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सोशलः बच्चे को दूध पिलाने में शर्मिंदगी कैसी?
हाल ही में किर्गिस्तान के राष्ट्रपति की सबसे छोटी बेटी आलिया शागयीवा के अपने बच्चे को ब्रेस्टफ़ीड (स्तनपान) कराने की एक तस्वीर वायरल हुई. इस तस्वीर में आलिया अंडरवेयर में हैं और अपने बेटे को दूध पिला रही हैं.
इस तस्वीर को सोशल मीडिया पर शेयर करते हुए उन्होंने लिखा था, "मेरे बेटे को भूख लगती है तो मैं कहीं भी और कभी भी उसे स्तनपान कराती हूं."
इस तस्वीर को लेकर उन पर अनैतिकता के आरोप लगे और नतीजा ये हुआ कि उन्हें ये तस्वीर हटानी पड़ी.
ऐसा नहीं है कि उनकी तस्वीर पर केवल सोशल मीडिया पर लोग नाराज़ थे. उनके माता-पिता, राष्ट्रपति अल्माज़बेक आत्मबयेव और उनकी पत्नी राइसा भी इस पर नाराज़ हुए.
भारत की स्थिति
पर ये मसला सिर्फ आलिया से जुड़ा नहीं है. भारतीय समाज में भी ज़्यादातर महिलाएं सार्वजनिक रूप से स्तनपान कराने को लेकर असहज हो जाती हैं.
इसी मुद्दे पर हमने कुछ महिलाओं से बात की. यह बातचीत इसलिए भी प्रासंगिक है क्योंकि अगस्त महीने के पहले सप्ताह को 'विश्व स्तनपान सप्ताह' के रूप में मनाया जाता है.
सोशल मीडिया पर हमें जो प्रतिक्रियाएं मिलीं उनमें से ज़्यादातर लोगों का कहना है कि इसमें असहज होने जैसी या शर्माने जैसी कोई स्थिति नहीं होनी चाहिए. बच्चा अगर भूखा है, तो उसे भूख से रोने देने से बेहतर है कि मां उसे दूध पिला दे.
आमिर ख़ान लिखते हैं, ''मां, मां होती है. हम भी कभी छोटे रहे होंगे. हम भी दूध के लिए रोते होंगे. ऐसे में अगर हमारी मां हमें दूध नहीं पिलाती तो?''
हालांकि कुछ लोगों का यह भी कहना है कि बच्चे को सार्वजनिक जगह पर स्तनपान कराने में कोई बुराई नहीं है, लेकिन थोड़ा ध्यान रख लें तो क्या बिगड़ जाएगा.
सोशल मीडिया पर हमसे जुड़ी पूजा सूद का कहना है, ''बात सिर्फ सार्वजनिक स्थल पर स्तनपान कराने की नहीं है. हमें अपने घरों में भी ऐसी परिस्थितियों का सामना करना पड़ता है. अपनों से ही छिपकर अपने बच्चे को दूध पिलाना पड़ता है. यह सालों से चला आ रहा है. यह वाकई दुखद है.''
बीबीसी हिंदी के साथ फ़ेसबुक लाइव में प्योली का कहना है, ''इस असहजता का एक प्रमुख कारण बाज़ार भी है. ज्यादातर लोग स्तन को सेक्सिस्ट इमेज से जोड़कर ही देखते हैं. ऐसे में असहजता स्वाभाविक है. औरत की देह को सामान बेचने के लिए तो इस्तेमाल करते हैं, लेकिन सार्वजनिक जगह पर अगर कोई औरत अपने बच्चे को दूध पिलाए तो लोगों को अपत्ति होती है.''
प्योली आगे कहती हैं कि सार्वजनिक स्थल पर स्तनपान कराने में असहज़ता सिर्फ पुरुष सोच की ही देन नहीं है. इसके लिए महिलाएं भी कुछ हद तक ज़िम्मेदार हैं. इसको दूर करने के लिए सबसे ज़रूरी है कि वो अपने शरीर को लेकर सहज हों.
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