दिव्या काकरान यानी एशियाई कुश्ती की नई चैंपियन के संघर्ष की कहानी

दिव्या काकरान अपने पिता के साथ

इमेज स्रोत, Surajveer Sen

इमेज कैप्शन, दिव्या काकरान अपने पिता के साथ
    • Author, आदेश कुमार गुप्त
    • पदनाम, खेल पत्रकार, बीबीसी हिंदी के लिए

"अब तो हर जगह टीवी, डिजिटल मीडिया से से लेकर अख़बारों तक सब जगह दिव्या काकरान का नाम छाया हुआ है, यह तो हम सोच भी नही सकते थे, देखो जहां साक्षी मलिक जैसी ओलंपिक पदक विजेता का रजत और विनेश फोगाट का रजत पदक और बजरंग पूनिया का रजत पदक आया वहां इसने स्वर्ण पदक जीतकर कमाल कर दिया. सबसे बड़ी बात दिव्या ने अपने चारों मुक़ाबले विरोधियो को चित करके जीते."

यह कहना है बीते महीने एशियन कुश्ती चैंपियनशिप में 68 किलो भार वर्ग में स्वर्ण पदक जीतने वाली भारत की महिला पहलवान दिव्या काकरान के पिता सूरजवीर सेन का.

दिव्या काकरान ने साल 2017 में दिल्ली में हुई एशियन कुश्ती चैंपियनशिप में रजत पदक जीता. इसी साल वह नेशनल चैंपियन भी बनी. और इसी साल दिव्या ने राष्ट्रमंडल कुश्ती चैंपियनशिप में स्वर्ण पदक भी जीता.

साल 2018 में दिव्या काकरान ने जकार्ता में हुए एशियाई खेलों और गोल्ड कोस्ट ऑस्ट्रेलिया में हुए राष्ट्रमंडल खेलों में भी कांस्य पदक जीता.

वैसे दिव्या काकरान तब सुर्खियों में आई जब उनका एक वीडियो वायरल हुआ जिसमें उन्होंने दिल्ली से मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल को उनके ही सामने खरी-खरी सुनाई.

राष्ट्रमंडल कुश्ती चैंपियनशिप में स्वर्ण पदक जीतने के बावजूद कोई मदद नहीं मिलने से दिव्या निराश थी.

दिव्या काकरान अपने पिता के साथ

इमेज स्रोत, Surajveer Sen

इसके बाद उन्होंने उत्तर प्रदेश से खेलने का निर्णय लिया जिस समय दिव्या के पिता से दोबारा बात हुई तब वह कार ड्राइव रहे थे, और उनका कहना था कि यह कार दिव्या ने ही उन्हें दी है.

अब उनका सबसे बड़ा सपना दिव्या को टोक्यो ओलंपिक में पदक जीतते देखना है, लेकिन उसके लिए दिव्या को पहले क्वालिफाइंग टूर्नामेंट खेलकर टिकट हासिल करना होगा.

फिलहाल दिव्या रेलवे में सीनियर टीटी है और शाहदरा में कार्यरत है. पिछले साल ही उन्हें नौकरी मिली है.

लेकिन दिव्या की कामयाबी का सफर इतना आसान नही था.

दिव्या काकरान के पिता सूरजवीर सेन ने बीबीसी से ख़ास बातचीत में विस्तार से अपने संघर्ष की कहानी सुनाई.

लाइन

हमारा गांव पुरबालियान ज़िला मुज़्ज़फ़रनगर उत्तर प्रदेश में है. मेरा सारा बचपन वहीं बीता. मेरे पिताजी राजेंद्र सिंह गांव में ही पहलवानी करते थे. वह गांव में छोटे-मोटे दंगल भी लड़ते थे. मैंने भी छोटी-मोटी पहलवानी की, लेकिन मेरे अंदर एक जज़्बा था कि अगर मैं बड़ा पहलवान नही बना सका तो क्या अपने बच्चों को ज़रूर बनाऊंगा."

घर की आर्थिक स्थिति मेरा बोझ उठाने की नही थी. पिताजी सुगर मिल में मजदूरी किया करते थे. परिवार में हम दो भाई हैं.

गांव में अच्छे अखाड़े और सुविधाएं नही मिली जिससे मैं बस गांव का पहलवान बनकर रह गया, आगे नही बढ़ सका, कोई मेडल भी नही मिला.

उसके बाद गांव छोड़ दिया और साल 1987 में दिल्ली के गोकुलपुरी में रहने लगा.

वहां राजकुमार गोस्वामी का अखाड़ा है, लेकिन तब वहां भी गद्दों की सुविधा नही थी. वहां केवल मिट्टी का अखाड़ा था. वहां मैं साल 1992 तक रहा और फिर वापस गांव चला गया. तब तक मेरी शादी नही हुई थी.

दिव्या काकरान अपने पिता के साथ

इमेज स्रोत, Surajveer Sen

दो साल बाद दिसंबर 1994 में मेरी शादी हुई. उस समय मेरे पास कोई रोजगार नही था. उसके बाद तीन बच्चे हुए.

दो लड़के और एक लड़की दिव्या काकरान. दिव्या बड़े लड़के देव के बाद हुई.

छोटे बेटे का नाम दीपक है. गांव में बड़े लड़के को पहलवानी सिखानी शुरू की तो साथ ही दिव्या भी जाने लगी.

लेकिन गांव में कोई अच्छा अखाड़ा नही था. इसके साथ ही वहां लड़की को कोई भी पहलवानी नही करने देता. इन सब बातों को ध्यान में रखकर एक बार फिर दिल्ली आना पड़ा.

तीनों बच्चे गोकुलपुरी के सरकारी प्राइमरी स्कूल जाने लगे. जब दिव्या आठ साल की हो गई तो उसे अखाड़े में ले गया.

वहां दिव्या सब बच्चों से अलग 1000-1500 दंड लगाने लगी. यह दूसरो के लिए अचंभे की बात थी.

उन्हीं दिनों अखाड़े के कोच अजय गोस्वामी की नज़र दिव्या पर पड़ी.

दिव्या काकरान अपने पिता के साथ

इमेज स्रोत, Surajveer Sen

अजय गोस्वामी पटियाला से एनआईएस कोचिंग लेकर आए थे.

उन्होंने कहा कि दिव्या को तैयार करते हैं.

उन दिनों हरियाणा में लड़कियों ने कुश्ती में जगह बनानी शुरू कर दी थी. लेकिन समस्या तब खड़ी हो गई जब उसी अखाड़े के एक और कोच राजकुमार गोस्वामी ने विरोध शुरू कर दिया कि इस अखाड़े में लड़की पहलवानी नही कर सकती. दूसरे पहलवान भी विरोध में खड़े हो गए. ऐसे में अजय गोस्वामी में समझाया कि यह तो अभी बच्ची है, इसे पहलवानी करने दो.

उसके बाद दिव्या दिल्ली, नोएडा, गाज़ियाबाद, सोनीपत और दूसरे गांव-देहात के दंगल में लड़ने लगी. वहां भी कोई दूसरी लडकी तो होती नही थी, बस किसी तरह कह-सुन के किसी लड़के से कुश्ती करा देते थे. लोगो के लिए यह एक मनोरंजन था कि लड़की लड़के से लड़ रही है.

लेकिन दिव्या जीत जाती थी क्योंकि उसकी ट्रेनिंग बड़ी सख्त होती थी. लोग खुश होकर पांच, दस, पचास, सौ रूपये ईनाम में देते थे.

इससे दो-तीन हज़ार रूपये इक्कठे हो जाते थे. कुछ पैसे दंगल के आयोजक भी दे देते. बड़ा लड़का भी कुश्ती लड़ता था पर उसे इतने पैसे नही मिलते थे. घर के हालात ठीक नही थे.

दिव्या काकरान अपने पिता के साथ

इमेज स्रोत, Surajveer Sen

दिव्या की मां संयोगिता घर पर पहलवानों के लगोट सिलने लगीं और मैं उन्हे बेचने अखाड़ो में जाता था.

किसी तरह बस खर्च निकलता था. गांव की तरह दिल्ली में गाय-भैंस नही रख सकते थे. दिव्या को थैली का दूध पिलाते थे.

दिव्या बस इसी से संतुष्ट थी कि दूध मिल रहा और अखाड़े जाना हो रहा है.

साल 2011 में स्कूल नेशनल खेल हरियाणा के नरवाणा में हुए. वहां दिव्या ने पहली बार कांस्य पदक जीता.

इसके बाद लड़के की कुश्ती छुड़वा दी और सोचा कि अब बस दिव्या ही कुश्ती करेगी. इसके बाद दिव्या ने 17 स्वर्ण पदक समेत दिल्ली को 60 पदक दिलवाए.

दिव्या काकरान अपनी माँ के साथ

इमेज स्रोत, Surajveer Sen

इमेज कैप्शन, दिव्या काकरान अपनी माँ के साथ

दो साल की मेहनत और कामयाबी के बाद साल 2013 से दिव्या ने अपने 68 किलो भार वर्ग में अन्य किसी महिला पहलवान को अपने पास नही आने दिया.

दिव्या के खेल में तब उभार आया जब उसने गुरू प्रेमनाथ अखाड़े में कोच विक्रम कुमार से प्रशिक्षण लेना शुरू किया. वहां लडकियों के लिए कोचिंग की विशेष सुविधा है.

साल 2013 में दिव्या ने भारत के लिए खेलते हुए मंगोलिया में हुए अंतराष्ट्रीय कुश्ती टूर्नामेंट में पहली बार रजत पदक जीता.

उसके बाद तो दिव्या का भारत के लिए खेलने का सिलसिला ऐसा चला कि रुका ही नही.

कामयाबी और मेहनत के बीच संघर्ष चलता रहा. पैसे की किल्लत से तब छुटकारा मिला जब साल 2015 में स्थानीय सांसद मनोज तिवारी ने दो लाख रूपये का चेक घर आकर दिया.

उसके कुछ दिनों बाद ही मनोज तिवारी ने ही एक बैंक्वट हॉल में भव्य समारोह आयोजित कर एक लाख रूपये और दिये. इससे पहले हमने कभी इतनी बड़ी रक़म नही देखी थी.

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)