विश्व चैंपियन मैरी कॉम को किस बात का पछतावा है?

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- Author, प्रभात पांडेय
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
छह विश्व चैंपियन ख़िताब, एक ओलंपिक कांस्य, एशियाई गेम्स और कॉमनवेल्थ गेम्स में एक-एक स्वर्ण पदक.इतनी उपलब्धियों के बावजूद भारतीय महिला बॉक्सर एमसी मैरी कॉम को एक मलाल है.
वो मलाल है ओलंपिक में स्वर्ण पदक न जीत पाने का.
रूस में चल रही महिला विश्व बॉक्सिंग चैंपियनशिप के लिए रवाना होने से पहले बीबीसी से ख़ास बातचीत की.
मैरी कॉम ने कहा, "मैं छह बार विश्व चैंपियनशिप का ख़िताब जीत चुकी हूं लेकिन लगता है इस टूर्नामेंट की कोई वैल्यू ही नहीं है. अख़बार में भी छोटे से कॉलम में वो ख़बर छप कर रह जाती है. मेरा मक़सद है ओलंपिक में स्वर्ण पदक जीतना."
मैरी कॉम महिला विश्व बॉक्सिंग चैंपियनशिप में 51 किलोग्राम वर्ग में अपनी दावेदारी पेश कर रही हैं.
आठ अक्टूबर से वो अपने अभियान की शुरुआत करेंगी. अगर वो ये ख़िताब जीत जाती हैं तो टोक्यो ओलंपिक के लिए क्वालिफ़ाई करने की उनकी संभावनाएं बहुत बढ़ जाएंगी.
उन्होंने कहा, "अब तो फिर भी महिला बॉक्सिंग के बारे में मीडिया में ख़बरें आने लगी हैं. पहले तो मैंने इतने बॉक्सिंग ख़िताब जीते किसी को पता ही नहीं चलता था."
मैरी कॉम के जीवन में सबसे बड़ा लम्हा तब आया था जब उन्होंने 2012 में लंदन में हुए ओलंपिक में कांस्य पदक जीता था.
ये पहली बार था जब महिला बॉक्सिंग को ओलंपिक में शामिल किया गया. तब वो सेमीफ़ाइनल में ब्रिटेन की निकोला एडम्स से हार गई थीं और कांस्य पदक से संतोष करना पड़ा था.
मैरी कॉम पहले 48 किलोग्राम वर्ग के मुक़ाबलों में हिस्सा लेती थीं लेकिन ओलंपिक में 51 किलोग्राम भार वर्ग से ही मुक़ाबलों की शुरुआत होती है. इस वजह से उन्होंने अपना वज़न बढ़ाकर 51 किलोग्राम भार वर्ग में हिस्सा लेना शुरू किया.
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गोल्ड मेडल पर टिकी हैं निगाहें
अब मैरी कॉम का लक्ष्य अगले साल टोक्यो ओलंपिक में भारत के लिए गोल्ड मेडल जीतना है.
वो कहती हैं, "ओलंपिक पोडियम के अनुभव की बात ही अलग होती है. उसमें कॉम्पटीशन का स्तर बहुत ऊंचा होता है. मैं पूरी कोशिश करूंगी कि भारत को उसमें गोल्ड दिला सकूं."
मैरी कॉम कहती हैं कि मुझे इस बात की ख़ुशी है कि अब भारत में लोग महिला बॉक्सिंग के प्रति जागरुक होने लगे हैं और हर स्तर पर लड़कियां इसमें आ रही हैं जो बहुत ख़ुशी की बात है.
वो अपनी कामयाबी का पूरा क्रेडिट अपने परिवार और पति को देती हैं.
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