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दलित छात्र रजनी कृष का वो आख़िरी पोस्ट
- Author, दिलनवाज़ पाशा
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
दिल्ली पुलिस जेएनयू के दलित शोध छात्र मुथुकृष्णनन जीवानंदम की संदिग्ध मौत को आत्महत्या मान रही है.
तमिलनाडु में सेलम के रहने वाले मुथुकृष्णनन, रजनीकांत का अभिनय करते थे और दोस्तों के बीच रजनी क्रिश के नाम से ही चर्चित थे.
उन्होंने फ़ेसबुक पर प्रोफ़ाइल भी इसी नाम से बनाई थी. वो फ़ेसबुक पर 'माना' नाम से एक सीरीज़ में कहानियां लिख रहे थे.
इन कहानियों में वो एक दलित छात्र के जीवन संघर्ष को बयान करने की कोशिश कर रहे थे.
इस सीरीज़ में किए गए अपने अंतिम पोस्ट में उन्होंने समानता के मुद्दे को उठाया था.
उन्होंने लिखा था, "समानता से वंचित करना हर चीज़ से वंचित करना है."
पढ़ें- जेएनयू के दलित शोध छात्र की
अपनी पोस्ट में उन्होंने लिखा था, "एम. फिल/पीएचडी दाख़िलों में कोई समानता नहीं है, मौखिक परीक्षा में कोई समानता नहीं है. सिर्फ समानता को नकारा जा रहा है. प्रोफ़ेसर सुखदेव थोराट की अनुसंशा को नकारा जा रहा है. एडमिन ब्लॉक में छात्रों के प्रदर्शन को नकारा जा रहा है. वंचित तबके की शिक्षा को नकारा जा रहा है. समानता से वंचित करना हर चीज़ से वंचित करना है."
हैदराबाद सेंट्रल यूनिवर्सिटी में रजनी के जूनियर रहे चरण टी. ने बीबीसी को बताया, "वो एक कहानीकार थे, इतिहासकार थे. उनकी मानवीय मूल्यों में रुचि थी. वो मानवीय अनुभवों को कहानियों में गढ़ देते थे. उन्होंने अपने फ़ेसबुक वॉल पर अपनी पहली विमान यात्रा का अनुभव लिखा है जो उनके बारे में बहुत कुछ बताता है."
चरण बताते हैं, "पिछली गर्मियों में उन्होंने मुझे बताया कि कैसे उन्होंने मज़दूर की तरह काम किया. दीवारों पर पेंटिंग की. वो पढ़ाई में अपनी रुचि के बारे में बात करते थे."
चरण बताते हैं कि रजनी को कई प्रयासों के बाद जेएनयू में दाख़िला मिला था.
दिव्या भगत का जेएनयू में जब पहला दिन था तब उनकी मुलाक़ात रजनी से हुई थी. दिव्या बताती हैं, "वो बेहद जीवंत इंसान थे. उनकी मौत की ख़बर से मैं सदमे में हूं."
दिव्या कहती हैं, "वो एक दलित लड़के की कहानी फ़ेसबुक पर लिख रहे थे. जब उन्होंने पहली सीरीज़ लिखी तो मुझसे पढ़ने का आग्रह किया. ये पोस्ट बहुत प्रभावशाली थी. इसमें दुख और ख़ुशी का संतुलन था, हास्य था."
जुलाई 2016 में फ़ेसबुक पर किए एक पोस्ट में रजनी ने जेएनयू पहुंचने की अपनी कहानी लिखते हुए बताया था, "ये जेएनयू आने का मेरा चौथा साल है. मैंने तीन बार जेएनयू में एमए में दाख़िला लेने के लिए प्रवेश परीक्षा दी. दो बार जेएनयू की एम फिल और पीएचडी की परीक्षा दी. दो बार इंटरव्यू में शामिल हुआ."
वो आगे लिखते हैं, "आप जानते हैं.... पहली दो बार मैंने अंग्रेज़ी अच्छे से नहीं सीखी. लेकिन मैंने कोशिश की क्योंकि मैं हौसला नहीं हारना चाहता था. हर साल जेएनयू पहुंचने के लिए मैंने छोटे-छोटे काम किए, पैसा बचाया, कभी ट्रेन में खाना नहीं खाया. पहली दो बार में तमिलनाडु से आया और अंतिम दो बार हैदराबाद सेंट्रल यूनिवर्सिटी से."
वे लिखते हैं, "हर साल लोग मुझे दुआ देते थे कि इस साल तुम्हारा हो जाएगा. मैं कोशिश करता रहा क्योंकि मैं हौसला नहीं हारना चाहता था और मैं हमेशा सोचता था कि मेहनत कभी बेकार नहीं जाती है. मैं हर साल नेहरू की मूर्ति के नीचे बैठता था और नेहरू से कहता था कि नेहरू जी मेरे परिवार के सभी लोग कांग्रेस को वोट देते हैं, आप क्यों नहीं चाहते कि मुझे शिक्षा मिले."
वे लिखते हैं, "आख़िरी इंटरव्यू में 11 मिनट बाद एक मैडम ने मुझसे कहा कि मैं सरल भाषा बोल रहा हूं. इस बार के साक्षात्कार में मैं आठ मिनट तक बोला और सभी सवालों के जवाब दिए. तीन प्रोफ़ेसरों ने मुझसे कहा कि मैंने अच्छे जवाब दिए हैं. मैं सेलम ज़िले से जेएनयू में चयनित होने वाला अकेला छात्र हूं."
इस पोस्ट में रजनी ने लिखा, "ये पल मेरे लिए ऐतिहासिक है. मैं किताब लिखूंगा- फ्रॉम जंकेट टू जेएनयू."
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