पटका नहीं उतारा तो किए गए विश्व चैंपियनशिप से बाहर

जस्सा पट्टी, कुश्ती, विश्व कुश्ती चैंपियनशिप, जसकंवर सिंह
    • Author, रविंदर सिंह रॉबिन
    • पदनाम, बीबीसी हिंदी डॉट कॉम के लिए

पंजाब के पारंपरिक खेल दंगल (कुश्ती) के जरिए वहां के युवाओं के लिए उनके पेशेवर करियर को तराशने में जसकंवर सिंह उर्फ जस्सा पट्टी पंजाबी युवाओं के लिए उम्मीदों की किरण हैं.

पंजाब के सीमावर्ती इलाके तरणतारण में जन्मे जसकंवर मीडिया में आने से बाद अब पहले से अधिक व्यस्त हो गए हैं.

कई लोगों के नायक और रोल मॉडल, जस्सा पट्टी जहां भी दंगल (कुश्ती) के लिए जाते हैं वहां उनका मालाओं के साथ तहे दिल से स्वागत किया जाता है, सभी उम्र के लोग अपने हीरो के साथ सेल्फी लेने की इच्छा जताते हैं. उन्होंने न केवल अपना एक सफल करियर बनाया है बल्कि दूसरों को एक ऐसा रास्ता दिखाया है जिसका वो अनुसरण कर सकें.

अपने प्रशंसकों के साथ बातचीत का श्रेय स्थानीय दंगल को देते हुए जस्सा कहते हैं कि पारंपरिक दंगल ने न केवल उन्हें जीविका कमाने में मदद की है बल्कि इसके ज़रिए वो अपने प्रशंसकों से लगातार संपर्क में भी बने रहते हैं, हालांकि सरकारी स्तर पर कुश्ती का चैंपियन बनने से भी नाम मिलता है लेकिन इसकी अपनी सीमाएं हैं.

पंजाब के इस नामालूम पहलवान ने तब प्रसिद्धि को छुआ जब उन्होंने तुर्की में विश्व कुश्ती चैंपियनशिप के दौरान अपने पहले ही अंतरराष्ट्रीय मुक़ाबले में यूक्रेन के पहलवान के ख़िलाफ़ सिर को ढकने वाला पटका उतार कर लड़ने से इंकार कर दिया और इसकी वजह से वो टूर्नामेंट में आगे नहीं खेल सके.

झटपट फ़ैसला

जस्सा कहते हैं, "28 जुलाई को यूक्रेन के पहलवान के ख़िलाफ़ मुकाबले के लिए जब मैं उतरा तो आयोजकों ने मुझसे कहा कि मैं पटका उतारने के बाद ही मैच खेल सकता हूं, जिसे मैंने इंकार कर दिया और यह फ़ैसला लेने में मुझे केवल एक सेकेंड लगा."

"मैंने अपना सिर ढकने के लिए बस एक कपड़ा ही तो बांध रखा था ना कि प्लास्टिक, लोहा या लकड़ी, जिससे मेरे प्रतिद्वंद्वी को कोई नुकसान पहुंचता. मुझे पटके के साथ खेलने की अनुमति दी जानी चाहिए थी."

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क्या है जस्सा की दिनचर्या

जस्सा पट्टी कहते हैं, "पिछले साल मैं 80 मुकाबलों में उतरा और इस दौरान 45 लाख रुपये कमाए लेकिन खेल के दौरान शुरू से ही उन्होंने पटका नहीं उतारा या इवेंट के आयोजकों के निर्देशानुसार महिलाओं की तरह चोटी बांध कर खेले."

"न केवल पूरे राज्य के कुश्ती निकायों की तरफ से उनको मिलने वाले कुश्ती के निमंत्रण में अचानक वृद्धि हुई है बल्कि आयोजक इस दौरान उनके समर्थकों को संबोधित भी करते हैं.

अपनी दिनचर्या का ब्यौरा देने के दौरान उन्होंने बीबीसी से कहा कि सुबह घर से निकलकर प्रैक्टिस के लिए जिम जाते हैं, इसके बाद पहले से तय दंगलों के लिए विभिन्न गांवों में जाते हैं.

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जस्सा पट्टी की लोकप्रियता इतनी बढ़ गई है कि जब भी वो कुश्ती ख़त्म करते हैं उनके कुछ जूनियर पहलवान चारों ओर से उन्हें घेर लेते हैं और गांव के कुंए से निकाले गए ताज़ा पानी से स्नान कराते हैं तो अन्य अपने 'गुरु' के लिए बादाम शेक बनाकर लाते हैं.

वो कहते हैं, "मैं अपने प्रशंसकों को निराश नहीं करता और उनके मन के मुताबिक वो सब करने देता हूं जो वो चाहते हैं, अक्सर उन्हें पहलवानी के गुर सिखाता हूं."

नहाने के बाद जस्सा पट्टी पटका की जगह पगड़ी बांध लेते हैं.

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कुश्ती के दौरान पटका क्यों बांधते हैं जस्सा

उन्होंने कभी यह सोचा नहीं था कि पटका नहीं उतारने को इतना तूल दिया जाएगा और कई मीडिया कंपनी इंटरव्यू के लिए उनके पीछे पीछे भागेगी.

वो कहते हैं, "मैं कुश्ती के दौरान पटका पहनता हूं ताकि मेरे बाल चेहरे और आंखों के सामने न आएं." उन्होंने यह साफ़ किया कि इसके पीछे कोई अंधविश्वास नहीं है.

जब उनसे पूछा गया कि क्या नई पीढ़ी को कुश्ती सिखाने के लिए उन्होंने कोई स्कूल खोला है. तो उन्होंने कहा, "मैं तो खुद ही अभी कुश्ती सीख रहा हूं, मेरा कोई शिष्य नहीं है."

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अंतरराष्ट्रीय पहलवान रह चुके जसकंवर के पिता सलविंदर सिंह कहते हैं कि मुक़ाबले के दौरान पहलवानों को उनके सिर को ढकने की अनुमति होती है क्योंकि इससे प्रतिद्वंद्वी खिलाड़ी को कोई नुकसान नहीं पहुंचता और इसी तरह अपने सिर को ढकने के लिए जसकंवर भी पटका बांधते हैं.

जस्सा ने बीबीसी को बताया कि उनके कोच ने इस मसले (पटका पहनकर खेलने की अनुमति नहीं दिए जाने) को आयोजकों के सामने उठाया था, लेकिन इससे भी इस मामले का हल नहीं निकला. जसकंवर सिंह कहते हैं कि उनके कोच ने अब मामला भारतीय कुश्ती संघ के सामने उठाया है ताकि भविष्य में ऐसी स्थिति पनपने से रोकी जा सके.

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