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क़तर और सऊदी अरब के बीच अब 'बैटल ऑफ़ बोट्स'
- Author, ओवेन पिनेल
- पदनाम, बीबीसी अरबी सेवा
छोटे से लेकिन दौलतमंद मुल्क़ क़तर और उसके बड़े पड़ोसी देशों के बीच साल भर से चल रहे राजनीतिक संघर्ष में हथियार और मैदान बदल रहे हैं.
बात बयानबाज़ी से शुरू हुई और प्रतिबंधों से होते हुए बहिष्कार तक पहुंची, लेकिन अब ये लड़ाई बोट्स, फ़ेक न्यूज़ और हैंकिंग जैसे नए हथियारों से लड़ी जा रही है.
इस मैदान में क़तर का मुक़ाबला असल में जिन दो बड़े मुल्क़ों से है, वे हैं सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात.
24 मई, 2017 की सुबह क़तर की सरकारी न्यूज़ एजेंसी 'क्यूएनए' की वेबसाइट पर एक ख़बर दिखाई दी.
रिपोर्ट ये थी कि 'मुल्क़ के अमीर शेख तमीम बिन हमाद अलथानी ने एक चौंका देने वाला भाषण दिया.'
क़तर के विदेश मंत्रालय का खंडन
वहां से शेख तमीम बिन हमाद अलथानी के बयान 'क्यूएनए' के सोशल मीडिया एकाउंट्स पर पोस्ट हुए.
और फिर न्यूज़ एजेंसी के यूट्यूब एकाउंट पर अपलोड किए जाने वाले वीडियो के टिकर्स पर दिखाई देने लगे.
इस बयान में क़तर के अमीर को इस्लामी गुट 'हमास', 'हिज़बुल्लाह' और 'मुस्लिम ब्रदरहुड' की तारीफ़ करते हुए बताया गया था.
इससे भी ज़्यादा विवादास्पद चीज़ें उस दिन हुईं. बयान में लोगों ने ये भी देखा कि शेख तमीम बिन हमाद अलथानी सऊदी अरब के दुश्मन मुल्क़ ईरान की तारीफ़ कर रहे थे.
लेकिन ये ख़बर जल्द ही 'क्यूएनए' की वेबसाइट से ग़ायब हो गई और क़तर के विदेश मंत्रालय ने एक बयान जारी कर इस ख़बर का खंडन किया.
संयुक्त अरब अमीरात पर आरोप
बयान में ये कहा गया कि क़तर के अमीर ने ऐसा कोई भाषण कभी दिया ही नहीं था.
ऐसा कोई वीडियो कभी सामने नहीं आया जिसमें क़तर के अमीर ऐसा कुछ कह रहे हों जो उनके नाम पर फैलाया गया.
क़तर ने ये दावा किया कि 'क्यूएनए' की वेबसाइट हैक कर ली गई थी और ये हैकिंग उसके नेता और उसकी विदेश नीति के बारे में झूठी ख़बर फैलाने के इरादे से की गई थी.
क़तर ने ख़ासतौर पर इसके लिए संयुक्त अरब अमीरात को जिम्मेदार ठहराया.
बाद में 'वाशिंगटन पोस्ट' अख़बार ने भी अमरीकी खुफ़िया सूत्रों के हवाले से क़तर के आरोपों की पुष्टि की थी. हालांकि यूएई ने इन रिपोर्टों को सिरे से खारिज कर दिया था.
अमीर के बयान पर हंगामा
लेकिन शेख तमीम बिन हमाद अलथानी के इस कथित भाषण से जो हंगामा खड़ा होना था, वो हो गया.
कुछ ही मिनटों के भीतर सऊदी अरब और यूएई के टीवी चैनल 'अल-अरबिया' और 'स्काई न्यूज़ अरबिया ने अल-थानी के बयान को प्रमुखता से दिखाना शुरू कर दिया.
दोनों ही न्यूज़ नेटवर्क ने क़तर पर चरमपंथी गुटों को माली मदद मुहैया कराने और क्षेत्र में अस्थिरता फैलाने का आरोप लगाया.
इस वाकये के कुछ ही दिनों के बाद कथित हैकिंग की एक और घटना हुई. इस बार टारगेट पर था यूएई.
अमरीका में संयुक्त अरब अमीरात के राजदूत यूसुफ अल-ओतैबा की ईमेल्स प्रेस में लीक कर दी गईं.
इंटरनेशनल मीडिया में कई दिनों तक यूसुफ अल-ओतैबा की निजी ज़िंदगी के बारे में तरह-तरह की बातें छपती रहीं.
क़तर पर पाबंदियां
पांच जून, 2017 को सऊदी अरब, यूएई, बहरीन, मिस्र समेत नौ देशों ने क़तर के साथ अपने रिश्ते तोड़ लिए.
इन देशों ने क़तरी लोगों को अपने यहां से निकालना शुरू कर दिया, कूटनीतिक संबंध स्थगित कर दिए गए.
क़तर की ज़मीनी सरहद पर नाकेबंदी कर दी गई, हवाई यातायात के लिए रास्ता रोक दिया गया और सभी कारोबार बंद कर दिए गए.
और इन सब के बीच सऊदी अरब के नए क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान ने क़तर के सामने 13 मांगें रखीं. इन्हें पूरा करने के लिए क़तर को 10 दिनों की मोहलत दी गई.
इन मांगों में ईरान के साथ रिश्ता तोड़ने की शर्त और क़तरी न्यूज़ चैनल अल-जज़ीरा को बंद करने का मुद्दा प्रमुख था.
ट्रंप के ट्वीट
राष्ट्रपति बनने के बाद डोनल्ड ट्रंप अपनी पहली विदेश यात्रा पर सऊदी अरब गए. वहां उन्होंने क़तर पर की जा रही कार्रवाई का स्वागत किया.
ट्रंप ने कहा कि चरमपंथ विरोधी उनकी नीतियां अमल में लाई जा रही हैं और ये उसी का सबूत है. ट्रंप के बयान के बाद ट्वीटर पर जारी प्रोपैगैंडा वार और तेज़ हो गया.
इसमें क़तर के समर्थन और विरोध में, दोनों ही पक्ष हैशटैग कैम्पेन चलाते देखे गए.
क़तर की तरफ़ से ट्विटर #Tamim_The_Glorious और #QatarIsNotAlone जैसे हैशटैग कैम्पेन चलाए गए. ये हैशटैग्स ट्विटर के गल्फ़ ट्रेंड्स में दिख रहे थे.
इसे खाड़ी क्षेत्र के लोगों की भावनाओं के प्रतीक के तौर पर देखा जाता है. लेकिन मोर्चा दूसरी तरफ़ से भी खुला हुआ था.
क़तर के अमीर शेख तमीम बिन हमाद अलथानी के विरोध में लोकप्रिय हैशटैग था #GaddafioftheGulf. उनकी तुलना लीबिया के नेता कर्नल गद्दाफी से की गई थी.
बैटल ऑफ़ बोट्स
बीबीसी की अरबी सेना की एक पड़ताल में ये बात सामने आई कि इन हैशटैग्स के साथ किए जा रहे ज़्यादातर ट्वीट्स फ़ेक एकाउंट्स से किए जा रहे थे.
ट्विटर पर ये फ़ेक एकाउंट्स बोट्स कहे जाते हैं. ये एक तरह के स्वचालित ट्विटर हैंडल होते हैं जिनका मक़सद कृत्रिम तरीक़े से लोगों के विचारों में बदलावा लाना होता है.
बेन नीमो अटलांटिक काउंसिल में सीनियर फेलो हैं. उन्होंने ट्रेंडिंग हैशटैग्स और उसकी बारीकियों पर गहन पड़ताल की है ताकि इसके सोर्स का पता लगाया जा सके.
उन्होंने पाया कि ट्विटर बोट्स कई तरह के तरीके अपनाते हैं, कभी उन्हें अपने इंटरनेट ट्रैफ़िक में या हैशटैग के लिए अचानक उछाल की ज़रूरत होती है.
इसके लिए ट्विटर बोट्स खुद ही उस हैशटैग या पोस्ट का इस्तेमाल करने लगते हैं.
ट्विटर की कार्रवाई
#Tamim_The_Glorious हैशटैग @sabaqksa नाम के ट्विटर हैंडल से 201 बार री-ट्वीट किए गए थे और वो भी कुछ ही सेकंडों के भीतर.
बेन नीमो बताते हैं कि ये कोई सामान्य चलन नहीं है. ट्विटर ने @sabaqksa वाला हैंडल सस्पैंड कर दिया था. बीबीसी अरबी सेवा इसके मालिक से संपर्क नहीं कर पाई.
इस हैशटैग को तकरीबन 100 ट्विटर हैंडल्स से 1410 बार पोस्ट किया और ये सब पांच घंटे के भीतर किया गया.
बेन कहते हैं कि इस पर भरोसा करना मुश्किल लगता है कि कोई इंसान इस रफ़्तार से ट्विटर पर पोस्ट या री-ट्विट कर सकता है.
जब ट्विटर पर बड़ी तादाद में इस तरह के फ़ेक एकाउंट्स एक साथ सक्रिय हो जाएं तो इसे 'बोट्स नेट' कहते हैं.
क़तर के अमीर का अपमान
लेकिन बेन नीमो का कहना है कि क़तर के विरोधी मोर्चे की तरफ़ से भी ट्विटर बोट्स का इस्तेमाल किया गया था.
इनके ज़रिए क़तर के अमीर की अपमानजनक तस्वीरें फैलाई गईं.
क़तर के ख़िलाफ़ किए जा रहे ऐसे ट्वीट्स की शुरुआत ज़्यादातर एक ही ट्विटर हैंडल @saudq1978 से हुई थी.
ये ट्विटर हैंडल सऊदी अरब की शाही अदालत के एक अहम सदस्य सऊद अल-क़ाहतानी से जुड़ा हुआ है. वे क्राउन प्रिंस के सलाहकार भी हैं.
ट्विटर पर उनके दस लाख से बी ज़्यादा फ़ॉलोअर्स हैं और वे खाड़ी क्षेत्र में एक अहम ट्विटर सिलेब्रिटी के तौर पर देखे जाते हैं.
झगड़ा सुलझता हुआ नहीं दिख रहा है...
हैशटैग #GaddafiOfTheGulf के टॉप पांच ट्वीट इसी ट्विटर हैंडल से किए गए थे.
इस ट्विटर हैंडल से क़तर पर लीबिया की लड़ाई में आम लोगों की हत्या और चरमपंथी गतिविधियों के लिए पैसा देने का आरोप लगाया गया था.
बीबीसी की अरबी सेवा ने सऊद अल-क़ाहतानी से इस मसले पर उनका पक्ष जानने की पूरी कोशिश की लेकिन उनकी तरफ़ से कोई जवाब नहीं आया.
इस बीच क़तर का बहिष्कार या क़तर की नाकेबंदी पर चल रही किसी भी बहस में बहुत कुछ इस बात पर निर्भर करता है कि आप किस पक्ष से बात कर रहे हैं.
अमरीका की तरफ़ से मध्यस्थता की तमाम कोशिशों के बावजूद अभी ये झगड़ा सुलझता हुआ नहीं दिख रहा है.
केवल राजनीतिक लड़ाई नहीं है...
संघर्ष से जुड़े हैशटैग्स ट्विटर ट्रेंड्स में बने हुए हैं और हैकिंग की गतिविधियां 2018 में भी चल रही हैं. इस क्षेत्र के न्यूज़ चैनल आरोप-प्रत्यारोप के खेल में अब भी उलझे हैं.
इन चैनलों ने क़तर संकट का लोगों पर पड़ रहे असर को अलग-अलग तरीके से पेश करने की कोशिश की.
अल-अरबिया टीवी चैनल ने दिखाया कि क़तर के लोग खाद्य संकट का सामना कर रहे हैं और दुकानों में खाली शेल्फ़ की तस्वीरें दिखाई गईं.
लेकिन अल-जज़ीरा क़तरी लोगों को आम ज़िंदगी जीते हुए दिखा रहा था.
अरब मीडिया की जानकार दीना मातर कहती हैं, "ये केवल राजनीतिक लड़ाई नहीं है बल्कि ये एक मीडिया वार भी है. जो समस्याएं पश्चिम में हैं, वही अरब जगत में भी है."
"फ़ेक न्यूज़ हर तरफ है. अरब जगत के राजनेता मीडिया की अहमियत से अच्छी तरह से वाकिफ हैं. इसलिए मीडिया एक हथियार बन गया है."
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