राहुल द्रविड़ः टीम इंडिया के नए हाइप्रोफ़ाइल कोच के सामने दो अहम चुनौतियां

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- Author, अयाज़ मेनन
- पदनाम, वरिष्ठ खेल पत्रकार
अगर आप कोशिश करेंगे कि राहुल द्रविड़ से इस बात पर चर्चा करें कि भारतीय टीम के नए कोच के रूप में उनके सामने क्या चुनौती है तो इस बात की संभावना है कि वो भारतीय क्रिकेट में खिलाड़ियों की उम्र की विसंगतियों पर बातचीत का रुख मोड़ दें.
भारत में जूनियर स्तर पर एक लड़की या लड़के को उनके वास्तविक उम्र से कहीं कम बताते हुए जन्म प्रमाणपत्र बनवाने का प्रचलन है. द्रविड़ इस बात से ख़फ़ा हैं.
क़रीब साल भर पहले एक इंटरव्यू में उन्होंने मुझसे कहा था कि, "15-16 साल की उम्र के लड़के-लड़कियां अपनी उम्र से कहीं कम और शारीरिक क्षमता में भी कमतर 12-13 साल की उम्र के बच्चों के कैटेगरी में खेल रहे हैं. ये 15-16 साल के बच्चों के साथ बड़ा धोखा है."
द्रविड़ ने झल्लाते हुए कहा था, "एक ओर यह उन बच्चों को जहां मानसिक तौर पर बर्बाद कर सकता है, तो वहीं दूसरी तरफ़ उम्र कम करके उपलब्धियां हासिल करने के लिए उन बच्चों को तारीफ़ मिलेगी जिन्होंने वास्तविक तौर पर उसे कहीं बड़ी उम्र में पाया है, और तो और उम्र को कम करना ऊंचे स्तर पर जाने के साथ ही उजागर भी हो जाता है."
"इसका मतलब, नुकसान दोनों ही मामलों में है. लेकिन दुर्भाग्य ये है कि माता-पिता, स्कूल के प्रिंसिपल, खेल के कोचों और यहां तक कि राज्य के क्रिकेट संघों के अधिकारियों की मिलीभगत से ऐसा हो रहा है."

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एक साल बाद अब द्रविड़ सीनियर खिलाड़ियों पर फ़ोकस कर रहे हैं.
एक बैटर और कप्तान के रूप में अपने दमदार करियर के अलावा द्रविड़ अंडर-19, इंडिया 'ए' की टीमों को कोचिंग दिया है नैशनल क्रिकेट एकैडमी (एनसीए) की कमान भी संभाली है. आज भारतीय क्रिकेट के लगभग सभी खिलाड़ी उनकी मेंटरशिप से गुज़रे हैं.
द्रविड़ को चीफ़ कोच बनाने की मांग रवि शास्त्री के इस किरदार में आने से भी पहले से उठ रही थी. हाइप्रोफ़ाइल और लुभावना होने की वजह से भारतीय टीम के कोच की भूमिका में कौन नहीं आना चाहेगा- लेकिन द्रविड़ को ये ऐसी बातें बहकाती नहीं हैं.
उन्होंने इसे तब स्वीकार किया जब उन्हें यक़ीन हो गया कि ये उनके और उनके परिवार के लिए सही फ़ैसला है.

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इसे इस बात से समझा जा सकता है कि उनकी क्या विवशता रही होगी.
क़रीब सात या आठ साल पहले उन्होंने अचानक टीवी कमेंट्री काम छोड़ दिया था. मैं कुछ सिरीज़ में उनके साथ कमेंट्री बॉक्स में था. उनके शब्दों का चयन और बोलने का ढंग लाजवाब था. उनके विश्लेषण से साफ़ दिखता था कि उन्हें क्रिकेट की कितनी गहरी समझ है. ब्रॉडकास्टर्स के बीच उनकी बहुत मांग थी. लेकिन उन्होंने कमेंट्री के बजाय तब भारत की इंडिया-ए टीम को कोचिंग देने को तरजीह दी.

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एक प्रीमियर बैडमिंटन लीग के दौरान बेंगलुरू में संयोग में मेरी उनसे मुलाक़ात हुई, तब मैंने उनसे पूछा था कि उन्होंने कमेंट्री करना क्यों छोड़ दिया. तो उन्होंने मुझे बताया था, "मैं अपने घर से इतने लंबे समय के लिए दूर नहीं रह सकता."
उनकी पत्नी विजेता, जो कि एक डॉक्टर हैं, ने तब हाल ही में फिर से अपना करियर शुरू किया था.
मेरे उमरते हुए ख्यालों के बीच हक़ीक़त बयां करते हुए उन्होंने बताया कि, "जब मैं खेलता था तो वे हमारे बच्चों को बड़ा करने में, उनकी देखभाल करने में लगी थीं. अब मेरी बारी है."
संभवतः 2021 तक घर की स्थिति संभल गई है. कोविड के मामलों में कमी के साथ भारतीय क्रिकेट के लिए अगले दो सालों में तीन आईसीसी क्रिकेट टूर्नामेंट, टी20 और वनडे वर्ल्ड कप और वर्ल्ड टेस्ट चैंपियनशिप शामिल हैं. और ये द्रविड़ को अपनी अहमियत साबित करने के मौके भी हैं.
द्रविड़ के लिए कितने ही विश्लेषणों का इस्तेमाल किया गया- कभी उन्हें बेहद सतर्क, व्यवस्थित, विनम्र, कहा गया तो अक्सर 'दीवार' कहा जाता था. लेकिन आक्रामकता और महत्वकांक्षा के बग़ैर द्रविड़ की ये विशेषताएं कहीं खो सी जाती हैं.
बॉडी लैंग्वेज के मामले में वे दमदार नहीं है, उनकी स्टाइल में वो तड़क-भड़क नहीं है. लेकिन ये सोचना भी ग़लत है कि वो सौम्य या रक्षात्मक हैं.

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ऑस्ट्रेलियाई सलामी बल्लेबाज़ मैथ्यू हेडेन ने एक बार ऑन रिकॉर्ड कहा था कि अगर आक्रामकता को समझना है तो द्रविड़ की आंखों में तब देखो जब वो बल्लेबाज़ी कर रहे हों.
उनका करियर ग्राफ़ बताता है कि कैसे क्रिकेट की दुनिया के सबसे महान बल्लेबाज़ों में से एक बनने के क्रम में अपनी आक्रामकता और महत्वकांक्षा का मेल किया.
इस सहस्राब्दि के शुरुआती छह सात सालों को भारतीय बैटिंग का स्वर्णयुग कहा जा सकता है. अगर अपने अद्भुत कारनामों से सचिन तेंदुलकर देश की धड़कन थे, तो द्रविड़ वो आधार स्तंभ थे जिन्होंने टीम को स्थिरता दी.
जो विश्वास द्रविड़ ने अपने खेल के दिनों में हासिल किया वो उनके संन्यास लेने के लगभग एक दशक बाद भी आज कायम है. भारतीय टीम के कोच बनाए जाने पर उनके फैन्स, पूर्व और वर्तमान खिलाड़ियों ने राहत और खुशी जताई है. टी20 वर्ल्ड कप के उपविजेता न्यूज़ीलैंड के ख़िलाफ़ घरेलू टी20 सिरीज़ में 3-0 की जीत पर उनकी हर तरफ प्रशंसा हो रही है. लेकिन जैसा कि स्वाभाविक था, द्रविड़ ने इस जीत में उनके किरदार को लेकर कही जा रही बातों को साफ़ टरका दिया.

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वे क्रिकेट के चंचल स्वभाव को समझते हैं और ये भी जानते हैं बड़े नाम वाले कोच के आस पास के माहौल में चूक हो सकती है. भारत के सबसे सफल कोच जॉन राइट, गैरी कर्स्टन और रवि शास्त्री रहे हैं. हालांकि, कहीं अधिक प्रतिष्ठित कोच जैसे कि ग्रेग चैपल और अनिल कुंबले का कार्यकाल बहुत छोटा था जो कि कटुता के बीच विवादों में समाप्त हुआ था.
आज के क्रिकेट में जहां यह कई फॉर्मेट में खेला जा रही है, कोचिंग बेहद दुष्कर भी हो सकता है. भारत के मामले में तो कोच को बहुत अधिक दबाव वाली परिस्थितियों के अलावा तकनीकी मामलों में भी गहरी समझ वाला और वर्कलोड की बेहद अच्छी समझ के साथ-साथ खिलाड़ियों से उनका बेहतरीन प्रदर्शन करवाने वाला होना पड़ता है.

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आगे द्रविड़ के लिए दो बेहद अहम चुनौतियां हैं.
पहला, बिल्कुल ही विपरीत व्यक्तित्व वाले दो कप्तानों को संभालना- विराट कोहली को टेस्ट और वनडे क्रिकेट में तो रोहित शर्मा को टी20 में. इसके लिए बेहद सावधानी बरतनी पड़ेगी क्योंकि इससे ड्रेसिंग रूम के माहौल पर गहरा असर पड़ सकता है.
और दूसरा ये कि टीम को उस मानसिक स्थिति से बाहर निकालना कि वो कई देशों वाले बड़े टूर्नामेंट नहीं जीत सकती.
भारतीय टीम किसी भी आईसीसी टूर्नामेंट को आखिरी बार आठ साल पहले 2013 में बतौर चैंपियंस ट्रॉफ़ी जीती थी.
तब से द्विपक्षीय मुक़ाबलों में दमदार रिकॉर्ड के बावजूद, भारत 2015 और 2019 के वनडे वर्ल्ड कप के सेमीफ़ाइनल, 2017 के चैंपियंस ट्रॉफ़ी फ़ाइनल, इसी साल खेले गए पहले वर्ल्ड टेस्ट चैंपियनशिप के फ़ाइनल में हार गया और यहां तक कि इस साल टी20 वर्ल्ड कप के नॉक आउट दौर में भी नहीं पहुंच सका.
द्रविड़ से उम्मीदें कहीं अधिक हैं जबकि समय बहुत कम. आगे क्या होगा यह तो वक़्त ही बताएगा. उन्हें इस बात में पूरा यक़ीन है कि अगर प्रक्रिया सही है, तो नतीजे भी उसके अनुरूप ही होंगे. और हां, अच्छी शुरुआत तो हो ही गई है.
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