सानिया मिर्ज़ा- नफ़रत को हराकर मिसाल बनाने वाली भारत की स्टार खिलाड़ी

सानिया मिर्ज़ा टेनिस रिटायरमेंट

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    • Author, ज़ोया मतीन और मेरिल सेबैस्टियन
    • पदनाम, बीबीसी न्यूज़, दिल्ली

अगर टेनिस कोर्ट पर खेल के आंकड़ों को देखें, तो सानिया मिर्ज़ा, सेरेना विलियम्स जैसी महान खिलाड़ियों से काफी नीचे पायदान पर दिखेंगी. लेकिन जब हम उनके खेल का प्रभाव, ख़ासकर भारत में महिलाओं पर देखेंगे, तो इस टेनिस स्टार की अहमियत अलग नज़र आती है.

मिसाल के लिए मंगलवार को हुआ आख़िरी मैच. इस मैच में सानिया का हर लहजा टेनिस कोर्ट पर उनकी जानी पहचानी छवि के लिहाज से था.

सिर के पीछे कस कर बांधा हुआ बालों का गुच्छा, नेट पर टिकीं गहरी निगाहें. सर्विस से पहले बॉल को मैदान पर पटकते हुए सानियां आईं, तो उनके नाक की मशहूर 'नथुनी' की चमक साफ देखी जा सकती थीं.

डब्ल्यूटीए दुबई ड्यूटी फ्री चैंपियनशिप के इस मैच में सानिया मिर्ज़ा रूस की वेरोनिका कुदेरमेटोवा और लुडमिला सैमसोनोवा के ख़िलाफ़ उतरी थीं. सानिया का ये आख़िरी मैच देखने के लिए यहां सैकड़ों दर्शकों और चाहने वालों की भारी भीड़ जमा थी.

इसमें सानिया के तमाम भारतीय प्रशंसक भी शामिल थे.

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भारतीय टेनिस में सानिया जैसा कोई नहीं

अपने अमेरिकी पार्टनर मैडिसन कीज के साथ मैदान पर उतरी सानिया मिर्ज़ा पहले राउंड का मैच सीधे सेट्स में हार गईं. इसके साथ ही उनके 20 साल के प्रोफेशनल टेनिस करियर का पटाक्षेप हो गया.

मगर अब तक सानिया टेनिस डबल्स के छः ग्रैंड स्लैम खिताब अपने नाम कर चुकी थीं. इस लिहाज से वो बेशक भारत की सबसे कामयाब टेनिस खिलाड़ी हैं.

खेल के इन दो दशकों में सानिया ने 43 टाइटल्स जीते. इस दौरान उन्होंने डब्ल्यूटीए के डबल्स रैंकिंग में नंबर वन खिलाड़ी बनने वाली पहली भारतीय होने गौरव भी हासिल किया. सानिया को नंबर वन की रैंकिंग 2015 में मिली थी.

इस दौरान सानिया मिर्ज़ा के फैन्स उनके साथ लगातार डटे रहे. वो चाहे कड़े मुकाबलों में हार हो, या जीत के लिए संघर्ष, या फिर खेल के दौरान लगे चोटों का सिलसिला, सानिया पर चाहने वालों का प्यार हर मुकाम पर उमड़ता रहा.

सानिया के लिए सबसे यादगार दौर 2015 का रहा, जब उन्होंने मार्टिना हिंगिस के साथ मिलकर टेनिस के 16 टाइटल्स जीते. इसमें तीन ग्रैंड स्लैम भी शामिल थे. इसकी वजह से दोनों को वूमन डबल्स की महानतम जोड़ी की रैंकिंग मिली.

सानिया मिर्ज़ा टेनिस रिटायरमेंट

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इमेज कैप्शन, आख़िरी मैच के बाद अपने बेटे को गोद में उठाया.

टेनिस के साथ सिखाया रूढ़ियों से लड़ना

लेकिन इन रैकिंग्स से अलग सानिया मिर्ज़ा का टेनिस के साथ सफ़र भी अपने आप में ख़ास है. उन्होंने जिस तरह रुढ़िवादी व्यवस्थाओं और मान्यताओं से लड़ते हुए खुद को एक प्रोफेशनल टेनिस खिलाड़ी के रूप में स्थापित किया, वो एक बड़ी मिसाल है.

सानिया का जन्म 1986 में हैदराबाद में हुआ. उस दौर में प्रोफेशनल टेनिस को सिर्फ अमीर लोगों का खेल माना जाता था.

सानिया ने जब 6 साल की उम्र में टेनिस में दिलचस्पी दिखाई, तो उनके सामने खेलने के लिए उबड़-खाबड़ ज़मीन पर गाय के गोबर से बना टेनिस कोर्ट था.

इन हालातों में भी सानिया एक सहज टेनिस खिलाड़ी के तौर पर उभरीं और 2003 में विंबलडन चैंपियनशिप के गर्ल्स डबल्स का ख़िताब जीतने के साथ जूनियर टेनिस प्लेयर के तौर पर पहचान भी पुख़्ता कर ली.

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सानिया मिर्ज़ा को बड़ी सुर्खियां 2005 के उस साल तब मिली, जब वो ऑस्ट्रेलियन ओपन के तीसरे राउंड में पहुंच गईं. इस चरण तक पहुंचने वाली सानिया पहली भारतीय महिला थीं. यहां उनका सामना सेरेना विलियम्स से होना था.

वो एक अद्भुत मैच था, जिसे देखने के लिए क्रिकेट के दीवाने भी टकटकी लगाए हुए थे. कैसे एक 19 साल की लड़की सेरेना विलियम्स जैसी मंझी हुई खिलाड़ी का सामना कर रही हैं, जो उस वक्त टेनिस की महानतम महिला खिलाड़ियों में गिनी जाने लगी थीं.

सेरेना विलियम्स से वो मैच सानिया हार गईं, लेकिन इसके साथ वो ना सिर्फ टेनिस की दुनिया में स्थापित हुईं, बल्कि इसके साथ भारत में खेलों में महिलाओं के लिए नए युग की शुरुआत हुई.

इंटरनेट के पहले वाले उस ज़माने में सानिया मिर्ज़ा के मैचों ने लोगों को एक दूसरे से जोड़ा, उन्हें एक साथ मैच देखने के लिए प्रेरित किया. तब सानिया का ज़िक्र हर स्पोर्ट्स मैगज़ीन में हुआ करता था.

आज भी तमाम लोगों को उन दिनों की सानिया मिर्ज़ा की याद है, जो देखने में किसी आम लड़की की तरह थीं, लेकिन क्या गज़ब का कमाल कर रही थीं.

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पहनावे को लेकर प्रतिक्रियाओं और फतवों का जवाब

हालांकि उस दौर में जब तमाम लोग सानिया मिर्जा के उदय का जश्न मना रहे थे, कुछ मुस्लिम मौलानाओं ने फतवा भी जारी कर दिया. इसमें मैच के दौरान सानिया के छोटे स्कर्ट्स को 'अशोभनीय', 'गैर-इस्लामिक' और 'उकसाने वाला' करार दिया गया था.

तब 18 साल की सानिया मिर्ज़ा के करियर में ऐसी प्रतिक्रियाओं की बाढ़ आ गई थी. ये टेनिस कोर्ट और उसके बाहर हर चीज़ के खिलाफ थीं, जो सानिया ने अपनी मर्जी से चुना था.

सानिया मिर्ज़ा, निजी तौर पर बेहद धार्मिक हैं और अपने मज़हबी रीति रिवाजों को अपने तरीके से निभाती हैं, ताकि इससे उनके लक्ष्यों और आकांक्षाओं पर कोई असर नहीं पड़े., लेकिन फतवों की वजह से सानिया का ये पक्ष जिस तरह सार्वजनिक तौर पर प्रकट हुआ, उसे देखना अपने आप में सुखद था.

सानिया अपने कपड़ों और टेनिस कोर्ट पर अपने मूवमेंट को लेकर की गई टिप्पणियों का जिस तरह से जवाब देतीं, वो कभी सख्त होते, तो कभी नाटकीय.

उस दौर में सानिया टूर्नामेंट्स और दूसरे कार्यक्रमों में टी-शर्ट्स और टेनिस कैप के साथ पूरे आत्मविश्वास से भरी होतीं. सानिया का जवाब होता- "आप सच को पचा नहीं पाते." और ये भी कि, "आप या तो मुझसे सहमत हो सकते हैं या फिर ग़लत."

इस रूप में सानिया की आपार लोकप्रियता उन्हें अपने ही देश में गहन छान-बीन और कटुता से भरी बहस का मुद्दा बनाती, लेकिन इन सबका सामना करती हुई सानिया के पास गज़ब आत्मविश्वास था. वो इन सबसे कभी डरती-भागती नहीं दिखीं.

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इमेज कैप्शन, 2010 में पाकिस्तानी क्रिकेटर शोएब मलिक के साथ सानिया मिर्ज़ा की शादी

जब सानिया ने कहा- भारत में नहीं खेलूंगी

एक मौका ऐसा 2008 में जरूर आया, जब सानिया ने बेंगलुरु ओपेन का विरोध करते हुए भारत में कोई टेनिस मैच नहीं खेलने का एलान कर दिया.

तब सानिया ने मीडिया से बातचीत में कहा था, "जब भी मैं यहां अपने देश में खेलती हूं, कोई न कोई समस्या होती है."

इसके कुछ दिनों पहले सानिया मिर्ज़ा पर तिरंगे के अपमान का आरोप लगा था. वो एक वीडियो में एक टेबल के सामने तिरंगे पर अपना पांव रखे नजर आ रही थीं.

इसके अलावा उसी महीने में सानिया ने हैदराबाद की एक मस्जिद में एक विज्ञापन शूट किया था, जिसकी वजह से कई मुस्लिम समूह उनसे चिढ़े हुए थे.

2010 में सानिया मिर्जा ने पाकिस्तानी क्रिकेटर शोएब मलिक से शादी कर ली. इसे लेकर नया विवाद खड़ा हो गया. तमाम लोगों ने अपनी मातृभूमि के प्रति सानिया की निष्ठा पर सवाल उठाना शुरू कर दिया.

आखिरकार सानिया मिर्ज़ा ऐसा मुकाम बनाने में कामयाब हो गईं, जो असंभव था. देश और सरहद को पार करते हुए वो सिर्फ भारत की टेनिस स्टार नहीं थीं, बल्कि पूरे दक्षिण एशिया की आइकन बन चुकी थीं.

पिछले मंगलवार को दुबई के टूर्नामेंट में अपने मैच के बाद सानिया ने जब अपने बेटे को गले लगाया, तब वहां मौजूद लोगों से लेकर ऑनलाइन दर्शकों तक, सभी ने तालियां बजाकर अपनी खुशी जाहिर की.

ये इस बात की बानगी है, कि सानिया किस तरह लोगों की उस धारणा को तोड़ने में कामयाब हुईं, जिसमें माना जाता था कि सानिया को ये करना चाहिए और ये नहीं.

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महिला अधिकारों के लिए मुखर आवाज़

जिस देश में महिलाओं को खेलों की दुनिया में अपना करियर बनाने से हतोत्साहित किया जाता रहा हो, सानिया ने उसी देश में ठीक वही किया. बल्कि उससे भी कहीं ज़्यादा.

साल 2016 में मशहूर पत्रकार राजदीप सरदेसाई ने एक इंटरव्यू में पूछा कि क्या शादी के बाद अब मां बनने को लेकर सोचती हैं. तब सानिया ने 'उनके निराश होने के अंदाज़ पर चुटकी ली और कहा, 'चिंता न करें, मैं अपनी नंबर वन रैंकिंग के आगे मां बनने को तवज्जो नहीं देने जा रही. '

उस इंटरव्यू में सानिया ने ये भी कहा कि, "एक महिला होने के नाते मुझे इस सवाल का सामना अक्सर करना पड़ता है. जैसा कि सभी महिलाओं के साथ होता है- पहले शादी का सवाल और फिर मां बनने का सवाल. दुर्भाग्य से ये सवाल तब भी होता है, जब हमने अपना घर-बार बसा लिया और हमने चाहे जितने भी विम्बल्डन खिताब जीते. "

सानिया अपने पूरे सार्वजनिक जीवन में महिला अधिकारों को लेकर काफी मुखर रहीं. वो घरेलू हिंसा, यौन शोषण समेत तमाम मुद्दों के खिलाफ़ खुलकर बोलती रहीं.

वो भारतीय खेल में महिला और पुरुषों के बीच मैच फी और दूसरी सुविधाओं को लेकर भेदभाव की भी कट्टर आलोचक रहीं.

कई लोग उनके शांत मगर खरी बात कहने के अंदाज को उनके अहंकार से जोड़कर देखते थे. लेकिन उनके चहाने वालों के लिए ये मुखर अंदाज ही उनकी शख्सियत का सुनहरा पहलू था.

अपने रिटायरमेंट से एक दिन पहले ईएसपीएन को दिए इंटरव्यू में सानिया मिर्ज़ा ने कहा भी, "मैं चाहूंगी लोग मुझे ऐसी लड़की के रूप में याद रखें, जिसने सही चीजों के लिए लड़ाई लड़ी. उसने खुद में इतना यकीन किया, जितना किसी दूसरे ने नहीं किया."

इस इंटरव्यू में सानिया ने ये भी कहा कि, 'हमेशा ये मानती रही कि आप रूढ़ियों से लड़ सकते हैं.'

रिटायरमेंट के बाद सानिया अब दुबई और हैदराबाद में अपनी टेनिस एकेडमी चलाने के साथ आईपीएल की रायल चैलेंजर्स बेंगलुरु की महिला क्रिकेट टीम का मार्गदर्शन करेंगी.

ये टीम जल्दी ही महिला प्रीमियर लीग में हिस्सा लेने वाली है.

सानिया कहती हैं, "इस भूमिका में मेरी कोशिश ये रहेगी कि मैं अगली पीढ़ी की मदद कर सकूं और उन सवालों का जवाब देना सिखा सकूं, जो मुझसे पूछा जाता था. आपके बाद अब कौन?. आखिर 20 साल के लंबे दौर में भी हम ऐसा कोई क्यों नहीं ढूंढ सके?"

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