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आरएनए शोध के लिए नोबल पुरस्कार | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
वर्ष 2006 के लिए चिकित्सा के क्षेत्र में नोबल पुरस्कार अमरीका के शोधकर्ताओं एंड्रयू फ़ायर और क्रेग मेलो को दिया गया है. उन्हें आरएनए पर काम के लिए ये पुरस्कार मिला है यानि वो तरीका जिससे सेल जीन से जुड़ी जानकारी को नियंत्रित करते हैं. आरएनए इंटरफ़ीयरेंस नाम की इस तकनीक का इस्तेमाल जीन की कार्यप्रणाली समझने में किया जाता है. आरएनए इंटरफ़ीयरेंस जानवरों, पौधों और मानव तीनों में होती है. संक्रमण से लड़ने में ये शरीर की क्षमता बढ़ाती है और अस्थिर जीन पर नियंत्रण भी इससे बढ़ता है. चिकित्सा शोध परिषद की मानव जीन इकाई के प्रमुख प्रोफ़ेसर निक हेस्टी का कहना है कि पहले माना जाता था कि आरएनए की कोई ख़ास भूमिका नहीं है. लेकिन डॉक्टर मैलो और डॉक्टर फ़ायर के काम से साबित हो गया है कि आरएनए जीन को नियंत्रित करने में अहम भूमिका निभाता है. बीमारियों का इलाज
माना जा रहा है कि इस तकनीक से वायरल संक्रमण और कैंसर समेत कई बीमारियों का इलाज ढूँढने में मदद मिलेगी. एक जीवित सेल में हज़ारों तरह के जीन होते हैं. लेकिन शोधकर्ताओं एंड्रयू फ़ायर और क्रेग मेलो ने ये पता लगाया कि आरएनए इंटरफ़ीयरेंस के ज़रिए उस जीन को बंद किया जा सकता है जिसकी ज़रूरत नहीं है या फिर जो खतरनाक हैं. इस पूरी प्रकिया को प्रयोगशाला से नियंत्रित किया जा सकता है. एंड्रयू फ़ायर और क्रेग मेलो ने अपना ज़्यादातर प्रयोग सी ऐलेगन्स नाम के एक कीड़े पर किया है. लेकिन दूसरे शोधकर्ताओं ने इस काम का अन्य प्रजातियों पर भी प्रयोग किया है. जिगर के विफल होने और अंधेपन की एक खा़स किस्म की बीमारी के उपचार को लेकर इस पद्दति का प्रयोग किया जा रहा है. | इससे जुड़ी ख़बरें नाटककार हैरल्ड पिंटर को नोबेल सम्मान13 अक्तूबर, 2005 | पत्रिका नोबेल शांति पुरस्कार बारादेई को07 अक्तूबर, 2005 | पहला पन्ना टैगोर के नोबेल पदक की प्रतिकृति सौंपी07 मई, 2005 | भारत और पड़ोस वंगारी मथाई को नोबेल शांति पुरस्कार08 अक्तूबर, 2004 | पहला पन्ना | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
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