साहा को संन्यास की द्रविड़ की सलाह पर मचा हंगामा, अंदर की बात क्या है

ऋद्धिमान साहा

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    • Author, मनोज चतुर्वेदी
    • पदनाम, वरिष्ठ खेल पत्रकार, बीबीसी हिंदी के लिए

भारतीय टीम के विकेटकीपर बल्लेबाज़ रहे रिद्धिमान साहा का विवाद सुर्खियों में है. उन्होंने टीम इंडिया के दक्षिण अफ़्रीकी दौरे के बाद टीम मैनेजमेंट पर आरोप लगाते हुए कहा कि उन्हें संन्यास लेने के लिए कहा गया. इस पर भारतीय कोच राहुल द्रविड़ ने भी अपनी बात रखी है.

पिछले काफ़ी समय से ऋषभ पंत टीम इंडिया की पहली पसंद वाले विकेटकीपर बने हुए हैं. पिछले दक्षिण अफ़्रीकी दौरे पर टीम मैनेजमेंट ने तीनों टेस्ट मैचों में उन्हें ना खिलाकर पंत को ही पहली पसंद बनाए रखा.

साहा ने अभी पिछले दिनों श्रीलंका के ख़िलाफ़ घोषित टेस्ट टीम में शामिल नहीं किए जाने के बाद कहा है कि 'टीम मैनेजमेंट ने मुझसे कहा कि भविष्य में अब मेरा चयन नहीं होगा, इसलिए मुझे रिटायरमेंट के बारे में सोचना चाहिए'.

साहा का कहना था कि, "मैंने न्यूजीलैंड के ख़िलाफ़ कानपुर में खेले गए टेस्ट में पेन किलर दवाई लेकर जब नाबाद 61 रन बनाए थे, तो दादा (सौरव गांगुली) ने मेरी काफ़ी तारीफ़ की थी. स्थितियों के इतनी जल्दी बदल जाने से मैं हैरान हूं."

टीम इंडिया की योजना का हिस्सा नहीं रहने के बाद उन्होंने रणजी ट्रॉफी मैच में नहीं खेलने का फ़ैसला कर लिया. यह सब बात उन्होंने सार्वजनिक तौर पर ज़ाहिर की है.

इसके बाद इस पूरे मामले मामले में टीम इंडिया के कोच राहुल द्रविड़ का बयान भी सामने आया है जिसमें उन्होंने कहा, "मैं वास्तव में साहा की बात से आहत नहीं हूं. मैं साहा और भारतीय क्रिकेट में उनकी उपलब्धियों और योगदान का सम्मान करता हूं. मेरी उनके साथ की गई बातचीत एकदम साफ़ थी. मैं नहीं चाहता था कि उन्हें यह बात मीडिया के माध्यम से सुनने को मिले."

बतौर कोच द्रविड़ का यह मानना है कि ऋषभ पंत ने अपने को टीम में अच्छे से स्थापित कर लिया है. इसलिए अब उनके साथ एक युवा विकेटकीपर को तैयार करने की ज़रूरत है.

ऋषभ पंत और राहुल द्रविड़

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बीसीसीआई की सोच में बदलाव

हमें याद है कि सचिन तेंदुलकर और महेंद्र सिंह धोनी के प्रदर्शन में गिरावट आने पर जब मीडिया में उनके संन्यास लेने की बात उठती थी तो बीसीसीआई की तरफ़ से अक्सर कहा जाता था कि यह दोनों खिलाड़ी अपने बारे में ख़ुद फ़ैसला लेने में सक्षम हैं. उन्हें जब लगेगा कि संन्यास लेने का समय आ गया है, तो वह संन्यास ले लेंगे.

इस दौरान यह मांग भी उठती रही थी कि टीम मैनेजमेंट और बीसीसीआई चयनकर्ताओं को उनके भविष्य की योजना के बारे में बात करनी चाहिए.

क्रिकेट की दुनिया पर नज़र रखने वालों को मालूम है कि राहुल द्रविड़ जिस तरह सीधे बल्ले से खेलने वाले खिलाड़ी थे, ठीक उसी तरह सीधी बात करने में भी विश्वास रखते हैं.

यही वजह है कि उन्होंने टीम इंडिया के कोच पद की ज़िम्मेदारी संभालने के बाद मैचों में अंतिम एकादश में नहीं चुने जाने वाले खिलाड़ियों से बात करने का सिलसिला शुरू किया है. इस कारण अंतिम एकादश में नहीं चुने जाने वाले खिलाड़ी मायूस होने से बच जाते हैं.

एम एस धोनी

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क्रिकेटरों में संन्यास को लेकर स्पष्टता ज़रूरी

भारतीय क्रिकेट के इतिहास पर नजर दौड़ाएं तो साफ़ होता है कि हमारे क्रिकेटर संन्यास को लेकर स्पष्ट योजना नहीं होने के शिकार रहे हैं.

देश को पहला आईसीसी विश्व कप जिताने वाले कपिलदेव हों या मास्टर ब्लास्टर सचिन तेंदुलकर या फिर भारत के सफलतम कप्तानों में शुमार किए जाने वाले महेंद्र सिंह धोनी, इन सभी ने संन्यास लेने के लिए दबाव झेला है.

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कपिलदेव की बात करें तो उन्हें भारतीय क्रिकेट को नई दिशा देने वाला खिलाड़ी माना जाता है. लेकिन वह अपने करियर के आख़िरी सालों में प्रदर्शन में गिरावट आने के कारण आलोचनाओं का शिकार बने. इस दौरान यह माना जाने लगा था कि उन्हें संन्यास ले लेना चाहिए.

पर वह टेस्ट क्रिकेट में सर्वाधिक विकेट लेने का रिकॉर्ड बनाने की ख़ातिर खेलते रहे. लेकिन सफलताएं मिलनी कम हो जाने की वजह से रिकॉर्ड उनसे दूर भागता रहा. आख़िरकार 434 टेस्ट विकेट का रिकॉर्ड बनाने पर उन्होंने संन्यास लिया.

सचिन तेंदुलकर

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सचिन का करियर भी उम्मीदों से ज़्यादा खिंचा

दुनिया के सफलतम क्रिकेटर सचिन तेंदुलकर का प्रमुख सपना आईसीसी विश्व कप जीतना रहा है. 2011 में महेंद्र सिंह धोनी की अगुआई में भारत ने जब विश्व कप जीत लिया तो क्रिकेट प्रशंसकों को लगा कि वह क्रिकेट को अलविदा कह देंगे.

लेकिन तमाम आलोचनाओं के बीच भी खेलना जारी रखा और विश्व कप जीतने के क़रीब दो साल बाद 16 नवम्बर 2013 को वानखेड़े स्टेडियम पर 200वां टेस्ट खेलने के बाद संन्यास लेने की घोषणा की.

महेंद्र सिंह धोनी ने तो टेस्ट क्रिकेट से संन्यास तो अप्रत्याशित रूप से ले लिया था. लेकिन छोटे प्रारूप में उन्होंने टीम में शामिल नहीं रहने के बाद भी संन्यास लेने की घोषणा नहीं की.

हम सभी जानते हैं कि धोनी टीम के ज़बर्दस्त फ़िनिशर रहे हैं. उनके बारे में यह कहा जाता था कि वह जब भी छक्का मारने का प्रयास करते हैं तो गेंद मैदान से बाहर ही जाती है.

लेकिन आख़िरी सालों में रिफ़्लेक्सेज़ में कमी आने की वजह से वह कई बार छक्का मारने के प्रयास में कैच आउट भी हुए. लेकिन उन्होंने भी संन्यास लेने की घोषणा काफ़ी देरी से की.

देरी के बाद भी उन्हें अचानक ही संन्यास लेना पड़ा था. भारत के सबसे कामयाब कप्तान होने के बाद भी उन्हें भी फ़ेयरवेल नहीं मिल सका था.

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संन्यास में देरी की वजह व्यावसायिक

भारतीय क्रिकेटरों में संन्यास को लेकर अनिश्चितता की सबसे बड़ी वजह पैसा है.

विश्व क्रिकेट में सबसे ज़्यादा पैसा कहीं है तो वह भारत में है. यह पैसा क्रिकेट के खेल से ज़्यादा बाहर के विज्ञापन से आता है. क्रिकेटर तमाम ब्रैंड्स के लिए विज्ञापन करते हैं.

आमतौर पर उनकी क्रिकेट में बनने वाली छवि के कारण ही यह विज्ञापन उन्हें मिलते हैं. यह छवि उनके प्रदर्शन पर निर्भर करती है. यह माना जाता है कि क्रिकेटर के संन्यास लेने पर यह विज्ञापन उनके हाथ से छिटकने लगते हैं.

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इस कारण कई बार खिलाड़ी टीम से बाहर होने के बाद और टीम में वापसी की उम्मीद नहीं होने पर भी विज्ञापन दुनिया में बने रहने के लिए संन्यास की घोषणा नहीं करते हैं.

कुछ दिग्गज क्रिकेटरों के संन्यास लेने में देरी करने पर इस तरह की चर्चा चली थी.

पर कई बार ऐसा भी होता है कि क्रिकेटर सही मायने में समझता है कि वह अभी भी टीम में वापसी करने की क्षमता रखता है. लेकिन टीम प्रबंधन अन्य किसी कारण से उसकी अनदेखी कर रहा होता है.

सहवाग के भारतीय टीम से बाहर होने के बाद काफ़ी समय तक क्रिकेट प्रेमियों को भी लगता था कि वह अभी भी टीम में खेलने की क्षमता रखते हैं.

वीरेंदर सहवाग

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सीख क्या है

ऑस्ट्रेलिया में हमने ज़्यादातर क्रिकेटरों को एक योजना के तहत ही संन्यास लेते देखा है. यही वजह है कि संन्यास लेने वाले ज़्यादातर क्रिकेटरों को विदाई मैच खेलते देखा जाता है.

तमाम क्रिकेटर पहले ही घोषणा कर देते हैं कि वह फलां सिरीज़ के बाद संन्यास ले लेंगे. इससे देश की सेवा करने वाले क्रिकेटर सम्मान के साथ अलविदा कहते नजर आते हैं.

भारत में अक्सर देखते हैं कि आमतौर पर जब तक क्रिकेटर को बाहर का रास्ता दिखाकर उसकी अनदेखी नहीं कर दी जाती है, तब तक वह संन्यास लेने की घोषणा ही नहीं करते.

रिद्धिमान साहा के बारे में भी कुछ ऐसा ही लगता है. उन्हें यह समझने में दिक़्क़त नहीं होनी चाहिए थी कि ऋषभ पंत की जगह पक्की हो जाने के बाद टीम प्रबंधन की नज़र में वे शायद उपयोगी नहीं रहे हैं.

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