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मेरी कॉम यानी बॉक्सिंग की दुनिया की आयरन लेडी
- Author, वंदना
- पदनाम, बीबीसी टीवी एडिटर (भारतीय भाषाएं)
35 साल की उम्र में कुछ महीने पहले ही मेरी कॉम ने पाँचवा एशियन चैंपियनशिप गोल्ड मेडल जीता है और अब राष्ट्रमंडल खेलों में भी पदक अपने नाम किया है.
कॉमनवेल्थ गेम्स ही एक प्रतियोगिता है जिसमें मेरी कॉम ने अब तक मेडल नहीं जीता था.
उनकी रोज़मर्रा की ज़िंदगी पर नज़र डालें तो सुबह-सुबह अगर वे दिल्ली में राष्ट्रीय कैंप में ट्रेनिंग करती हैं तो वहाँ से सीधे संसद सत्र पहुँती हैं ताकि बतौर सांसद वो राज्य सभा की कार्यवाही में हिस्सा ले सकें और उनके नाम के आगे ऐबसेंट न लिखा जाए.
आयरन लेडी
उन्हें यूँ ही आइरन लेडी नहीं कहा जाता. मेरी बॉक्सिंग रिंग के अंदर जितना जुझारू हैं, असल ज़िंदगी की मुश्किलों का भी उन्होंने डट कर सामना किया है.
2011 में मेरी कॉम के साढ़े तीन साल के बेटे के दिल का ऑपरेश्न होना था. उसी दौरान मेरी कॉम को चीन में एशिया कप के लिए जाना था. फ़ैसला मुश्किल था. आख़िरकर मेरी कॉम के पति बेटे के साथ रहे और मेरी कॉम एशिया कप में गईं और गोल्ड मेडल जीतकर लाईं. लेकिन ये उनके लिए आसान नहीं था.
मेरी कॉम पाँच बार विश्व चैम्पियन रह चुकी हैं और बॉक्सिंग में ओलंपिक पदक जीतने वाली पहली भारतीय महिला हैं.
2012 के लंदन ओलंपिक में उन्हें कांस्य मिला था.
मेरी का बचपन
मणिपुर में एक ग़रीब परिवार में जन्मी मेरी कॉम के परिवार वाले नहीं चाहते थे कि वो बॉक्सिंग में जाए. बचपन में मेरी कॉम घर का काम करती, खेत में जाती, भाई बहन को संभालती और प्रैक्टिस करती.
दरअसल डिंको सिंह ने उन दिनों 1998 में एशियाई खेलों में गोल्ड मेडल जीता था. वहीं से मेरी कॉम को भी बॉक्सिंग का चस्का लगा. काफ़ी समय तक तो उनके माँ-बाप को पता ही नहीं था कि मेरी कॉम बॉक्सिंग कर रही है.
साल 2000 में अख़बार में छपी स्टेट चैंपियन की फोटो से उन्हें पता चला. पिता को डर था कि बॉक्सिंग में चोट लगी तो इलाज कराना मुश्किल होगा और शादी में भी दिक्कत होगी.
लेकिन मेरी कॉम नहीं मानी. माँ-बाप को ही ज़िद्द माननी पड़ी. मेरी ने 2001 के बाद से तीन बार वर्ल्ड चैंपियनशिप जीती. इसी बीच मेरी कॉम की शादी हुई और दो जुड़वा बच्चे भी.
पांच बार की विश्व चैम्पियन मेरीकॉम ने अपने आखिरी दो विश्व चैम्पियनशिप मेडल और ओलंपिक मदक मां बनने के बाद जीते.
2012 ओलंपिक में तो चुनौती ये भी थी कि मेरी कॉम को अपने भारवर्ग 48 किलोग्राम के बजाय 51 किलोग्राम वर्ग में खेलना पड़ा था. इस वर्ग में उन्होंने सिर्फ़ दो ही मैच खेले थे.
मेरी कॉम ने करियर में बुरे दिन भी देखे जब वो 2014 में ग्लासगो में क्वालीफाई नहीं कर पाई और न ही रियो ओलंपिक के लिए क्वालिफ़ाई कर पाई थीं.
मेरी कॉम ने निजी ज़िंदगी में भी कई मुश्किलें झेली हैं.
हिंदुस्तान टाइम्स में छपे अपने बेटों के नाम खिले खत में उन्होंने साझा किया था कि कैसे जब वो 17 साल की थीं तो वो यौन उत्पीड़न का शिकार हुईं थीं- पहली बार मणिपुर में. फिर दिल्ली में और हिसार में. यह वो दौर था जब मेरी कॉम बॉक्सिंग में अपना करियर बनाने के लिए संघर्ष कर रहीं थीं.
जब वो अपनी तीसरी वर्ल्ड चैंपियनशिप जीतकर घर लौंटी तो कुछ सेमय बाद ही उनके ससुर की हत्या कर दी गई थी.
लेकिन हर बार मेरी ने हालात को मात दी. और बॉक्सिंग रिंग में वो अलग ही रूप में नज़र आती हैं.
वर्ल्ड बॉक्सिंग चैंपियन, ओलंपिक चैंपियन, सांसद, बॉक्सिंग अकादमी की मालिक, खेलों के लिए सरकारी पर्यवेक्षक, माँ और पत्नी ..मेरी कॉम कई रोल एक साथ निभाती हैं. और हर काम में उतनी ही लगन जितनी लगन से वो रिंग में खेलती हैं.
बीबीसी को दिए एक इंटरव्यू में उन्होंने एक बार कहा था, "रिंग में सिर्फ़ दो ही बॉक्सर होते हैं. इसलिए जब अगर आप रिंग में जाएँ और आप आक्रोशित न हों, तो आप असल बॉक्सर नहीं है."
अपने अंदर के इसी आक्रोश को रिंग में उतारकर शायद मेरी कॉम अब तक यहाँ तक पहुँची हैं.
और उनका सपना 1000 और मेरी कॉम खड़ा करने का है.
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