डेवोन कॉनवे: पहले टेस्ट में रचा ऐसा इतिहास जो कोई क्रिकेटर अब तक नहीं बना सका

लार्ड्स यानी क्रिकेट का मक्का

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    • Author, प्रदीप कुमार
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

लार्ड्स यानी क्रिकेट का मक्का. दुनिया का हर क्रिकेटर इस मैदान पर कुछ ऐसा कर गुजरना चाहता है कि दुनिया उसे याद रखे. शायद यही भाव न्यूज़ीलैंड के क्रिकेटर डेवोन कॉनवे का अंदर भी रहा होगा.

दक्षिण अफ्रीका में जन्मे कॉनवे का नाम क्रिकेट की दुनिया ने बुधवार को शुरू हुए लॉर्ड्स टेस्ट से पहले नहीं सुना होगा. लेकिन महज़ दो दिनों के अंदर क्रिकेट की दुनिया के ऐसे-ऐसे रिकॉर्ड्स उनके नाम हो चुके हैं, जिसे इतनी आसानी से तोड़ना संभव नहीं है.

कोनवे

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इमेज कैप्शन, न्यूज़ीलैंड के क्रिकेटर डेवोन कॉनवे

29 साल की उम्र में बाएं हाथ के आक्रामक बल्लेबाज़ कॉनवे ने डेब्यू टेस्ट में लॉर्ड्स के मैदान पर दोहरा शतक लगाने का कारनामा कर दिखाया है. इस मैदान पर यह करिश्मा इससे पहले किसी ने नहीं दिखाया.

इससे पहले लॉर्ड्स के मैदान पर डेब्यू के दौरान सबसे बड़ी पारी का रिकॉर्ड भारत के पूर्व कप्तान और बीसीसीआई के मौजूदा अध्यक्ष सौरव गांगुली के नाम था. जिन्होंने 1996 में इंग्लैंड के ख़िलाफ़ अपने टेस्ट डेब्यू में 131 रनों की पारी खेली थी. यह वही टेस्ट था जिसमें दूसरे छोर पर उनका बखूबी साथ देते हुए राहुल द्रविड़ अपने डेब्यू टेस्ट में महज पांच रन से शतक से चूक गए थे.

यानी इस तरह से देखें तो कॉनवे ने क्रिकेट के मैदान पर 25 साल पुराना रिकॉर्ड तोड़ा. लेकिन वे जिस टेम्पारामेंट से खेल रहे थे, उसमें उन्होंने यहां तक रूकना क़बूल नहीं किया. देखते ही देखते उन्होंने भारत के एक और लीजेंडरी क्रिकेटर महाराज रणजीत सिंह का 125 साल पुराना रिकॉर्ड तोड़ डाला. रणजीत सिंह जी वही क्रिकेटर रहे जिनके नाम भारत की घरेलू क्रिकेट प्रतियोगिता रणजी ट्रॉफी है.

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125 साल पुराना रिकॉर्ड तोड़ा

लेकिन यहां ध्यान देने की बात यह है कि महाराजा रणजीत सिंह तब भारत नहीं इंग्लैंड की क्रिकेट टीम का हिस्सा थे. उन्होंने अपने डेब्यू टेस्ट में ऑस्ट्रेलिया के ख़िलाफ़ मैनचेस्टर में नाबाद 154 रनों की पारी खेली थी. इंग्लैंड के किसी भी मैदान में में किसी भी क्रिकेटर का डेब्यू टेस्ट में यह सबसे बड़ा स्कोर था, जो क़रीब 125 साल तक बना रहा. आज के दौर में जब क्रिकेट के दुनिया में हर रिकॉर्ड महीनों नहीं दिनों में टूट रहे हों वहां किसी रिकॉर्ड का 125 साल तक बना रहना, अपने आप में अचरज की बात है.

डेवोन कॉनवे यहां भी नहीं रूके. उन्होंने डेब्यू करते हुए लॉर्ड्स के मैदान में वह कारनामा कर दिखाया जो आजतक नहीं देखने को मिला था, उन्होंने यहां डबल सेंचुरी पूरी की. डबल सेंचुरी पूरी करने का उनका अंदाज़ ऐसा था कि उन्होंने छक्का लगाकर अपनी डबल सेंचुरी जमाई.

उन्होंने मार्क वुड की बाउंसर गेंद को ऑफ़ साइड से खींचकर पुल किया. ऊपरी किनारा लगने के बाद भी गेंद डीप स्क्वायर लेग और लाँग लेग बाउंड्री के पार चली गई. यह 347 गेंदों की मैराथन पारी का इकलौता छक्का रहा.

हालांकि क्रिकेट का अपना रोमांच खिलाड़ियों के जोश पर भारी पड़ता रहा है, यही वजह है कि जब इंग्लैंड के गेंदबाज़ कॉनवे को पवेलियन भेजने का कोई रास्ता नहीं तलाश पा रहे थे तब कॉनवे रन आउट हो गए. वे पारी की शुरुआत से अंत तक नॉट आउट रहने का कारनामा नहीं दिखा पाए.

कॉनवे को इंग्लैंड की प्रतिकूल परिस्थितियों, तेज़ गेंदबाज़ों की मददगार पिच और तेज़ गेंदबाज़ों की चौकड़ी के सामने ओपनिंग करने का ज़िम्मा मिला था, लेकिन उन्होंने साढ़े नौ घंटे तक विकेट पर टिक कर दिखाया कि उनका इरादा बेहद मज़बूत था.

डेवोन कॉनवे

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दक्षिण अफ्रीका से न्यूज़ीलैंड का सफ़र

दरअसल, कॉनवे किसी भी हालत में यह मौका हाथ से जाने नहीं देना चाहते होंगे. यह टी-20 और वनडे क्रिकेट के अब तक उनके आंकड़े बताते हैं. महज़ तीन वनडे मैचों में उन्होंने 75 से ज़्यादा की औसत से रन बनाए हैं और आख़िरी वनडे में उन्होंने शतक भी जमाया है.

14 टी-20 मैचों में उन्होंने 59 से ज़्यादा की औसत से रन बनाए हैं, लिहाज़ा जब कीवी कप्तान केन विलियम्सन ने उन्हें टेस्ट मैच में बतौर ओपनर उतारने का फ़ैसला लिया तो कॉनवे ने अपना इरादा और स्पष्ट कर लिया होगा.

दरअसल जीवन में किसी चीज़ के लिए आपका संघर्ष जब बहुत बढ़ जाता है तो उसके लिए मिले मौके पर आप सब कुछ झोंक देते हैं. कुछ ऐसी ही कहानी है डेनोव कॉनवे की.

महज तीन साल पहले तक वे दक्षिण अफ्रीका की घरेलू क्रिकेट में खेल रहे थे, लेकिन नेशनल टीम तक पहुंचने की कोई उम्मीद उन्हें नज़र नहीं आ रही थी. घरेलू क्रिकेट लीग में भी शीर्ष स्तर की लीग टीम में उनकी जगह पक्की नहीं थी.

ईएसपीएन क्रिकइंफो को दिए एक इंटरव्यू में डेवोन ने बताया है, "मेरी टीम में कोई जगह पक्की नहीं थी, ना ही खेलने का स्थान पक्का था. टी-20 में ओपन करता था, वनडे में नंबर 5 पर खेलता था, चार दिनों के मैच में कुछ पक्का नहीं था.'

ऐसे दौर में कोलपाक नियमों के तहत डेवोन इंग्लैंड में जाकर किस्मत आजमाने की सोच रहे थे. उस वक्त बीते पांच सालों से जाड़े के दिनों में इंग्लैंड के लीग स्तर की क्रिकेट भी खेल भी रहे थे लेकिन उनके दो दोस्त न्यूज़ीलैंड में जाकर क्रिकेट खेल रहे थे, उनको देखते हुए डेवोन ने न्यूज़ीलैंड में किस्मत आजमाने को तरजीह दी.

यह उनके जीवन का सबसे बड़ा फ़ैसला साबित हुआ. ऐसा लगता है कि उन्होंने अपने पूरे जीवन को एक तरह से रिस्टार्ट किया हो. वेलिंगटन फायर ब्रेड्स की ओर से खेलते हुए 17 मैचों में उन्होंने 72 से ज़्यादा की औसत से रन बटोरे. 2019-20 में न्यूज़ीलैंड की तीन घरेलू क्रिकेट प्रतियोगिताओं में उन्होंने सबसे ज़्यादा रन बनाए. इसमें एक नाबाद 327 रनों की पारी भी थी.

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बीते साल नवंबर महीने में उन्होंने न्यूज़ीलैंड में रहने का रेजीडेंशियल वीज़ा मिला और उसके कुछ दिनों बाद न्यूज़ीलैंड की ओर से क्रिकेट खेलने का अनुबंध. जब से उन्हें मौका मिला है वह हर मौके का लाभ उठाते दिखे हैं.

जोहानिसबर्ग में एक स्थानीय फुटबॉल क्लब के कोच के बेटे डेवोन की पहली दिलचस्पी फुटबॉल में ही थी, लेकिन उम्र बढ़ने के साथ उन्होंने क्रिकेट के प्रति अपना ध्यान केंद्रित किया और इसकी वजह यह थी कि फुटबॉल की तुलना में क्रिकेट का खेल ज़्यादा देर तक खेला जाता था. 12 साल की उम्र से 26 साल की उम्र तक उन्होंने दक्षिण अफ़्रीकी क्रिकेट में जगह बनाने की कोशिश ज़रूर की लेकिन कामयाब नहीं हुए.

ऐसे में न्यूज़ीलैंड की ओर से उनकी कामयाबी चौंकाने वाली है. लेकिन वह इसके लिए अपना सबकुछ दक्षिण अफ्रीका में छोड़ आए थे. ईएसपीएन क्रिकइंफो को दिए इंटरव्यू में कॉनवे ने कहा था, "मैंने अपनी संपत्ति और कार बेच दी थी. मैं वह चैप्टर बंद करके नया चैप्टर शुरू करना चाहता था."

एक देश से दूसरे देश तक जाकर जगह बनाना इतना आसान भी नहीं होता. कॉनवे के लिए भी चुनौती थी, आर्थिक मुश्किलें थीं. दक्षिण अफ्रीका में उनका परिवार सुविधा संपन्न था, लेकिन न्यूज़ीलैंड में उन्हें किफ़ायत से रहना पड़ा रहा था.

पैसे कमाने के लिए क्लब क्रिकेट खेलने के अलावा उन्होंने सप्ताह में 28 घंटे 10 और 11 साल के बच्चों को कोचिंग देना शुरू किया, इसके लिए उन्हें वेलिंगटन के अलग अलग स्कूलों के चक्कर लगाने होते थे. उनकी पार्टनर ने शुरुआती दिनों में नौकरी करने की कोशिश भी की थी. लेकिन क्रिकेट के मक्का में कॉनवे ने बता दिया है कि उनका संघर्ष बेकार नहीं गया है.

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डेब्यू टेस्ट में दोहरा शतक बनाना कितनी बड़ी बात है, इसका अंदाजा आप इसी से लगा सकते हैं कि अब तक भारत का कोई क्रिकेटर इस करिश्मे को नहीं कर पाया है. टेस्ट डेब्यू करते हुए सबसे ज़्यादा रनों का भारतीय रिकॉर्ड शिखर धवन के नाम है जिन्होंने ऑस्ट्रेलिया के ख़िलाफ़ मोहाली में मार्च, 2013 में 187 रनों की पारी खेली थी.

हालांकि डेवोन कॉनवे ने शुरुआत तो शानदार की है, लेकिन उम्मीद की जानी चाहिए कि वे डेब्यू टेस्ट में दोहरा शतक बनाने वाले बल्लेबाज़ों से बेहतर प्रदर्शन करेंगे.

टेस्ट में डेब्यू करते हुए कॉनवे से पहले छह बल्लेबाज़ों ने दोहरा शतक बनाने का करिश्मा दिखाया है. टेस्ट डेब्यू करते हुए सबसे ज़्यादा रन का रिकॉर्ड इंग्लैंड के आर ई फोस्टर के नाम है, जिन्होंने 1903 में ऑस्ट्रेलिया के ख़िलाफ़ 287 रन बनाए थे, लेकिन उनका टेस्ट करियर आठ टेस्ट और 602 रनों तक चला. दक्षिण अफ्रीका के जैक रूडोल्ड नाबाद 222 रन के साथ दूसरे पायदान पर हैं, जिनका करियर 48 टेस्ट मैचों में 2622 रनों तक चला.

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वेस्टइंडीज़ के लॉरेंस रोव और न्यूज़ीलैंड के मैथ्यू सिनक्लेयर ने डेब्यू करते हुए 214-214 रनों की पारी खेली थी. रोव का करियर 30 टेस्ट मैचों में दो हज़ार रन के आसपास रहा जबकि सिनक्लेयर 33 टेस्ट मैचों में 1700 रन तक नहीं पहुंच पाए.

हाल ही में वेस्टइंडीज़ कायले मेयर्स ने नाबाद 210 रनों की ज़ोरदार पारी खेली थी लेकिन अभी उनका करियर महज चार टेस्ट मैचों तक पहुंचा है. डेब्यू करते हुए टेस्ट क्रिकेट में दोहरा शतक लगाने का करिश्मा कॉनवे से ठीक पहले मेयर्स ने ही किया था.

इस सूची में नाबाद 201 रनों के साथ शामिल श्रीलंकाई बल्लेबाज़ ब्रैंडन कुरूप्पु महज चार ही टेस्ट खेल पाए और इसमें उन्होंने कुल मिलाकर 320 रन बनाए.

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