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हॉकिंग के लिए भारत में सॉफ्टवेयर | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
भारतीय सॉफ़्टवेयर इंजीनियरों का झंडा तो सारी दुनिया में लहरा ही रहा है. उसमें एक तमगा उस समय और जुड़ गया जब प्रसिद्ध खगोल वैज्ञानिक स्टीफ़न हॉकिंग ने अपना सॉफ़्टवेयर बनाने के लिए दिल्ली के अरुण मेहता से संपर्क किया. अरुण मेहता दिल्ली के आईआईटी से पढ़े हुए हैं और दिल्ली में ही रहते हैं. उम्मीद है कि जल्दी ही स्टीफ़न हॉकिंग इस सॉफ्टवेयर का उपयोग करने लगेंगे. स्टीफ़न हॉकिंस को एएलएस नाम की असाध्य बीमारी है. इस बीमारी से ग्रस्त मनुष्य की मांसपेशियाँ काम करना बंद कर देती हैं. स्टीफ़न हॉकिंग के पास अपना एक सॉफ़्टवेयर है जो उनके व्हीलचेयर पर लगे कंप्यूटर में लगा है. लेकिन बीमारी के कारण उनकी और मांसपेशियाँ जवाब देती जा रही हैं और उन्हें एक बेहतर सॉफ़्टवेयर की ज़रूरत महसूस हो रही है. स्टीफ़न हॉकिंग 'ए ब्रीफ़ हिस्ट्री ऑफ़ टाइम' जैसी कई मशहूर किताबों के लेखक हैं. पर अपनी विकलांगता के कारण आजकल वे सिर्फ एक बटन ही दबा सकते हैं. एक बटन दबाकर ही वे अपना सारा काम करते हैं, चलना, लिखना, बोलना सब कुछ. सम्मान आईआईटी दिल्ली से पढ़े हुए सॉफ्टवेयर इंजीनियर अरुण मेहता इस बीच तीन बार प्रोफ़ेसर स्टीफ़न हॉकिंग से उनके कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी के निवास पर मिल चुके हैं.
वे कहते हैं, "स्टीफ़न हॉकिंग से मिलना अपने आप में एक अलग अनुभव है, जो आपको बदल देता है. इसके अलावा उनके लिए काम करना सिर्फ़ मेरे लिए ही नहीं, बल्कि भारतीय विज्ञान जगत के लिए भी एक सम्मान है." अरूण मेहता कहते हैं, "मैं यह सॉफ़्टवेयर ओपन सोर्स में लिख रहा हूं क्योंकि मैं चाहता हूं कि दुनिया भर के वैज्ञानिक इस पर काम करें और अपनी ज़रूरत के अनुसार इसे सुधारें. एक विकलांग की ज़रूरत जितना एक विकलांग समझ सकता है उतना मैं नहीं." जो सॉफ्टवेयर बनाया जा रहा है उसका उपयोग स्टीफ़न हॉकिंग के अलावा दुनिया का कोई भी विकलांग कर सकता है. डॉ.मेहता को आशा है कि प्रो. स्टीफ़न हॉकिंग शीघ्र ही इस नई सॉफ़्यवेयर का इस्तेमाल करने लगेंगे. यह भारतीय वैज्ञानिकों के कारनामे का एक और चलता-फिरता उदाहरण होगा. |
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