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चाँद पर टिकी मलेशिया की नज़रें | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
ऊँची से ऊँची इमारतें बनाने वाले देश मलेशिया का सपना अब और ऊपर उठकर चाँद तक पहुँचने का है. भारत और चीन के बाद अब मलेशिया ने घोषणा की है कि वह अपने वैज्ञानिकों को चांद पर भेजेगा. मलेशिया के विज्ञान और टेक्नॉलॉजी मंत्री जमालुद्दीन जार्जिस ने कहा है कि उनका देश 2020 तक यह अभियान पूरा करेगा, इस पर ढाई करोड़ डॉलर का ख़र्च आएगा. जार्जिस ने कहा कि इसके लिए खगोल वैज्ञानिकों की एक टीम तैयार करने का काम शुरू किया जा रहा है. लेकिन चांद पर जाने का मलेशियाई सपना उस समय ख़तरे में पड़ गया जब वैज्ञानिकों के पहले दल का प्रदर्शन एक साधारण फिटनेस परीक्षण में काफ़ी बुरा रहा. चांद पर जाने का सपना संजो रहे लोगों से साढ़े तीन किलोमीटर की दूरी 20 मिनट में तय करने को कहा गया था लेकिन सिर्फ़ 12 लोग ही इस लक्ष्य को हासिल कर सके. मलेशिया के वैज्ञानिकों को रूसी यान के ज़रिए चांद पर भेजा जाना है. कुछ विशेषज्ञों का कहना है कि इन लोगों के प्रदर्शन का संबंध उनके स्थानीय खान-पान से हो सकता है. खाना इसी वर्ष के शुरू में मलेशिया ने घोषणा की थी कि वह अपने देश के लोकप्रिय व्यंजनों को अंतरिक्ष में भेजेगा. एक मलेशियाई दल अमरीकी शहर ह्यूस्टन जा रहा है जो शून्य गुरूत्व की स्थिति में खाए जाने वाले व्यंजन तैयार करने का प्रयास करेगा. मलेशिया की महत्वाकांक्षाओं को लेकर किसी को संदेह नहीं होना चाहिए क्योंकि उसने पिछले दो दशकों में आर्थिक और तकनीकी क्षेत्र में ज़ोरदार तरक्की की है. देश के वैज्ञानिकों का कहना है कि कुछ भी असंभव नहीं है, बस चाहिए, लगन और पक्का इरादा. |
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