सिर की चोट खेल दुनिया के लिए कितना बड़ा 'सिरदर्द'?-दुनिया जहान

एरन हर्नानडेज़

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इमेज कैप्शन, आत्महत्या के पांच माह बाद जब एरन हर्नानडेज़ के दिमाग की जांच की गई तो पाया गया कि वो क्रॉनिक ट्रॉमेटिक एन्सेफ्लोपैथी यानी सीटीई से पीड़ित थे.
    • Author, टीम बीबीसी हिन्दी
    • पदनाम, नई दिल्ली

अमेरिका के मैसाचुसेट्स की एक जेल के अधिकारी वो तारीख़ शायद ही भूल पाएँगे. 19 अप्रैल 2017. तड़के चार बजे जेल में हलचल शुरू हो गई. 

फ़ुटबॉल स्टार रहे एरन हर्नानडेज़ का जिस्म जेल की उनकी सेल में एक बेडशीट से लटका हुआ था. 

27 वर्ष के एरन अपने दोस्त ऑडिन लॉयड की हत्या के मामले में उम्र क़ैद की सज़ा काट रहे थे.

मौत के पाँच महीने बाद उनके दिमाग़ की जाँच की गई और पाया गया कि वो क्रॉनिक ट्रॉमेटिक एन्सेफ्लोपैथी यानी सीटीई से पीड़ित थे. ये ऐसी बीमारी है जिसमें दिमाग़ घिसने लगता है. बीमारी की वजह सिर में बार-बार लगने वाली चोट है.

इस बीमारी से जूझने वाले लोगों के लिए अपने मनोवेग, भावनाओं के उतार-चढ़ाव और ग़ुस्से पर क़ाबू पाने में मुश्किल होती है. इसे लेकर ही कन्कशन को गंभीरता से लिया जा रहा है.

सिर से फुटबॉल मारने की कोशिश करता एक खिलाड़ी

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इमेज कैप्शन, कन्कशन दिमाग में लगी चोट है, जिसकी वजह सिर में लगा कोई झटका या आघात होती है

चिंता बढ़ाने वाली चोट?

न्यूरो साइंटिस्ट डॉक्टर क्रिस नोविन्स्की के मुताबिक, "कन्कशन दिमाग़ में लगी चोट है. जिसकी वजह होती है सिर में लगा कोई झटका या आघात. या फिर झटका जिस्म को लगा हो जिसने सिर को झकझोर कर रख दिया हो."

माना जाता है कि इस चोट का असर कुछ समय के लिए रहता है, लेकिन कई बार ये गंभीर भी हो सकती है. इससे जुड़ी चिंता सिर्फ़ अमेरिकी फ़ुटबॉल की तक सीमित नहीं हैं. रग्बी, बॉक्सिंग और फुटबॉल सरीखे कई खेलों में इसे लेकर लगातार फिक्र बढ़ रही है.

क्रिस बताते हैं कि इससे दिमाग़ के काम करने का तरीक़ा बदल जाता है. कई बार ये बदलाव 'रासायनिक और मेटाबॉलिक स्तर पर' होते हैं. लेकिन कई बार दिमाग़ की बनावट को भी नुक़सान होता है. इससे सोच, समझ और दुनिया के बारे में राय तक बदल जाती है.

क्रिस नोविन्स्की कहते हैं, "ज़्यादातर मामलों में कुछ सेकेंड या मिनट के अंदर बदलाव नज़र आने लगते हैं. कुछ मामलों में दिक्कत की जानकारी कुछ घंटों या कुछ दिनों के बाद हो पाती है. जब आपकी ऐसी कोई टक्कर होती है तो आपका शरीर इससे उबरने की कोशिश करता है. ऐसे में आपको दिक्कत का अंदाज़ा तुरंत नहीं हो पाता है."

क्रिस नोविन्स्की ने भी ऐसा झटका खाया था. साल 2001 से 2003 के बीच वो पेशेवर पहलवान थे. वो वर्ल्ड रेसलिंग एंटरटेनमेंट यानी डब्लूडब्लूई के साथ जुड़े हुए थे. वो क्रिस हार्वर्ड के नाम से लड़ते थे.

क्रिस बताते हैं कि जून 2003 में लगी चोट के बाद वो 'पोस्ट कन्कशन सिंड्रोम' का शिकार हो गए. चोट की वजह से उन्हें संन्यास लेना पड़ा. लेकिन, इसके बाद वो सिर की चोट की वजह से पेशेवर खिलाड़ियों पर होने वाले असर के अध्ययन में जुट गए.

खिलाड़ी

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इमेज कैप्शन, अमेरिका में नेशनल फुटबॉल लीग यानी एनएफ़एल ने 1990 के दशक में कन्कशन समस्या पर ध्यान देना शुरू किया.

अमेरिकी लीग ने कराई जाँच

क्रिस नोविन्स्की बताते हैं, "अमेरिका में नेशनल फुटबॉल लीग यानी एनएफ़एल ने 1990 के दशक में कन्कशन समस्या पर ध्यान देना शुरू किया. उस वक़्त एनएफ़एल के तीन आला खिलाड़ियों का करियर सिर की चोट की वजह से ख़त्म हो गया था. एनएफ़एल ने एक कमेटी बनाई. जिसका नाम था 'माइल्ड ट्रॉमैटिक ब्रेन इंजरी.' उसकी रिसर्च के नतीजों के आधार पर बताया गया कि कन्कशन में दिक्कत की कोई बात नहीं है.

साल 2002 में नाइजीरियन मूल के फॉरेंसिक पैथोलॉजिस्ट डॉक्टर बेनेट ओमालू ने एक ऐसी खोज की, जिसने एनएफ़एल और बाक़ी दुनिया को ध्यान देने के लिए मजबूर किया.

डॉक्टर बेनेट ओमालू को पीट्सबर्ग स्टीलर्स के जाने माने फ़ुटबॉलर माइक वेबस्टर के शव की अटॉप्सी का जिम्मा सौंपा गया था. वेबस्टर अपनी मौत के कई साल पहले से मूड डिसऑर्डर और डिप्रेशन जैसी समस्याओं से जूझते रहे थे.

उन्होंने कई बार खुदकुशी की कोशिश भी की. जाँच के दौरान उनके दिमाग़ की वो स्थिति दिखी, जो सबसे पहले मुक़्केबाज़ों में देखी गई थी. इसे डिमेंशिया प्यूजिलिस्टिका कहा जाता है. इस बीमारी को अब सीटीई के तौर पर पहचाना जाता है. डॉक्टर ओमालू की इस खोज के नतीजे तीन साल बाद 'न्यूरोसर्जरी' नाम के जर्नल में प्रकाशित हुए.

अभिनेता विल स्मिथ के साथ डॉक्टर ओमालू

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इमेज कैप्शन, डॉ. ओमालू के काम पर बनी कन्कशन नाम की फ़िल्म में विल स्मिथ ने डॉ. ओमालू का किरदार निभाया था

रिसर्च पर उठे सवाल

क्रिस नोविन्स्की कहते हैं कि किसी व्यक्ति के ज़िंदा रहते हुए पक्के तौर पर ये जानकारी नहीं हो पाती है कि वो क्रॉनिक ट्रॉमैटिक एनसेफलोपैथी यानी सीटीई से जूझ रहे हैं. डा. ओमालू की रिसर्च को एनएफ़एल ने ख़ारिज कर दिया. 

एनएफ़एल से जुड़े तीन वैज्ञानिकों ने डॉक्टर बेनेट ओमालू के शोध की धज्जियां उड़ाने की कोशिश की. इस बीच डॉक्टर ओमालू को अध्ययन करने के लिए फ़ुटबॉल खिलाड़ी टेरी लॉन्ग का दिमाग़ मिला. लॉन्ग की मौत हुई तो उनकी उम्र 45 साल थी. इस बार भी जाँच के नतीजे वैसे ही थे.

डॉक्टर ओमालू के काम को आधार बनाकर एक फ़िल्म बनी. जिसका नाम था 'कन्कशन'. इस फ़िल्म में अभिनेता विल स्मिथ ने डॉक्टर ओमालू का किरदार निभाया था.

ऐसी तमाम घटनाओं से प्रभावित होकर डॉक्टर क्रिस नोविन्स्की ने 'बोस्टन यूनिवर्सिटी सीटीई सेंटर' स्थापित किया. एरन हर्नानडेज़ के सीटीई पीड़ित होने की जानकारी भी इसी सेंटर पर हुई थी.

चिकित्सकीय सबूत मिलने पर साल 2012 में साढे चार हज़ार से ज़्यादा पूर्व खिलाड़ियों ने एनएफ़एल पर मुक़दमा किया. उनमें से एक हरेक ने दावा किया कि सिर में लगी चोट की वजह से वो स्वास्थ्य संबंधी गंभीर स्थिति से जूझ रहे हैं.

साल 2014 में एनएफ़एल कोर्ट के बाहर समझौते के लिए तैयार हो गई. इस समझौते के लिए 76 करोड़ 50 लाख डॉलर देने पर सहमति बनी और एनएफ़एल को कई बदलाव करने पड़े.

चोट के बाद मैदान पर गिरा खिलाड़ी

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इमेज कैप्शन, एनएफ़एल ने खेल के दौरान कन्कशन और सीटीई पर रोक लगाने के लिए क़रीब 50 बदलाव किए हैं

क्रिस नोविन्स्की बताते हैं, "एनएफ़एल ने खेल के दौरान स्वास्थ्य और सुरक्षा से जुड़े करीब 50 बदलाव किए हैं. सबका मक़सद है कन्कशन और सीटीई पर रोक लगाना. इसके लिए प्रोटोकॉल तय हुए हैं. हर मैच के दौरान 30 पेशेवर स्वास्थ्यकर्मी होते हैं. स्काई बॉक्स में ऐसे लोग मौजूद होते हैं, जो ये देखते रहते हैं कि कहीं किसी खिलाड़ी में कन्कशन के संकेत तो नहीं दिख रहे. प्रैक्टिस के दौरान सिर से हिट करने पर रोक लगा दी गई है." 

हालांकि, डॉक्टर क्रिस नोविन्स्की की राय है कि अगर भविष्य के पेशेवर खिलाड़ियों की तकदीर बदलनी है तो अभी काफ़ी कुछ किया जाना बाक़ी है. क्योंकि एक ज़ोर का झटका किसी खिलाड़ी के करियर और जीवन की दिशा बदल सकता है.

निकोला व्हाइट

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इमेज कैप्शन, 2018 के कॉमनवेल्थ खेलों के पहले एक मैच के दौरान एक खिलाड़ी से टक्कर में निकोला व्हाइट के सिर पर चोट लग गई थी

ज़ोर का झटका

ऐसा हॉकी खिलाड़ी निकोला व्हाइट के साथ हो चुका है. वो साल 2016 के ओलंपिक में गोल्ड जीतने वाली ब्रिटेन की हॉकी टीम का हिस्सा थीं.

निकोला उस जीत को याद करते हुए कहती हैं, "होली (वेब) ने जब आख़िरी गोल किया, तो हम सब उनकी तरफ दौड़ पड़े. अगर आप उन भावनाओं को जमा कर बाज़ार में रखें तो लाखों कमा सकते हैं, क्योंकि ये दुनिया का सबसे अच्छा अनुभव है."

साल 2018 के कॉमनवेल्थ खेलों के पहले एक मैच में निकोला की विरोधी टीम की एक खिलाड़ी के साथ टक्कर हो गई. चोट सिर पर लगी. निकोला बताती हैं कि उनकी चोट कन्कशन बताई गई. 

निकोला बताती हैं, "मुझे सिरदर्द रहने लगा. रोशनी और आवाज़ से दिक्कत होने लगी. मुझे संतुलन बनाने में परेशानी होने लगी. ये बहुत बुरा अनुभव था और ये लगातार महसूस हो रहा था."

होली वेब

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बनी हुई है दिक्कतें

उस हादसे को तीन साल बीत चुके हैं. सिर की चोट का इलाज करने वाले विशेषज्ञों से उपचार कराने के बाद भी दिक्कतों के तमाम लक्षण बने हुए हैं.

निकोला व्हाइट बताती हैं, "मुझे बताया गया कि मैं पोस्ट कन्कशन माइग्रेन से जूझ रही हूँ. इसकी वजह सिर में लगी चोट को बताया गया. उस एक पल के झटके ने मेरी ज़िंदगी में काफ़ी कुछ बदल दिया. मैं आला दर्जे की एथलीट थी. मेरे पास वो सबकुछ था, जो किसी को ख़ुशी देता है. ज़िंदगी का एक मक़सद था. लेकिन चोट के बाद अचानक मैं वो महिला नहीं रह गई."

निकोला बीते साल मैदान पर लौटीं, लेकिन जल्दी ही उनकी दिक्कतें दोबारा उभर आईं. उनके करियर पर फिर ब्रेक लग गया. ब्रिटेन के हॉकी प्रोग्राम से भी उनका नाम हटा दिया गया. अब वो तमाम मुश्किलों से जूझ रही हैं

निकोला व्हाइट कहती हैं, "मुझे दोबारा ये पता करना है कि मेरे लिए क्या महत्वपूर्ण है? मैं आगे कैसे बढूँगी? मेरी ज़िंदगी में कैसे फिर से कुछ भी पॉजिटिव होगा? मेरे साथ हुए हादसे, मेरी बेचैनी और दिमाग़ी तंदरुस्ती से जुड़े कई मुद्दे हैं. क्या मैं उन पर जल्दी काबू पाते हुए मैदान में लौट पाऊंगी? क्या मैं अपनी दिक्कतों से पार पाते हुए खेल पाऊंगी? यक़ीनी तौर पर मैं नहीं बता सकती हूं." 

निकोला को जिस तरह की चोट लगी, उस तरह की दुर्घटना की संभावना हॉकी में बहुत कम होती है. हालांकि, वो चाहती हैं कि इस घटना से सबक लिए जाएँ.

फुटबॉल खिलाड़ी

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इमेज कैप्शन, फ़ुटबॉल खिलाड़ियों में दिल की बीमारी और कैंसर की तुलना में डिमेंशिया से होने वाली मौत का ख़तरा कहीं ज़्यादा पाया गया

अहम शोध

ग्लासगो यूनिवर्सिटी के न्यूरोपैथोलॉजी विभाग के सलाहकार विलियम स्टीवर्ट ने दुनिया को बताया है कि सिर पर बार-बार लगने वाले झटकों का नुक़सान क्या है. उन्होंने जो रिसर्च की है उसका शीर्षक है- "फुटबॉल्स इन्फ्लुएंस ऑन लाइफ़ लॉन्ग हेल्थ एंड डिमेंशिया रिस्क."

इस शोध के बारे में विलियम स्टीवर्ट बताते हैं, "हमने पेशेवर फुटबॉल खिलाड़ी रहे क़रीब आठ हज़ार लोगों पर अध्ययन किया. उनकी तुलना क़रीब 23 हज़ार ऐसे लोगों के साथ की, जिनके जन्म का वर्ष लगभग वही था. वो तकरीबन वैसे ही इलाक़ों में रहे हों लेकिन वो कभी पेशेवर फुटबॉल खिलाड़ी न रहे हों. हमने इन समूहों के बीच मौत के कारणों का भी अध्ययन किया और पाया कि फ़ुटबॉल खिलाड़ियों में दिल की बीमारी की दर कम थी. कैंसर से मौत की दर भी कम थी, लेकिन उनमें डिमेंशिया की वजह से होने वाली मौत का ख़तरा कहीं ज़्यादा था. क़रीब-क़रीब साढ़े तीन गुना."

उन्होंने समस्या की जड़ तक पहुँचने की कोशिश की. ये जानने का प्रयास किया कि बाक़ी खेलों के मुक़ाबले फुटबॉल में अलग क्या है और पाया कि फुटबॉल खिलाड़ी सिर से गेंद को बार-बार मारते हैं. ठोस नतीजे पर पहुँचने के लिए उन्होंने एक और रिसर्च की. 

विलियम स्टीवर्ट बताते हैं, "हमने एक दिमाग़ की जाँच की. उसके बाद 20 बार सिर से बॉल को हिट कराया और फिर दिमाग़ की दोबारा जाँच की. हमने पाया कि सिर से गेंद मारने से दिमाग़ पर थोड़ा असर होता है. इससे दिमाग़ की बनावट भी प्रभावित हो सकती है और इसकी वजह से लंबे वक़्त तक बनी रहने वाली दिक्कतें पैदा हो सकती हैं."

सिर से गेंद मारते खिलाड़ी

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इमेज कैप्शन, इन छोटे-छोटे झटकों को 'सब कन्केसिव हेड इम्पैक्ट' नाम दिया गया है

दिमाग में क्या दिखा?

इन छोटे- छोटे झटकों को नाम दिया गया- 'सब कन्कशिव हेड इम्पैक्ट.' इस बीच डॉक्टर विलियम स्टीवर्ट और उनकी टीम ने पूर्व फुटबॉल खिलाड़ियों के दिमाग़ की जाँच भी की.

इंग्लैंड और मैनचेस्टर यूनाइटेड के चर्चित खिलाड़ी रहे नॉबी स्टाइल्स भी उनमें से एक थे. नॉबी 1966 में वर्ल्ड कप जीतने वाली टीम के सदस्य भी रहे थे. उन्हें फुटबॉल इतिहास के सबसे मज़बूत खिलाड़ियों में गिना जाता है. उनकी मौत प्रोस्टेट कैंसर और डिमेंशिया की वजह से हुई.

विलियम स्टीवर्ट बताते हैं, "नॉबी डिमेंशिया से पीड़ित थे. ये क्रॉनिक ट्रॉमेटिक एन्सेफ्लोपैथी यानी सीटीई था. हमने दिमाग़ की बार-बार जाँच की. हमने पाया कि दिमाग़ में टाऊ प्रोटीन जमा था. नॉबी के केस में ये एक अलग सी बात दिखी. ऐसा हम सिर्फ़ उन लोगों के साथ देखते हैं, जिनके दिमाग़ पर चोट लगी हो."

उन्होंने ये भी कहा कि फुटबॉल खेलने वाली महिला खिलाड़ियों में कन्कशन का जोखिम पुरुष खिलाड़ियों के मुक़ाबले दोगुना होता है. वो ये भी कहते हैं कि फुटबॉल में कन्कशन की समस्या को लेकर दुनिया के दूसरे हिस्सों में बहुत कम रिसर्च हुआ है.

महिला बॉक्सर

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इमेज कैप्शन, बॉक्सिंग में कन्कशन पर सहजता से बात नहीं की जाती

रिंग में चुनौती

कन्कशन की चुनौती से मुक़ाबले के लिए फुटबॉल जगत खड़ा हो रहा है. लेकिन कुछ और ऐसे खेल हैं, जहाँ कन्कशन कहीं ज़्यादा बड़ी समस्या है.

पूर्व मुक्केबाज़ ट्रिस डिक्सन कहते हैं, "बॉक्सिंग के नियमों में कन्कशन के बारे में लिखा हुआ है. मान लीजिए कि आप रिंग में चित हो जाते हैं. वहाँ आपको 10 सेकेंड के अंदर उठना होता है. वहाँ इस बात की संभावना भी होती है कि आप कन्कशन की स्थिति में हों. इसे खेल के नियमों में दर्ज किया गया है."

ट्रिस डिक्सन पत्रकार हैं और खेल से जुड़े मुद्दों पर लिखते हैं. हाल में उनकी नई किताब आई है- 'डैमेज : द अनटोल्ड स्टोरी ऑफ़ ब्रेन ट्रामा इन बॉक्सिंग'. उन्होंने बार-बार होने वाले कन्कशन, सीटीई और हद से ज़्यादा हिंसक बर्ताव के बीच के सिरों को जोड़ा है.

ट्रिस डिक्सन कहते हैं, "बॉक्सिंग में इस बारे में सहजता से बात नहीं की जाती. साल दर साल ऐसी घटनाएँ सामने आती रही है. कार्लोस मोनज़ोन ने अपनी बीवी की जान ले ली. एडविन वलेरो ने भी यही किया. डेल फोनटैन और बिली पापका ने भी उन्हीं की जान ले ली, जिन्हें वो प्यार करते थे. मैं जितना अंदर दाखिल हुआ, उतनी शिद्दत से महसूस करता गया कि ये तो एक सा ही है. इसे आज सीटीई कहा जा रहा है. पहले उसे पहल पंच ड्रंक सिंड्रोम कहा जाता था. सबसे पहले इसका ज़िक्र 1928 के एक मेडिकल पेपर में हुआ था.

मोहम्मद अली

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इमेज कैप्शन, मोहम्मद अली को उम्र बढ़ने पर न्यूरोलॉजिकल समस्याओं से जूझना पड़ा

ख़तरे में खिलाड़ी

ये पर्चा अमेरिकी पैथोलॉजिस्ट डॉक्टर हैरिस मार्टलैंड ने तैयार किया था. उन्होंने इसका शीर्षक दिया था 'पंच ड्रंक.' डॉक्टर मार्टलैंड के अध्ययन के क़रीब नौ दशक बाद अमेरिका में एक और अध्ययन हुआ. इसका नाम था, 'प्रोफ़ेशनल फ़ाइटर्स ब्रेन हेल्थ स्टडी.'

इस अध्ययन में शामिल रहे विशेषज्ञों ने एक मुक़्केबाज़ को रिंग में लगी चोट और उसके दिमाग़ के घिसने के बीच कड़ी जोड़ी. उनके मुताबिक़, आमतौर पर दिमाग को हुए नुक़सान की जानकारी रिंग में हुए मुक़ाबलों के करीब पाँच साल बाद हो पाती है.

इस अध्ययन में वो वजह जानने का भी प्रयास किया गया, जिनके चलते मुक़्केबाज़ों में दिमाग़ी दिक्कतें सामने आने की संभावना ज़्यादा होती है.

ट्रिस डिक्सन कहते हैं, "मोहम्मद अली एक आला मुक़्केबाज़ थे. उन्होंने जो फ्रेज़र के ख़िलाफ़ तीसरे मुक़ाबले में जीत हासिल की. वो तभी रिटायर होना चाहते थे. लेकिन उसके बाद वो लैरी होम्स, ट्रेवर बर्बिक और लियोन स्पिंक्स के ख़िलाफ़ लड़े. उन्हें सैंकड़ों मुक्के और झेलने पड़े. अगर आप इतिहास देखें तो पाएंगे कि हेनरी आर्मस्ट्रांग, सुगर रे रॉबिन्सन, मोहम्मद अली और जो लुइस... इन सभी को उम्र बढ़ने पर न्यूरोलॉजिकल समस्याओं से जूझना पड़ा."

मोहम्मद अली

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इमेज कैप्शन, मोहम्मद अली अपने पीछे एक विरासत छोड़कर गए हैं

सवाल ये भी है मुक़्केबाज़ी के खेल में खिलाड़ियों को दिमागी चोट से बचाने के लिए ज़्यादा कुछ क्यों नहीं किया गया? ट्रिस का कहना है कि मुक़्केबाज़ी के खेल में नियंत्रण रखने वाली कोई केंद्रीय संस्था नहीं है. वो ये भी कहते हैं कि खेल से जुड़े तमाम लोग कड़वी सच्चाई की तरफ देखते ही नहीं हैं. वर्ल्ड मेडिकल एसोसिएशन और ब्रिटेन की मेडिकल एसोसिएशन बीते कई सालों से बॉक्सिंग के खेल पर पाबंदी लगाने की मांग करते रहे हैं. लेकिन ट्रिस डिक्सन इस मांग से सहमत नहीं हैं. 

वो कहते हैं, "मोहम्मद अली अपने पीछे एक विरासत छोड़कर गए हैं. दोबारा मौक़ा मिलने पर भी वो यही करते. मैंने अपनी किताब के लिए महान मुक्क़ेबाज़ एरन प्रायर की पत्नी से बात की. उनका कहना था कि अगर एरन होते तो कोई बदलाव नहीं चाहते. ये लोग अपनी ज़िंदगी ऐसे ही जीना चाहते."

अब सवाल ये है कि आगे का रास्ता क्या होगा? ये वैज्ञानिक अनुसंधान पर निर्भर करेगा. अगर किसे के जीते-जी ही सीटीई की जानकारी हो सकी तो खेलों की दुनिया में क्रांतिकारी बदलाव आ सकता है. तब तक खिलाड़ियों और खेल से जुड़े तमाम लोगों को ऐसे हादसों को लेकर बेहद सतर्क रहना होगा. 

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