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सोशल: कभी झुग्गी में रहने वाली उम्मुल खैर के IAS बनने की कहानी
यह कहानी है उस लड़की की जिसका बचपन झुग्गियों में बीता. यह कहानी है उस लड़की को जो एक रूढ़िवादी मुस्लिम परिवार से ताल्लुक रखती है.
यह कहानी है उस लड़की की जिसे एक ऐसी बीमारी है जिसमें हड्डियां बेहद कमजोर हो जाती हैं और छोटी से भी फ्रैक्चर होने का खतरा रहता है. यह कहानी उम्मुल खैर की है. वो उम्मुल जिन्होंने इस साल यूपीएससी की सिविल सेवा परीक्षा में शानदार कामयाबी हासिल की है.
बताने की जरूरत नहीं है कि सिविल सर्विसेज की तैयारी करने वाला हर छात्र कड़ी मेहनत और तमाम अड़चनों से होकर गुजरता है. लेकिन उम्मुल का इस परीक्षा में सफल होना बहुत से मायनों में अलग है. राजस्थान की निवासी उम्मुल पांच साल की उम्र में दिल्ली आ गई थीं.
दिल्ली में उनका बचपन हजरत निजामुद्दीन स्टेशन के पास झुग्गियों में बीता. उनके पिता स्टेशन के पास छोटे-मोटे सामान बेचा करते थे. कुछ सालों बाद झुग्गियां वहां से हटा दी गईं और उम्मुल का परिवार बेघर हो गया.
इसके बाद वे त्रिलोकपुरी में एक सस्ता सा कमरा लेकर रहने लगे. उनके पिता का काम भी छूट गया था. ऐसे में सातवीं कक्षा में पढ़ने वाली उम्मुल ने मोर्चा संभाला और आस-पास के बच्चों को ट्यूशन पढ़ाने लगीं.
इसके बदले में में उन्हें 50-60 रुपे मिलते थे जिससे घर का खर्च बड़ी मुश्किल से चल पाता था. उम्मुल की अपनी मां का इंतकाल हो चुका था और वह अपनी सौतेली मां के साथ रहती थीं. आठवीं के बाद उनकी पढ़ाई बंद कराने की बात होने लगी.
उम्मुल ने बीबीसी हिंदी के साथ फेसबुक लाइव में बताया,''पुराने ख़यालात वाले मुस्लिम परिवार में माना जाता था कि लड़कियों को ज्यादा पढ़ने-लिखने या बाहर जाने की जरूरत नहीं है. लड़की ज्यादा पढ़ लिख जाए तो वह बड़ों का अदब करना भूल जाती है, उसका चरित्र खराब हो जाता है. वगैरह...वगैरह. मेरी नई मां ने कहा कि मुझे वापस राजस्थान भेज दिया जाएगा. चूंकि मेरे पैरों में तकलीफ़ थी इसलिए घरवाले चाहते थे कि मैं सिलाई का काम सीखूं. लेकिन मैंने तय कर लिया था कि अगर जिंदा रहूंगी तो पढ़ूंगी और अगर नहीं पढ़ सकी तो मर जाऊंगी.''
इसके बाद नवीं क्लास में पढ़ने वाली उम्मुल अकेले रहने लगीं और ट्यूशन पढ़ाते हुए अपनी पढ़ाई जारी रखी. वह सुबह स्कूल जाती थीं और रात में ट्यूशन पढ़ाया करती थीं. स्कूल में उन्हें स्कॉलरशिप मिली और उन्होंने टॉप भी किया, जिससे उन्हें हिम्मत मिली. फिर उन्होंने दिल्ली यूनिवर्सिटी से अप्लाइड साइकॉलजी में बीए किया.
आर्थिक हालात खराब होने की वजह से वह साइकॉलजी में एमए नहीं कर सकीं क्योंकि इसके लिए इंटर्नशिप करनी जरूरी था. चूंकि वह बच्चों को पढ़ाती थीं इसलिए उनका इंटर्नशिप करना मुमकिन नहीं था. इसलिए उन्होंने जेएनयू से इंटरनैशनल रिलेशन्स में एमए किया.
उम्मूल बताती हैं कि जेएनयू आना उनकी जिंदगी का टर्निंग पॉइंट रहा. वहां उन्हें हॉस्टल मिला, खाने के लिए मेस मिला और तमाम सुविधाएं मिलीं. जेएनयू में रहते हुए उम्मुल ने कई अंतरराष्ट्रीय मंचों पर विकलांग समुदा का नेतृत्व किया. वह एक साल जापान में भी रहीं और भारत आने के बाद उन्होंने आईएएस की तैयारी करने का फैसला लिया.
उम्मुल कहती हैं कि उन्होंने हमेशा खुद को बहुत खुशकिस्मत माना क्योंकि मुश्किल हालात में उन्हें पढ़ने का मौका मिला. वह कहती हैं,''मकसद को पाने के लिए जुनून होना चाहिए. आप अपने सकारात्मक पक्ष को इतना मजबूत बनाइए कि उसके सामने बाकी चीजें बौनी हो जाएं. अगर आप कोई सपना देख लें और उसके लिए ईमानदार हो जाएं तो प्रेरणा भी खुद मिल जाती है.''
उम्मुल कहती हैं कि उनकी सफलता पर उनके माता-पिता का पूरा हक और वो उन्हें अपने साथ रखेंगी.
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