अंशु मलिक का विश्व चैंपियनशिप में पदक जीतना क्यों है इतना ख़ास

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- Author, सूर्यांशी पांडेय
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
हरियाणा के जींद ज़िले के निडानी गाँव की अंशु मलिक जब विश्व रेसलिंग चैंपियनशिप के मंच पर नज़र आईं, तो उनके बाएँ हाथ पर टेपिंग दिख रही थी.
टोक्यो ओलंपिक से पहले से ही उन्हें चोट लगी थी, जो ओलंपिक के दौरान और बढ़ गई थी. इसके बावजूद अंशु मलिक ने दो महीने की कड़ी ट्रेनिंग कर विश्व रेसलिंग चैंपियनशिप में हिस्सा लेने का फ़ैसला किया और इतिहास रचा.
वे ओस्लो (नॉर्वे) में आयोजित हुए विश्व रेसलिंग चैंपियनशिप के फ़ाइनल में पहुँचने वाली पहली भारतीय महिला पहलवान बनीं और रजत पदक हासिल करने वाली पहली भारतीय महिला पहलवान हैं.
इसके साथ-साथ वे फ़ाइनल में पहुँचने वाली तीसरी भारतीय पहलवान हैं. उनसे पहले यह कारनामा केवल दो पहलवान सुशील कुमार (पुरुष वर्ग) और बजरंग पुनिया (पुरुष वर्ग) ने कर दिखाया था.
चोट के साथ ही मैट पर उतरीं अंशु

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57 किलोग्राम भारवर्ग के फ़्री स्टाइल कैटेगरी के फ़ाइनल में प्रवेश करना इतना आसान नहीं था.
सेमीफ़ाइनल में उनका मुक़ाबला जूनियर यूरोपियन चैंपियन सोलोमिया विंक से था, जिनको अंशु मलिक ने तकनीकी श्रेष्ठता के आधार पर 11-0 से हराया और फ़ाइनल में अपनी जगह बनाई.
सेमीफ़ाइनल को जीतने के बाद अंशु मलिक ने ख़ुद बताया था कि चोट के साथ ट्रेनिंग करना बहुत दर्द देता था, लेकिन पदक की भूख ने उन्हें डटे रहने का हौसला दिया.
फ़ाइनल में अंशु का मुक़ाबला अमेरिका की हेलन मारोलिस से था, जो 2016 के रियो ओलंपिक की चैंपियन रही थीं. यही नहीं टोक्यो ओलंपिक में उन्होंने कांस्य पदक भी हासिल किया था.
अंशु शुरुआत में 1-0 से आगे थी, लेकिन बाद में हेलन उन पर पूरी तरह हावी हो गईं.
हेलन के अनुभव के आगे अंशु को रजत पदक से संतोष करना पड़ा, हालाँकि फ़ाइनल में पहुँचकर उन्होंने इतिहास तो रच ही दिया.
अंशु मलिक जापान की कुश्ती की खिलाड़ी काओरी इचो के खेल से बेहद प्रभावित हैं और उनके वीडियो देखती हैं.

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कैसे की विश्व चैंपियनशिप की तैयारी?
पहली बार अंशु मलिक ने टोक्यो ओलंपिक के दौरान सुर्ख़ियाँ बटोरी, जब वे सोनम मलिक के साथ ओलंपिक क्वालिफ़ाई करने वाली सबसे युवा पहलवानों में से एक बनी थीं.
उस समय सोनम मलिक (62 किलोग्राम) केवल 18 साल की थीं और अंशु मलिक (57 किलोग्राम) 19 साल की थीं.
लेकिन ओलंपिक में सोनम और अंशु दोनों को ख़ाली हाथ लौटना पड़ा.
अंशु पदक न ला पाने के ग़म से उबरी भी नहीं थी कि सामने विश्व रेसलिंग चैंपियनशिप के ट्रायल्स थे.
अंशु मलिक के पिता, धरमवीर मलिक ने बीबीसी को बताया, "अंशु ने चोट लगने के बावजूद विश्व चैंपियनशिप में हिस्सा लेने का मन बनाया और तक़लीफ़ में भी ट्रेनिंग करना शुरू कर दिया."
वह बताते हैं कि ओलंपिक के समय कोविड-19 जैसी परिस्थिति आने पर उन्होंने भारतीय कुश्ती संघ से अंशु के साथ कैंप में रहने की अनुमति मांगी थी. वो कहते हैं कि वे हर बार यह सुनिश्चित करते हैं कि वे अंशु के साथ हर कैंप में रहें.
वो कहते हैं, "मैं कोच के साथ-साथ अंशु के दांव को देखता रहता हूँ और उसकी डाइट (खान-पान) की पूरी ज़िम्मेदारी मैं लेने की कोशिश करता हूँ."

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वहीं अंशु की माँ, मंजू अंशु को मानसिक तौर पर हौसला देती थीं और फ़ोन पर उनसे बात करती थीं.
31 अगस्त को दिल्ली में आयोजित विश्व रेसलिंग चैंपियनशिप के ट्रॉयल्स में अंशु मलिक का प्रदर्शन अच्छा रहा और फिर वो मुख्य मुक़ाबले में हिस्सा लेने के लिए ओस्लो (नॉर्वे) गईं.
अंशु कहती हैं, "घर पर केवल कुश्ती की बातें ही होती है. समझ लीजिए सोते, जागते, खाते-पीते हम लोग सिर्फ़ कुश्ती की बात करते हैं."
अंशु के पिता धरमवीर मलिक केंद्रीय औद्योगिक सुरक्षा बल (सीआईएसएफ़) से रिटायर होकर गाँव में खेती करते हैं, लेकिन कुश्ती से उनका गहरा नाता है.
उन्होंने साल 1995 में वर्ल्ड कैडेट चैंपियनशिप के 76 किलोग्राम भारवर्ग में हिस्सा भी लिया था. लेकिन चोट लगने के कारण वो कुश्ती को करियर के तौर पर अपना नहीं पाए. उनके बड़े भाई भी कुश्ती के अखाड़े में अंतराष्ट्रीय स्तर तक पहुँचे थे.
पिता का सपना
धरमवीर ने अपना सपना अपने बेटे शुभम मलिक में देखना शुरू किया. आठ साल की उम्र से उसकी ट्रेनिंग करवाना शुरू किया और बाद में अपनी बेटी अंशु मलिक को भी 12 साल की उम्र में कुश्ती के अखाड़े में ले गए.
दोनों बच्चों ने निडानी गाँव में ही स्थित चौधरी भरत सिंह स्पोर्ट्स स्कूल में कुश्ती सीखना शुरू किया. अंशु ने जल्द महिला पहलवानों के साथ-साथ पुरुष पहलवानों के सामने भी अपना दबदबा बनाना शुरू कर दिया.

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अंशु के स्कूल के कोच रहे जगदीश शियोरन बताते हैं कि अंशु शुरू से बहुत फुर्तीली रही तो उसमें प्रतिभा दिखने लगी थी. जगदीश के बाद अंशु को रेसलिंग कोचिंग में सर्वश्रेष्ठ कोच में से एक अजमेर ने कोच करना शुरू किया.
अंशु ने उनके साथ सीखकर अहम खिताब भी अपने नाम किए. शुभम मलिक भी अंतराष्ट्रीय स्तर पर विश्व कैडेट चैंपियनशिप में हिस्सा लेते रहे. वहीं नैशनल कैंप में आने के बाद अंशु महिला पहलवानों के राष्ट्रीय कोच कुलदीप सिंह से ट्रेनिंग लेने लगी.
अंशु मलिक ने जूनियर और सीनियर एशियन चैंपियनशिप में स्वर्ण पदक जीता और अब विश्व रेसलिंग चैंपियनशिप में रजत पदक जीता है. ओस्लो में आयोजित विश्व रेसलिंग चैंपियनशिप में नौ भारतीय महिला पहलवानों ने हिस्सा लिया.
हैनी कुमारी (50 किलो), पूजा जट (53 किलो), पिंकी (57 किलो), अंशु मलिक (57 किलो), सरिता मोर (59 किलो), संगीता फोगाट (62 किलो), भटेरी (65 किलो), रितु मलिक (68 किलो), दिव्या ककरन (72 किलो). इनमें से सरिता मोर ने कांस्य पदक जीता तो अंशु ने रजत.
दो बार ओलंपिक में भाग ले चुकी विनेश फोगाट विश्व चैंपियनशिप के ट्रॉयल्स से बाहर हो गई थीं, तो टोक्यो ओलंपिक में हिस्सा लेने वालीं सोनम मलिक ने चोटिल होने के कारण हिस्सा नहीं लिया था.
विश्व चैंपियनशिप में अंशु से पहले अल्का तोमर (2006), गीता (2012), बबीता (2012), पूजा डांडा (2018), विनेश (2019) ने कांस्य पदक जीता था.
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