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शुक्रवार, 12 नवंबर, 2004 को 00:36 GMT तक के समाचार
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हिमालय के ग्लेशियरों से भारी ख़तरा
ग्लेशियर
ग्लेशियर धरती के तापमान में बढ़ोत्तरी के कारण तेज़ी से पिघल रहे हैं
पर्यावरणवादियों ने चेतावनी दी है कि हिमालय के हिमनद यानी ग्लेशियर तेज़ी से पिघल रहे हैं जिनकी वजह से भारी तबाही हो सकती है.

पर्यावरणवादियों का कहना है कि स्थिति की ठीक से तरीक़े से निगरानी नहीं हो रही है और आख़िरी बार 14 वर्ष पहले 1990 में ग्लेशियरों का विस्तृत अध्ययन किया गया था.

हिमनदों के पिघलने से ख़तरा है कि बहुत सारा पानी अचानक घाटी में बसे गाँवों और क़स्बों को डुबो सकता है.

दीर्घकाल में यह ख़तरा भी है कि तेज़ी से पिघल रहे हिमनद पूरी तरह से सूख जाएँगे, चूँकि ज़्यादातर नदियाँ ग्लेशियरों से ही निकलती हैं इसलिए वे नदियाँ भी सूख जाएँगी जिससे लाखों लोग प्रभावित होंगे.

नेपाल के वरिष्ठ मौसम विज्ञानी डॉक्टर अरूण भक्त श्रेष्ठ कहते हैं, "यही समय है कि जल्दी से स्थिति का आकलन करें और समस्या को समझें वर्ना कभी भी भारी प्राकृतिक आपदा हो सकती है."

बढ़ता तापमान

नेपाल में हिमालय में तीन हज़ार से अधिक हिमनद हैं जिनसे लगभग ढाई हज़ार झीलें निकलती हैं, धरती का तापमान बढ़ने की वजह से इन झीलों का जलस्तर तेज़ी से बढ़ रहा है लेकिन उनकी तरफ़ कोई ख़ास ध्यान नहीं दिया जा रहा है.

 हमें अपनी जानकारी को दुरूस्त करने की ज़रूरत है, वर्ना हम ख़तरे की चेतावनी देने की स्थिति में नहीं होंगे
नेपाली विशेषज्ञ डॉक्टर श्रेष्ठ

पर्यावरणवादियों का कहना है कि किसी को यह तक पता नहीं कि कितनी झीलों में पानी बहुत बढ़ गया है, इन झीलों के ठीक नीचे बसे गाँव कभी भी तबाह हो सकते हैं क्योंकि उन्हें ख़तरे का आभास नहीं है.

इन झीलों में पानी के बहुत बढ़ने पर भारत और नेपाल के हज़ारों गाँव प्रभावित हो सकते हैं.

पिछले सत्तर वर्षों में नेपाल में ऐसी पचासों घटनाएँ हो चुकी हैं जब हिमनद से बनने वाली झीलों के पानी से अचानक गाँवों में बाढ़ आ गई.

पर्यावरणवादियों का कहना है कि इतना ख़तरा होने के बावजूद लंबे समय से व्यवस्थित तरीक़े से ख़तरे का आकलन नहीं किया गया है.

अध्ययन

1970 से 1989 के बीच किए गए एक जापानी अध्ययन से पता चला था कि ज्यादातर ग्लेशियर अपनी जगह से पीछे हट रहे हैं, बाद में 1994 के अध्ययन से भी यही बात पता चली.

लेकिन उसके बाद से क्या हुआ है, इसकी जानकारी उपलब्ध नहीं है जो चिंता का विषय है, डॉक्टर श्रेष्ठ कहते हैं, "हमें अपनी जानकारी को दुरूस्त करने की ज़रूरत है, वर्ना हम ख़तरे की चेतावनी देने की स्थिति में नहीं होंगे."

ब्रितानी भूवैज्ञानिक जॉन रेनॉल्ड्स कहते हैं, "ख़तरा बहुत बड़ा है इसलिए नए सिरे से सब कुछ जानने की ज़रूरत है."

वैज्ञानिकों का कहना है कि ख़तरा तेज़ी से बढ़ सकता है क्योंकि प्रदूषण जैसे कारणों से धरती का तापमान बढ़ता ही जा रहा है.

भारत के प्रमुख ग्लेशियर विशेषज्ञ डॉक्टर सैयद इक़बाल हसनैन कहते हैं कि दीर्घकाल में ग्लेशियरों के पिघलने में तेज़ी से आने से पहले बाढ़ आएगी और उसके बाद नदियों में पानी का स्तर बहुत कम रह जाएगा.

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