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उम्मुल खैर: ज़िंदा है तो प्याला पूरा भर ले....
कभी झुग्गियों से रहीं उम्मुल खैर यूपीएससी परीक्षा में पास होकर आईएएस के लिए चुनी गईं हैं.
उम्मुल के संघर्ष की कहानी कई लोगों के लिए प्रेरणादायक हो सकती है. बीबीसी हिंदी रेडियो के कार्यक्रम इंडिया बोल में उम्मुल खैर शामिल रहीं.
इस कार्यक्रम में बीबीसी हिंदी प्रेजेंटर संदीप सोनी और उम्मुल खैर के अलावा कई श्रोता भी जुड़े.
कार्यक्रम की शुरुआत में उम्मुल खैर ने अपने संघर्षों की कहानी बयां की. उम्मुल ने कहा,
- राजस्थान की जिस समाज से मैं आती हूं, वहां शिक्षा से ज्यादा लोगों का ताल्लुक नहीं है. आस पास के लोग ज़्यादा शिक्षित नहीं हैं.
- जब मैं 10 महीने की थी, जब मेरी मां और मुझे छोड़कर पापा दिल्ली आ गए थे. जब मैं पांच साल की हुई, तो मेरी मां को बीमारी की वजह से स्कूल की नौकरी छोड़नी पड़ी.
- हमारी आर्थिक स्थिति बिगड़ने लगी. मेरे वहां रहने और खाने पीने का खर्च थोड़ा कम हो सके, इसलिए मुझे दिल्ली भेज दिया गया. हम हजरत निजामुद्दीन के पास झुग्गियों में रहने लगे.
- तेज धूप में दिक्कत होती. बरसात होती तो पानी टपकता. घर के पास नाला होता था, बारिश में नाले का पानी घर आ जाता.
इंडिया बोल में श्रोता हुए शामिल
दिल्ली से पूजा शुक्ला ने फोनलाइन के ज़रिए कार्यक्रम में सवाल पूछा- जब हम यूपीएससी की तैयारी करने के लिए घर से बाहर निकलते हैं तो तमाम दिक्कतें होती हैं. तैयारी कैसे करें, कहां से शुरू करें. आप जब तैयारी कर रही थीं, तो आपको कहां-कहां से सहयोग मिला?''
उम्मुल ने जवाब दिया, '' जब आप बड़े सपने देखते हैं, तो ऐसे सपनों को पूरा करने के लिए ज्यादा हिम्मत भी चाहिए होती है. कहां से सहयोग मिल रहा है या नहीं, कई बार ये बहुत ज्यादा बेईमानी हो जाता था. मुझे तो अपने मां-बाप का भी समर्थन नहीं मिला. जब आप अपने हौसले को बहुत बड़ा कर लेते हैं तो आपको समर्थन मिल रहा या नहीं, ये ज्यादा मायने नहीं रखता है.''
दिल्ली में सरकारी नौकरी की तैयारी कर रही नीरज ने उम्मुल से पूछा- पढ़ने के लिए क्या रणनीति बनाई जाए कि ये फायदेमंद रहे.
उम्मुल ने जवाब दिया- अगर आप कोचिंग नहीं ले पा रहे हैं तो ज्यादा परेशान होने की ज़रूरत नहीं है. अब ऑनलाइन पढ़ाई करके और अच्छे न्यूज चैनलों को देखकर भी तैयारी की जा सकती है.
जब परिवार ने छोड़ा साथ और अकेले रहीं उम्मुल
उम्मुल ने कार्यक्रम में कहा, ''जब तब मैं सातवीं क्लास में थी, तब तक घर से भी सपोर्ट रहा. मेरी जो मां हैं, वो सौतेली हैं. तो मां का प्यार जो था, वो भी कम ही मिला था.
बार-बार ये सुनने को मिलता कि नहीं आगे ज्यादा पढ़ाई करने की ज़रूरत नहीं है. घर वाले कहते कि अगर हमारे साथ रहना है तो हमारे हिसाब से चलना होगा. तुम्हारी वजह से हम अपने खानदान की बदनामी नहीं होने देंगे. लेकिन उनके ये ख्याल थे कि अगर लड़की बाहर जाएगी तो बदनामी होगी.''
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