी हद तक ठीक ही है. पुलिस भी चोरी, मर्डर या रेप नहीं रोक सकती हैं लेकिन क्या इसलिए पुलिस को हटा देना चाहिए.
खानापूर्ति
बार-बार क्रिकेट बोर्ड को आरटीआई के दायरे में लाने की बात हो रही है जिसे बोर्ड मानने को तैयार नहीं है.
लेकिन बोर्ड आरटीआई में आने के लिए इसलिए नहीं मना कर रहा कि मैच फ़िक्सिंग या सट्टेबाज़ी पर फ़र्क पड़ेगा.
बोर्ड आरटीआई में आकर अपनी काली और सफ़ेद आमदनी का हिसाब नहीं देना चाहता.

जहां तक सट्टेबाज़ी और मैच फ़िक्सिंग को कानून के दायरे में लेने की बात है तो कानून मंत्री कपिल सिब्बत ने यह बात उठाई है.
लेकिन यह सब खानापूर्ति है.
अव्वल तो कानून बनने में ही कई साल लग जाएंगे क्योंकि संसद से ऐसा कानून पास करवाने में पापड़ बेलने पड़ेंगे.
दूसरा अगर खिलाड़ी यह ठान ले कि उसे स्पॉट फ़िक्सिंग करनी ही है तो दुनिया का कोई कानून उसे रोक नहीं सकता.
हां बोर्ड खिलाड़ियों का ठीक चयन करके उसे कम ज़रूर कर सकता है. जो वह करना नहीं चाहता.
मीडिया से दूरी
बोर्ड ने इस पूरे मामले पर बड़ी उदासीनता दिखाई है. जानकारों का कहना है कि बोर्ड के प्रमुख एन श्रीनिवासन ने किसी को भी इस मामले पर बोलने से मना कर दिया है.
वरना क्या कारण है कि भारतीय क्रिकेट में इतनी उथल-पुथल हो और कप्तान एमएस धोनी मीडिया से कतरा रहे हैं.
यहां तक कि भारतीय टीम से बाहर राहुल द्रविड़ भी, जो एक ईमानदार खिलाड़ी माने जाते हैं, चुप हैं.
आईपीएल कमिश्नर राजीव शुक्ला मीडिया को उखड़े-उखड़े जवाब देते हैं. वह एक राजनेता हैं और जो चाहे कर सकते हैं.

लेकिन चयनकर्ता रहे कृष्णामचारी श्रीकांत ने आईपीएल के एक मैच के बाद मीडिया से इस विषय पर बात करने से मना कर दिया.
जब एक रिपोर्टर ने सवाल कर ही दिया तो वह भड़क उठे और प्रेस कॉंफ्रेंस छोड़ कर चले गए.
बोर्ड का इतना हौवा है कि कभी धुरंधर बल्लेबाज़ रहे श्रीकांत मीडिया का सामना नहीं कर पाए.
यह पहला मौका नहीं है जब बोर्ड के ऊपर उंगली उठी है.
बस पैसे की चिंता
खुद बोर्ड के पूर्व अध्यक्ष एसी मुथैया ने पहले भी कहा था कि ऐसे लोग जिनका संबंध आईपीएल कि किसी टीम से हो उन्हें बोर्ड में नहीं होना चाहिए.
लेकिन अगर बोर्ड के अध्यक्ष श्रीनिवासन ही चेन्नई सुपर किंग्स टीम के मालिक हों तो बोर्ड कैसे निष्पक्ष फ़ैसले ले सकता है?
बोर्ड के लिए खिलाड़ी, कोच, मीडिया और फ़ैन्स इन सबसे ऊपर पैसा है.
और अब <link type="page"><caption> सहारा ग्रुप</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/sport/2013/05/130521_sahara_pullout_ipl_rd.shtml" platform="highweb"/></link> के हट जाने और पुणे वारियर्स टीम के आईपीएल से बाहर हो जाने से 170 करोड़ की चोट लगी है.
अगर आईपीएल बंद होने की बात हो तो बाकी टीमों से मिलने वाले पैसे से बोर्ड को कम से कम 1,000 करोड़ की चपत लग सकती है.
ऐसे में बोर्ड भरसक प्रयत्न करेगा कि मौजूदा मुसीबत किसी तरह टल जाए.
उसके बाद एक बार फिर वही गोरख धंधा शुरू हो जाएगा. खिलाड़ी और फ़ैन्स की बोर्ड को कोई चिंता नहीं है.
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