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'इलाज़ में इस्तेमाल हो अफ़ग़ानी अफ़ीम' | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
ब्रिटिश मेडिकल ऐसोसिएशन (बीएमए) का कहना है कि अफ़ग़ानिस्तान में पैदा होने वाली अफ़ीम पर रोक लगाने की जगह उसका इस्तेमाल मरीज़ों के इलाज़ पर करना चाहिए. इससे मरीज़ों का फ़ायदा होगा और अफ़गानिस्तान की जनता का भी. अफ़ीम से डायमॉरफीन बनाकर इस दवा की कमी को पूरा किया जा सकता है. डायमॉरफीन का इस्तेमाल गंभीर रूप से बीमार मरीज़ का ऑपरेशन करते समय किया जाता है. इससे मरीज़ का दर्द कम हो जाता है. डायमॉरफीन को हेरोइन के नाम से भी जानते हैं. लेकिन ब्रिटेन और अफ़ग़ानिस्तान सरकार ने पोस्ते से डायमॉरफीन बनाने के प्रस्ताव को नकार दिया है. वहीं ब्रिटेन के डॉक्टरों का कहना है कि देश में डायमॉरफीन की बहुत कमी हो गई है और उसकी जगह बहुत मँहगे विकल्पों का इस्तेमाल करना पड़ रहा है. दिक्कतें ब्रिटेन के शहर रेडिंग में एनेस्थीसिया और गहन चिकित्सा में सलाहकार डॉक्टर जोनाथन फील्ड्स ने कहा,"दुर्भाग्य से पिछले साल डायमॉरफीन की उपलब्धता में भारी कमी हुई है." बीएमए का कहना है कि इससे मरीज़ों को तो राहत मिलेगी ही साथ में अफ़ग़ानिस्तान के किसानों की आय भी बढ़ जाएगी. बीएमए में विज्ञान और नैतिकता से जुड़े मामलों के प्रमुख डॉ विवियन नॉथनसन ने कहा कि इस समय इन मामलों में नया रुख़ अपनाने की ज़रूरत है. उन्होंने कहा,"पोस्ते की फ़सल इस तरह इस्तेमाल किए जाने की ज़रूरत है कि ये सीधे दवा उद्योग तक पहुँच जाए जहाँ इससे डायमॉरफीन बनाई जा सके. अफ़ग़ानिस्तान की मौज़ूदा सरकार और अंतरराष्ट्रीय संगठनों को विचार करना चाहिए कि इस गै़रक़ानूनी फ़सल को क़ानूनी जामा कैसे पहनाया जाए." ब्रिटेन के स्वास्थ्य विभाग का कहना है कि यह सच है कि देश में डायमॉरफीन की कमी हो गई थी लेकिन अब स्थिति में सुधार हो रहा है. स्वास्थ्य विभाग के एक प्रवक्ता ने कहा," हम बाज़ार में दूसरे दवा के आने का इंतज़ार कर रहे हैं. डायमॉरफीन बनाने का एक ख़ास तरीका है और ब्रिटेन और दुनिया के दूसरे देशों में यह सीमित मात्रा में ही बनाई जाती है." ब्रिटेन सरकार समर्थित अफ़ग़ान सरकार ने भी डायमॉरफीन बनाने के लिए अफ़ीम उगाने का लाइसेंस देने से इनकार कर दिया है. इस समय अफ़ग़ान सरकार अफ़ीम की खेती और नशीली दवाओं का कारोबार रोकने की कोशिश कर रही है. फ़ायदा विभिन्न मुद्दों पर विचार करने वाले अंतरराष्ट्रीय संगठन 'द सेंलिस काउंसिल' ने कहा है कि अफ़ीम की खेती पर रोक लगाने से चरमपंथी संगठन 'तालेबान' का ही फायदा होगा. संगठन के अनुसार गाँव स्तर तक लाइसेंसिंग की व्यवस्था कर अफ़ीम की खेती को बढ़ावा दिए जाने की ज़रूरत है. इससे किसानों को सीधे फ़ायदा पहुँचेगा. अफ़ग़ानिस्तान में काम करने वाले 'क्रिश्चियन एड' जैसे संगठन इस प्रस्ताव को लेकर सशंकित हैं. उनका कहना है कि अगर किसानों की सहायता करनी ही है तो लंबे समय तक फ़ायदा देने वाली योजनाओं जैसे सिंचाई सयंत्र पर काम किया जाए. डॉ फील्डेन मानते हैं कि अंतरराष्ट्रीय समुदाय को इस प्रस्ताव पर राज़ी करना सरल नहीं होगा. उनका कहना है,"सबसे बड़ी समस्या अमरीका जैसे उन देशों को समझाने में होगी जहाँ इस दवा पर ही प्रतिबंध है. उनके लिए ये सोचना एक बड़ा परिवर्तन होगा कि एक ऐसी दवा जो ग़ैरक़ानूनी है उससे मरीज़ों के फ़ायदे के लिए इस्तेमाल में लाया जाए." | इससे जुड़ी ख़बरें अफ़ीम की खेती पर पाबंदी16 जनवरी, 2002 | पहला पन्ना अफ़ीम की खेती रोकने का विरोध08 अप्रैल, 2002 | पहला पन्ना अफ़ीम की पैदावार बढ़ने का ख़तरा10 अप्रैल, 2002 | पहला पन्ना अफ़ीम पर हमला23 जुलाई, 2002 | पहला पन्ना अफ़ीम की खेती ज़ोर पर 19 अगस्त, 2002 | पहला पन्ना अफ़ीम की बढ़ती खेती पर चिंता02 सितंबर, 2006 | पहला पन्ना अफ़ीम का नया 'स्वर्णिम-त्रिभुज'01 दिसंबर, 2006 | पहला पन्ना | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
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