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कॉमनवेल्थ खेल: हॉकी ने फीकी की भारतीय एथलीटों की चमक
- Author, आदेश कुमार गुप्त
- पदनाम, खेल पत्रकार, बीबीसी हिंदी डॉटकॉम के लिए
बीते रविवार की शाम को ऑस्ट्रेलिया के गोल्ड कोस्ट शहर में भव्य और रंगीन समापन समारोह के साथ ही 21वें राष्ट्रमंडल खेल भी समाप्त हो गए.
एक दो मामलों को छोड़कर कोई ख़ास विवाद भी देखने को नही मिला.
मेज़बान ऑस्ट्रेलिया 80 स्वर्ण, 59 रजत और 59 कांस्य पदक सहित 198 पदकों के साथ पदक तालिका में पहले पायदान पर रहा.
इंग्लैंड 45 स्वर्ण, 45 रजत और 46 कांस्य पदक सहित 136 पदकों के साथ पदक तालिका में दूसरे स्थान पर रहा.
भारत की तीसरा बेहतरीन प्रदर्शन
भारतीय एथलीटों ने भी दमदार प्रदर्शन किया और वह 26 स्वर्ण, 20 रजत और 20 कांस्य पदक सहित 66 पदकों के साथ तीसरे स्थान पर रहा.
यह भारत का राष्ट्रमंडल खेलों के इतिहास का तीसरा सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन है.
इससे पहले भारत ने साल 2010 में दिल्ली में हुए राष्ट्रमंडल खेलों में 38 स्वर्ण, 27 रजत और 36 कांस्य पदक सहित 101 पदक जीते थे.
इसके अलावा साल 2002 में मैनचेस्टर इंग्लैंड में हुए राष्ट्रमंडल खेलों में भारत ने 30 स्वर्ण, 22 रजत और 17 कांस्य पदक सहित 69 पदक हासिल किए थे.
वैसे इस बार मिले 66 पदक की मदद से भारत ने राष्ट्रमंडल खेलों में अपने पदकों की संख्या 504 भी कर ली है.
इसमें 181 स्वर्ण, 175 रजत और 148 कांस्य पदक शामिल हैं.
चैंपियन हुए ढेर, निशानेबाज़ी में चमके युवा
इस बार भारत ने निशानेबाज़ी में सात स्वर्ण, चार रजत और पांच कांस्य पदक समेत सबसे अधिक 16 पदक हासिल किए हैं.
इनमें महिला वर्ग में 10 मीटर एयर पिस्टल स्पर्धा में 16 वर्षीय मनु भाकर द्वारा जीता गया स्वर्ण पदक सबसे अधिक महत्वपूर्ण है. यह उनके पहले राष्ट्रमंडल खेल थे.
उनके अलावा अनीश भानवाला ने भी केवल 15 साल की उम्र में 25 मीटर रैपिड फायर पिस्टल में स्वर्ण पदक जीतकर कमाल कर दिखाया.
लेकिन बेहद अनुभवी गगन नारंग और पूर्व विश्व चैंपियन मानवजीत सिंह संधू का निशाना किसी भी पदक पर नही लगा.
पहलवानी में सुशील का दांव चला
कुश्ती में भारतीय पहलवानों के दमख़म पर तो शायद ही किसी को कोई शक था.
उन्होंने भारत को पांच स्वर्ण, तीन रजत और चार कांस्य पदक सहित 12 पदक दिलाए हैं.
सुशील कुमार ने लगातार तीसरी बार स्वर्ण पदक जीता तो महिला वर्ग में विनेश फोगाट ने लगातार दूसरी बार यह कामयाबी हासिल की.
लेकिन रियो ओलंपिक की कांस्य पदक विजेता साक्षी मलिक को कांस्य पदक से ही संतोष करना पड़ा.
वेटलिफ्टर ने दिलाया पहले ही दिन से सोना
वेटलिफ्टिंग में भी भारतीय एथलीटों ने उम्मीदों का भार बखूबी उठाया.
महिला वर्ग में के संजिता चानू और पुरूष वर्ग में सतीश शिवलिंगम का पुराना अनुभव स्वर्णिम कामयाबी के रूप मे काम आया.
एस मीराबाई चानू और पूनम यादव ने भी पहली बार स्वर्ण पदक जीता.
वैसे भारत ने पांच स्वर्ण दो रजत और दो कांस्य पदक सहित नौ पदक वेटलिफ्टिंग में जीते.
मेरीकोम के मुक्के चले सरिता देवी हुई नाकाम
मुक्केबाजों ने भी तीन स्वर्ण, तीन रजत और तीन कांस्य पदक सहित नौ पदक दिलाए.
35 साल की हो चली एम सी मैरीकॉम ने तो कमाल के मुक्के जमाते हुए अपने विरोधियों से पार पाते हुए राष्ट्रमंडल खेलों का अपना पहला स्वर्ण पदक जीता.
पांच बार की विश्व चैंपियन और एशियन गेम्स की स्वर्ण पदक विजेता मैरीकॉम ने हर बार अपने ऊपर उठते सवालों का जवाब ऐसे ही दिया है.
गौरव सोलंकी उभरते मुक्केबाज़ है तो विकास कृष्ण बेहद अनुभवी.
इनके स्वर्ण पदक बेहद महत्वपूर्ण रहे.
हॉ महिला वर्ग में एल सरिता देवी की नाकामी हैरान करने वाली रही.
टेबल टेनिस में मनिका बत्रा स्टार बनकर उभरी
टेबल टेनिस में मनिका बत्रा स्टार खिलाड़ी बनकर उभरी.
महिला एकल के अलावा उन्होंने महिला टीम वर्ग में भारत को स्वर्ण पदक दिलाने में अपनी अहम भूमिका निभाई.
एंटनी अमलराज और अनुभवी अचंता शरत कमल के दम पर भारत ने पुरूष टीम का भी स्वर्ण पदक जीता.
टेबल टेनिस में भारत ने तीन स्वर्ण दो रजत और तीन कांस्य पदक सहित आठ पदक जीते.
बैडमिंटन से साइना नेहवाल के अनुभव ने बचाया
बैडमिंटन में साइना नेहवाल ने महिला एकल में और उससे पहले महिला टीम स्पर्धा में स्वर्णिम कामयाबी में अपना अहम रोल अदा किया.
पीवी सिंधू पूरी तरह फिट नही थी तो के श्रीकांत का खेल उतार-चढ़ाव भरा रहा.
फिर भी दो स्वर्ण तीन रजत और एक कांस्य बुरा नही है.
एथलेटिक्स में नीरज चोपड़ा ने बचाई नाक
एथलेटिक्स में नीरज चोपड़ा ने भाला फेंक स्पर्धा में स्वर्ण पदक जीतकर मान रखा.
इसके अलावा भारत को एक स्वर्ण और एक रजत से ही संतोष करना पड़ा.
स्कवैश में दीपिका और सौरव घोषान नाकाम
स्कवैश में दीपिका पल्लीकल और सौरव घोषाल का शुरूआती दौर में ही बाहर होना बेहद निराशाजनक रहा.
दो रजत पदक महिला युगल और मिश्रित युगल में आए.
हॉकी टीम की तो लुटिया ही डूब गई
लेकिन महिला और पुरूष हॉकी टीम बिना किसी पदक के वापस लौटेगी ऐसा तो शायद ही किसी ने सोचा था.
दोनो ही टीमों को अतिआत्मविश्वास ले डूबा.
गोल्ड कोस्ट रवाना होने से पहले बड़े-बड़े दावे खोखले साबित हुए.
हालांकि महिला और पुरूष दोनों टीमों ने सेमीफाइनल में जगह बनाई, लेकिन पहले तो मैदानी और उसके बाद पेनल्टी कॉर्नर को गोल में बदलने की कमज़ोरी लगातार सामने आई.
महिला टीम के कोच शॉर्ड मारिन को पुरूष और जूनियर पुरूष टीम के कोच हरेन्दर सिंह को महिला टीम की ज़िम्मेदारी देने की चाल काम नही आई.
बेहद अनुभवी सरदार सिंह को टीम में जगह ना देनी भी समझ से परे रहा.
जो भी हो कुल मिलाकर इस बार भारतीय एथलीटों ने दिखा दिया कि वेटलिफ्टिंग, कुश्ती, निशानेबाज़ी, बैडमिंटन, टेबल टेनिस और मुक्केबाज़ी में उनकी तैय्यारी सही थी. एथलेटिक्स और हॉकी में और ध्यान देने की ज़रूरत है.