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गंगा का ग्लेशियर ख़तरे में | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
भारत में वैज्ञानिकों ने चेतावनी दी है कि गंगा नदी को जल की आपूर्ति करने वाला ग्लेशियर जलवायु परिवर्तन के कारण इस सदी के अंत तक पूरी तरह पिघल सकता है. वैज्ञानिकों का कहना है कि अगर जलवायु परिवर्तन में तेज़ी आई तो ग्लेशियर और तेज़ी से पिघलेगा. उनका कहना है कि इस स्थिति के लिए कार्बन डाई आक्साइड का बढ़ता उत्सर्जन ही ज़िम्मेदार है. वैज्ञानिक इसलिए भी अधिक चिंतित हैं क्योंकि इस ग्लेशियर से गंगा नदी को पानी मिलता है और लाखों लोग इस पर पानी के लिए आश्रित हैं. उधर ब्रिटेन सरकार की अंतरराष्ट्रीय विकास विभाग के लिए किए गए एक शोध में कहा गया है कि इस खतरे को बहुत अधिक बढ़ा चढ़ाकर पेश किया जा रहा है. शोध के अनुसार मैदानी इलाक़ों में नदियों को मानसून का पानी मिलता है इसलिए ग्लेशियर के पिघलने का ये मतलब नहीं लगाना चाहिए कि पूरी नदी सूख जाएगी. लेकिन जलवायु परिवर्तन मामले में विभिन्न सरकारों के पैनल की अध्यक्षता कर रहे डॉ आर के पचौरी ने बीबीसी से कहा कि अगर जलवायु परिवर्तन होता रहा तो इसका प्रभाव मानसून पर भी पड़ेगा. इसका अर्थ यह हुआ कि मानसून और ग्लेशियर दोनों ही जलवायु परिवर्तन से प्रभावित हो रहे हैं. नेपाल में बढ़ती गर्मी का असर वहां के पहाड़ों पर पड़ता दिख रहा है और वो कई बार पूरी दुनिया से कार्बन डाई आक्साइड का उत्सर्जन कम करने के अपील कर चुका है. नेपाल में कई ग्लेशियर पिघल कर झील बन चुके हैं. इन झीलों से कई प्रकार के खतरे भी पैदा हो सकते हैं क्योंकि इन झीलों के तटबंध टूटने से आस पास के घरों को भी भारी नुकसान पहुंचता है. |
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