सचिन तेंदुलकर क्या इस दौर में भी इतने ही कामयाब होते?

    • Author, शारदा उगरा
    • पदनाम, वरिष्ठ खेल पत्रकार

आज जब सचिन तेंदुलकर के पचासवें जन्मदिन पर सोशल मीडिया जश्न में डूबा हुआ है, तो मुझे सचिन से जुड़ा एक दशक से भी ज़्यादा पुराना क़िस्सा याद आ रहा है.

ये बात, उस वक़्त की है, जब भारत ने 2011 का वनडे वर्ल्ड कप जीत लिया था. उस वक़्त तेंदुलकर, अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में शतकों का शतक पूरा करने की कोशिश कर रहे थे.

एक दिन मेरे दोस्त के सात साल के बेटे ने पूछा कि, 'सचिन ने आईपीएल में कितने शतक लगाए हैं?'

ये बड़ा मासूम सा सवाल था, जिस पर न इतिहास का साया था, न विरासत का बोझ. मैंने थोड़ा सकुचाते हुए कहा... 'हम्म...एक'. बच्चे ने हैरानी से कहा, 'सिर्फ़ एक?'

मैं उसके मासूम सवाल पर चौंक ज़रूर गई थी, मगर मुझे ख़ुशी भी हुई थी.

उस स्कूली बच्चे ने 2011 के विश्व कप में सचिन की धुआंधार पारियों को देखा था. फिर भी उसकी नज़र में सचिन तेंदुलकर की यही छवि थी जबकि उस वक़्त सचिन तेंदुलकर, क्रिकेट के इतिहास में भारत के सबसे बड़े स्टार थे.

क्रिकेट के 'भगवान'

वो सोशल मीडिया और ख़ुद के प्रचार से पहले का दौर था. आज जब सचिन तेंदुलकर, मुंबई इंडियंस की टीम के डग आउट में पहुंचते हैं, या फिर विज्ञापनों में और इंस्टाग्राम पर दिखते हैं, तो मेरे ज़हन में सवाल उठता है कि अब सात साल के बच्चे सचिन तेंदुलकर को किस नज़र देखते होंगे?

इस साल नवंबर में सचिन तेंदुलकर को सक्रिय क्रिकेट से संन्यास लिए हुए दस साल पूरे हो जाएंगे.

टीनएजर्स के लिए वो महज़ एक ऐसे पूर्व खिलाड़ी हैं, जिनके बारे में सयाने लोग कहते हैं कि वो बहुत शानदार खिलाड़ी थे.

उनके लिए सचिन तेंदुलकर, 1989 से 2013 के दौर वाले क्रिकेट के भगवान नहीं, जैसा उन्हें करोड़ों क्रिकेट फ़ैन याद करते हैं. आज के नौजवानों के लिए वो 2023 वाले पूर्व क्रिकेटर हैं.

आज के युवा धोनी, कोहली और रोहित शर्मा के दौर में बड़े हुए हैं, जो मैदान के चारों और शॉट लगाने वाली बैटिंग करते हैं.

टी-20 के दौर में इन नौजवानों ने इन खिलाड़ियों को हर गेंद पर ज़बर्दस्त शॉट लगाते देखा है, जो कई बार मैदान के उन कोनों तक पहुंच जाती है, जिसके बारे में उन्हें मालूम है कि तेंदुलकर ऐसा शॉट नहीं खेलते थे.

जादुई आंकड़े

ऐसा नहीं है कि सचिन तेंदुलकर ने टी-20 मैच नहीं खेले. वो छह सीज़न तक मुंबई इंडियंस के लिए खेले थे.

78 मैचों में सचिन ने 2334 रन बनाए थे. इनमें 13 अर्धशतक और एक सेंचुरी थी. IPL के इन 78 मैचों में सचिन तेंदुलकर का स्ट्राइक रेट 119.31 और औसत 34.83 रनों का था.

जब आईपीएल शुरू हुआ था, तो सचिन तेंदुलकर अपने इंटरनेशनल करियर के 19वें बरस में थे.

आईपीएल के पहले सीज़न के दौरान वो 35 साल के हुए थे. आईपीएल में सचिन तेंदुलकर का सबसे बढ़िया सीज़न 2010 का रहा था.

तब मुंबई इंडियंस की टीम पहली बार फ़ाइनल में पहुंची थी. हालांकि, वो फ़ाइनल में चेन्नई सुपर किंग्स से हार गई थी.

उस वक़्त 37 साल के तेंदुलकर ने टी20 मैचों में 180 के जादुई आंकड़े को पार कर लिया था.

ये टी-20 में किसी बल्लेबाज़ के औसत और उसके स्ट्राइक रेट का जोड़ होता है, जिसे टी20 मैचों में एक बड़ी उपलब्धि माना जाता है.

2010 में सचिन तेंदुलकर आईपीएल के प्लेयर ऑफ़ द टूर्नामेंट बने थे. उन्होंने उस सीज़न में 47.53 के औसत और 132.61 के स्ट्राइक रेट से 618 रन स्कोर किए थे. ये आईपीएल में उनका सबसे अच्छा प्रदर्शन रहा था.

आज कैसे बल्लेबाज होते?

सचिन तेंदुलकर क्रिकेट खिलाड़ियों की उस पीढ़ी से ताल्लुक़ रखते हैं, जब कमाई और शोहरत के मामले में सफ़ेद गेंदों वाले टी-20 मैच, लाल गेंद से खेले जाने वाले वनडे और टेस्ट मैच पर हावी होने लगे थे.

कुछ साल पहले, सचिन तेंदुलकर के 47वें जन्मदिन के आस-पास ईएसपीएन क्रिक इन्फो के लिए एक इंटरव्यू के दौरान मैंने उनसे पूछा था कि अगर उनकी उम्र आज 25 साल कम होती, तो वो किस तरह के बल्लेबाज़ बनते?

सचिन तेंदुलकर ने कहा कि वो अपनी बल्लेबाज़ी में कोई बदलाव नहीं करते. कोई रैंपशॉट नहीं लगाते. कोई स्विचहिट नहीं करते.

सचिन ने बताया कि उन्होंने अपनी शुरुआती पारियों के वीडियो यू-ट्यूब पर देखे हैं और ये मानते हैं कि उन्हें बल्लेबाज़ी के इन नए तौर-तरीक़ों की कोई ज़रूरत नहीं होती.

उन्होंने बताया कि एक नौजवान खिलाड़ी के तौर पर भी उनके पास वो ज़हनियत और वो शॉट थे, जो उन्हें टी-20 क्रिकेट का कामयाब खिलाड़ी बनाते.

मेरे सवाल के जवाब में सचिन तेंदुलकर ने कहा था कि, "अगर मैं उसी तरह खेलता रहता (जैसे वो खेलते थे), तो पिच से बाउंड्री लाइन केवल 70 गज की दूरी पर है."

करिश्माई बल्लेबाज़

उन्होंने कहा कि गेंद को बार-बार बाउंड्री लाइन के बाहर भेजने का आत्मविश्वास हासिल करने के लिए, "आपको पिच के मिज़ाज के मुताबिक़ लगातार कोशिश करते रहना होगा. हर पिच अलग तरह की होती है. आपको ख़ुद को पिच के हिसाब से खेलने के लिए ढालना पड़ता है. मैं अपने ज़हन और खेल को पिच का मिज़ाज भांपकर बदल लेता."

मैंने सचिन तेंदुलकर के जितने भी इंटरव्यू लिए, हर बार यही अहसास हुआ कि आप ऐसे शख़्स से बात कर रहे हैं, जिसकी नस-नस में क्रिकेट समाया हुआ है.

वैसे तो अंग्रेज़ी के Nerd शब्द का हिंदी में मतलब 'पढ़ाकू' होता है. मगर, सचिन तेंदुलकर के मामले में आपको याद रखना होगा कि उनकी सारी पढ़ाई क्रिकेट के खेल और क्रिकेट के मैदान को लेकर थी.

यही वजह है कि वो कहते हैं कि वो आज के दौर की ज़रूरत के मुताबिक़, हर गेंद पर रन बनाने का कोई न कोई तरीक़ा तलाश ही लेते.

जब सचिन को वनडे मैचों में पारी की शुरुआत करने को कहा गया था, तो उन्होंने यही तो किया था.

अपने वनडे मैचों के करियर के पहले दस वर्षों में सचिन तेंदुलकर, अपने दौर के ज़्यादातर खिलाड़ियों से कहीं ज़्यादा स्ट्राइक रेट (86.78) से रन बना रहे थे. इस दौरान उन्होंने 24 शतक और 44 अर्थशतक लगाए थे.

एक दिन मुंबई के पूर्व ओपनर ज़ुबिन भरूचा और अब राजस्थान रॉयल्स टीम के हाई परफॉर्मेंस डायरेक्टर से किसी और मसले पर बात हो रही थी.

जब सचिन तेंदुलकर के एक नौजवान खिलाड़ी के तौर पर आईपीएल के फॉर्मैट में ढल जाने का सवाल उठा, तो ज़ुबिन ने ठहाका लगाया. उन्होंने कहा कि "ये तो सवाल ही बेमानी है."

भरूचा ने घंटों आईपीएल मैचों में 'बल्ले की चोट से गेंदों को उड़ते' देखा है.

वो कहते हैं कि "हां, गेंद को कोई भी मार सकता है. एबी डिविलियर्स, केविन पोलार्ड... या कोई और. ये सब बहुत बढ़िया खिलाड़ी हैं. लेकिन, सचिन तेंदुलकर की बल्लेबाज़ी की ख़ास बात यही है कि वो किसी भी दौर में होते, कामयाब बल्लेबाज़ ही होते. फिर चाहे वो अपने दौर के पहले होते, या उसके बाद."

गेंद का एक लम्हे तक इंतज़ार

ज़ुबिन भरूचा कहते हैं, "बल्ले को छूकर गेंद जिस तरह निकलती थी... उसकी जो टाइमिंग होती थी.. गेंद और बल्ले की टक्कर से जो आवाज़ निकलती थी.. मैं शब्दों में बयान नहीं कर सकता. मुझे नहीं पता कि वो क्या था. निश्चित रूप से वो ईश्वर का दिया हुआ वरदान था."

"ये ज़रूर कोई जादुई हुनर था. वो गेंद का एक लम्हे तक ज़्यादा इंतज़ार करना... ये बस उन्हीं के साथ हो सकता था. ये ऐसा करिश्मा था, जिसे आप दोहरा नहीं सकते. किसी को सिखा नहीं सकते. निश्चित रूप से ये जादू ही था, जो बहुत कम लोगों के पास होता है."

जैसा कि खिलाड़ियों के साथ होता है. एक पीढ़ी आती है, दूसरी पीढ़ी विदा लेती है. लेकिन, किसी ख़ास पीढ़ी के साथ पले-बढ़े लोग हमेशा ये दावा करते हैं कि उनके दौर के खिलाड़ी पहले के ज़माने के खिलाड़ियों से बेहतर थे.

ज़्यादा हुनरमंद, अधिक मज़बूत, तेज़ और लगातार प्रदर्शन करने वाले ऐसे खिलाड़ी, जिन्होंने वो कर दिखाया, जो भारतीय क्रिकेट के इतिहास में पहले कभी नहीं हो सका था.

यही बात हमने कई बार रवि शास्त्री को ये कहते सुनी है. यही वजह है कि विराट कोहली के फैन, वनडे क्रिकेट में उनके चार शतक और लगाने की दुआएं मांग रहे हैं, जिसके बाद वो सचिन के 49 वनडे शतकों के विश्व रिकॉर्ड को भी पीछे छोड़ देंगे.

सचिन तेंदुलकर के दौर के लोग, कोहली का सम्मान करते हैं और उनकी उपलब्धियों की तारीफ़ भी करते हैं. लेकिन, उन्हें दोनों खिलाड़ियों की तुलना करना ठीक नहीं लगता.

आशीष नेहरा ने क़रीब दस साल पहले क्रिकेट में आए उस बड़े बदलाव की तरफ़ इशारा किया था, जिससे बल्लेबाज़ों को बढ़त मिल गई.

नेहरा ने कहा था, "2012 के बाद बड़ा बदलाव ये आया है कि एक मैच में दो नई बॉल इस्तेमाल होती हैं, इससे गेंद रिवर्स स्विंग नहीं होती. इसके अलावा पावर प्ले के नियमों के तहत घेरे के बाहर केवल चार फील्डर तैनात किए जाते हैं. इसके अलावा, पहले दस ओवर्स में घेरे के बाहर केवल दो खिलाड़ी तैनात होते हैं."

50 हज़ार से ज़्यादा गेंदों का सामना

तेंदुलकर के बाद के दौर में, खेल का माहौल बल्लेबाज़ों के लिए ज़्यादा मुफ़ीद बना दिया गया है. 40 से ज़्यादा ओवर्स में गेंद के इनफील्ड को पार करने पर उसे चौका माना जाता है.

वहीं, पहले जब आप गेंद को इनफील्ड के पार भेजते थे, तो एक रन मिलते थे और आपसे स्ट्राइक भी छिन जाती थी. इस बारे में बात करते हुए तेंदुलकर ने कहा था कि, "अगर स्ट्राइक बदलती थी, तो नॉन स्ट्राइकर बल्लेबाज़ के तौर पर आप शायद एक ओवर में तीन गेंदें खेलने का मौक़ा गंवा देते थे."

उन्होंने कहा कि नए नियमों के मुताबिक़, "आपको तीन रन ज़्यादा मिलते हैं और स्ट्राइक भी आपके पास रहती है. ज़ाहिर है आपको ये पसंद आएगा."

उनकी ये राय बिल्कुल सटीक है और प्यारी भी. ये बात वो खिलाड़ी कह रहा है, जिसने अपने इंटरनेशनल करियर में 50 हज़ार से ज़्यादा गेंदों का सामना किया है.

लेकिन संन्यास लेने के बाद भी वो खिलाड़ी यही सोच रहा है कि तब कितनी बार स्ट्राइक उनके हाथ से निकल गई थी. अगर ये नए नियम उनके दौर में होते, तो वो और कितने सारे रन बना लेते.

आज सचिन तेंदुलकर पचास साल के हो रहे हैं. लेकिन, जब बात क्रिकेट की आती है, तो उनका दिल हमेशा 16 बरस के उस लड़के जैसा रहेगा, जो 15 नवंबर 1989 को कराची के नेशनल स्टेडियम में खेलने के लिए उतरा था, और भारत की ओर से खेलने के अपने इंटरनेशनल करियर का आग़ाज़ किया था.

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